गृह क्लेश और अशांति दूर करने के लिए करें स्कन्द माता का पूजन

  • गृह क्लेश और अशांति दूर करने के लिए करें स्कन्द माता का पूजन
You Are HereDharm
Friday, April 04, 2014-6:55 AM

या देवी सर्वभू‍तेषु स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


अवतार वर्णन:
शास्त्र अनुसार माता दुर्गा के पांचवे स्वरूप में नवरात्र की पंचमी तिथि पर मां स्कन्दमाता की आराधना का विधान है। आदिशक्ति दुर्गा के स्कन्दमाता स्वरूप की कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है। इनकी उपासना से भक्त की सर्व इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है। शब्द स्कन्दमाता का संधिविच्छेद कुछ इस प्रकार है के स्कन्द का अर्थ है कुमार कार्तिकेय अर्थात माता पार्वती और भगवान शंकर के जेष्ठ पुत्र कार्तिकय। इन्हें दक्षिण भारत में भगवान मुर्गन के नाम से भी जाना जाता है तथा माता कर अर्थ अहि मां अर्थात जो भगवान स्कन्द कुमार की माता है वही है मां स्कन्दमाता । शास्त्रों में ऐसा वर्णन है के इनके विग्रह में भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजित हैं अतः ये ममता की मूर्ति हैं ।

स्वरुप वर्णन: देवी स्कन्दमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं तथा इनकी मनोहर छवि पूरे ब्रह्मांड में प्रकाशमान होती है। शास्त्र अनुसार देवी स्कन्दमाता ने अपनी दाई तरफ की ऊपर वाली भुजा से बाल स्वरुप में भगवान कार्तिकेय को गोद में लिया हुआ है। दाई तरफ की नीचे वाली भुजा में इन्होंने कमल पुष्प का वरण किया हुआ है। बाईं तरफ ऊपर वाली भुजा से इन्होंने जगत को तारने के लिए वरदमुद्रा बना रखी है और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प हैं।

 देवी स्कन्दमाता का वर्ण पूर्णत: शुभ्र है। जिस प्रकार सारे रंग मिलकर शुभ्र (मिश्रित) रंग बनता है, इसी तरह इनका ध्यान जीवन में हर प्रकार की परिस्थितियों को स्वीकार करके अपने भीतर आत्मबल का तेज उत्पन्न करने की प्रेरणा देता है । ये कमल के पुष्प पर विराजमान हैं, इसी कारण इन्हें “पद्मासना देवी” और “विद्यावाहिनी दुर्गा” कहकर भी संबोधित किया जाता है। शास्त्र अनुसार इनकी सवारी सिंह के रूप में वर्णित है।  

साधना वर्णन: नवरात्र की पंचमी तिथि को देवी स्कन्दमाता के स्वरूप की ही उपासना की जाती है।  देवी स्कन्दमाता विद्वानों और सेवकों को पैदा करने वाली शक्ति है अर्थात चेतना का निर्माण करने वाली देवी हैं। इन्हें दुर्गा सप्तसती शास्त्र में “चेतान्सि” कहकर संबोधित किया गया है । नवरात्रि-पूजन के पांचवें दिन देवी स्कन्दमाता के पूजन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है।  स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना भी स्वमेव हो जाती है। यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है।

 अतः साधक को स्कंदमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। इनकी पूजा का सबसे अच्छा समय हैं दोपरह से मध्यान्ह पूर्व सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे के बीच। इनकी पूजा सफ़ेद कनेर के फूलों से करनी चाहिए। इन्हें मूंग से बने मिष्ठान का भोग लगाने चाहिए तथा श्रंगार में इन्हें हरे रंग की चूड़ियां अर्पित करना शुभ रहता है । इनकी उपासना से मंदबुद्धि व्यक्ति को बुद्धि और चेतना प्राप्त होती है पारिवारिक सुख शांति मिलती है, इनकी कृपा से ही रोगियों को रोगों से मुक्ति मिलती है तथा समस्त व्याधियों का अंत होता है । इनका ध्यान इस प्रकार है

सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ।।


योगिक दृष्टिकोण:
कुण्डलिनी जागरण के उद्देश्य से जो साधक दुर्गा उपासना करते हैं उनके लिए नवरात्र पंचमी विशिष्ट साधना का दिन होता है । देवी स्कन्दमाता साधना के लिए साधक अपने मन को “विशुद्धि' चक्र” में स्थित करते हैं,  इस चक्र का भेदन करने के लिए देवी स्कन्दमाता की विधिवत पूजा करने का विधान है । पूजा के लिए कम्बल का आसन श्रेष्ठ रहता है ।

ज्योतिष दृष्टिकोण: मां स्कन्दमाता की साधना का संबंध बुद्ध ग्रह से है । कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार कुण्डली में बुद्ध ग्रह का संबंध तीसरे और छठे घर से होता है। अतः मां स्कन्दमाता की साधना का संबंध व्यक्ति की सेहत, बुद्धिमत्ता, चेतना, तंत्रिका-तंत्र और रोगमुक्ति से है । जिन व्यक्तियों कि कुण्डली में बुद्ध ग्रह नीच, अथवा मंगल से पीड़ित हो रहा है अथवा मीन राशि में आकार नीच एवं पीड़ित है उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है मां स्कन्दमाता की साधना । मां स्कन्दमाता कि साधना से व्यक्ति के असाध्य रोगों का निवारण होता है । गृहक्लेश से मुक्ति मिलती है। जिन व्यक्ति की आजीविका का संबंध प्रशासन मैनेजमेंट, कमर्शियल सर्विसेज, वाणिज्य विभाग, बैंकिंग क्षेत्र अथवा व्यापार (बिज़नेस) से हो उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है मां स्कन्दमाता की साधना ।


वास्तु दृष्टिकोण: मां स्कन्दमाता कि साधना का संबंध वास्तुपुरुष सिद्धांत के अनुसार बुद्ध ग्रह से है , इनकी दिशा उत्तर है, निवास में बने वो स्थान जहां पर पेय जल, धन संग्रह (तिजोरी) और बगीचा हो । जिन व्यक्तियों का घर उत्तर मुखी हो अथवा जिनके घर उत्तरी दिशा पर वास्तु संबंधित दुष्प्रभाव आ रहे हो उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है मां स्कन्दमाता की आराधना ।

उपाय: रोग निवारण के लिए मां स्कन्दमाता पर मक्खन-मिश्री का भोग लगाएं ।


आचार्य कमल नंदलाल
ईमेल: info@kamalnandlal.com








 


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You