किन्नर हमेशा ही ‘अछूत’ रहे हैं: उच्चतम न्यायालय

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Tuesday, October 22, 2013-8:39 PM

नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने आज कहा कि किन्नर हमेशा ही ‘अछूत’ रहे हैं जिनकी शिक्षा जैसी अनेक सुविधाओं तक सीमित पहुंच रही है और उनके लिये काफी कुछ करने की जरूरत है। न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति ए के सीकरी की खंडपीठ ने किन्नरों को तीसरी श्रेणी के लिंग वाले नागरिक घोषित करने के लिये दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘कुल मिलाकर, वे समाज में अछूत ही रहे हैं और सामान्यतया उन्हें स्कूलों और शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश भी नहीं मिलता है।’’

यह जनहित याचिका राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण ने दायर की है जो चाहता है कि किन्नरों को तीसरी श्रेणी के लिंग वाले नागरिक घोषित किया जाये ताकि उन्हें भी पुरूष और स्त्रियों की तरह ही समान अधिकार और संरक्षण मिल सके। समाज के कमजोर वर्गो को मुफ्त कानूनी सहायता मुहैया कराने के लिये गठित राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण का गठन किया गया था और यह विवादों के समाधान के लिये लोक अदालतों का आयोजन करता है। प्राधिकरण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने कहा कि किन्नरों को न्यायिक और सांविधानिक मान्यता दिये जाने से सरकार की उचित कार्यवाही करेगी। सरकार ने एक कार्यबल का गठन किया और यह उसके कार्य को आगे बढ़ाने में मददगार होगा।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक मानव का यौन चरित्र होता है और लिंग के आधार पर किन्नरों के साथ  भेदभाव नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि किन्नर ‘नागरिकों के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ेवर्ग में आते हैं जिनके बारे में संविधान के अनुच्छेद 154 में चर्चा की गयी है। राजू रामचंद्रन ने मंडल प्रकरण के न्यायालय के फैसले का हवाला दिया और कहा कि आरक्षण का लाभ किन्नरों को भी मिलना चाहिए। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने इस संबंध में ब्रिटेन, यूरोपीय संघ , अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका में कानूनी स्थिति का भी हवाला दिया।


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