सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों के लिए याद रहेगा 2013

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Monday, December 30, 2013-12:39 PM

नई दिल्ली: मतदाताओं को सभी उम्मीदवारों को नकारने का विकल्प देने, दो वर्ष या उससे अधिक की सजा पाने वाले सांसदों और विधायकों की सदस्यता समाप्त करने, लाल बत्ती का दुरुपयोग रोकने और लिव इन संबंधों से उत्पन्न बच्चों को अधिकार दिए जाने जैसे उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक आदेशों और फैसलों के लिए वर्ष 2013 याद किया जाएगा। चुनाव प्रक्रिया को बेहतर बनाने की दिशा में जहां उच्चतम न्यायालय का रुख सुधारवादी नजर आया और उसे आम आदमी की सराहना मिली।

 

वहीं समलैंगिक संबंधों को अपराध ठहराने को लेकर समलैंगिकों के अधिकारों की हिमायत करने वालों की आलोचना भी इसे झेलनी पडी। एक पूर्व न्यायाधीश द्वारा महिला प्रशिक्षु वकील का यौन उत्पीडऩ किए जाने के मामले में भी न्यायालय को असहज स्थिति और आलोचना का सामना करना पडा। शीर्षस्थ अदालत ने चुनाव प्रक्रिया में सुधार को लेकर जहां कई महत्वपूर्ण फैसले दिए। वहीं गम्भीर प्रकृति के मामलों की जांच का जिम्मा उठाने वाली देश की प्रमुख एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को (पिंजडे से आजाद) कराने की दिशा में भी भरसक प्रयास किए।

 

वर्ष 2013 को उच्चतम न्यायालय द्वारा चुनाव प्रणाली को भ्रष्ट तत्वों से मुक्त कराने की कवायद के रूप में याद किया जाएगा। न्यायालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) के तहत जनप्रतिनिधियों को मिला संरक्षण समाप्त कर दिया। शीर्षस्थ अदालत ने दो साल या उससे अधिक की सजा पाने वाले सांसदों और विधयकों की सदस्यता समाप्त करने का फैसला दिया। इस फैसले की पहली भेंट राष्ट्रीय जनता दल राजद प्रमुख एवं लोकसभा सदस्य लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य रसीद मसूद चढ़े।

 

इसके अलावा, न्यायालय ने राजनीतिक दलों द्वारा जनता से लोक-लुभावन वायदे करने, मतदाताओं को नकारात्मक मतदान का अधिकार देने और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के साथ ही कागज की पर्ची की व्यवस्था शुरू करने के बारे में भी महत्वपूर्ण व्यवस्था दी। न्यायालय ने लिव..इन संबंधों को (वैवाहिक संबंधों) की प्रकृति के दायरे में लाने के लिए दिशा-निर्देश तय करके उदारवादी सोच का परिचय दिया। न्यायालय ने कहा कि लिव..इन संबंध न तो अपराध है और न ही पाप।

 

साथ ही अदालत ने इस तरह के संबधों में रह रही महिलाओं और उनसे जन्मे बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून बनाने का संसद को निर्देश भी दिया। लाल बत्तियों और सायरन का दुरुपयोग रोकने की दिशा में भी न्यायालय ने सख्त रवैया अपनाया और इनका इस्तेमाल संवैधानिक पदों पर बैठे महत्वपूर्ण व्यक्तियों के लिए सीमित कर दिया। कोयला खदानों के आवंटन और 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला जैसे मामलों में न्यायालय ने केन्द्र और कॉरपोरेट जगत को पूरे साल सांसत में रखा। इस दौरान न्यायालय ने केंद्र सरकार के खिलाफ अनेक तीखी टिप्पणियां की।

 

न्यायालय ने कोलगेट मामले में सीबीआई और सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए। इस प्रकरण में सीबीआई की सख्ती का ही नतीजा रहा कि तत्कालीन कानून मंत्री अश्विनी कुमार को मंत्री पद छोडऩा पडा। टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन, कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में अनिल अंबानी, सुनील भारती मित्तल और सुब्रत राय जैसे उद्योगपतियों को राहत पाने के लिए जहां शीर्षस्थ अदालत की चौखट पर आना पडा, वहीं राडिया टेप मामले में व्यावसायिक घराने, महत्वपूर्ण राजनीतिज्ञ और नौकरशाह न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गए।

 

सेबी के अवमानना मामले में सहारा प्रमुख और उनकी कंपनियों के दो निदेशक न्यायालय के निशाने पर रहे। बॉलीवुड भी न्यायालय की गिरफ्त से नहीं बच पाया और 1993 के मुंबई बम धमाका मामले में बॉलीवुड के ‘खलनायक’ संजय दत्त को पांच साल की सजा सुनाई गई। न्यायालय ने पेटेंट मामले में नोवार्टिस की अपील खारिज करके कैंसर के गरीब मरीजों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने का रास्ता साफ किया।

 

पेटेंट संबंधी मामलों में इसके दूरगामी परिणाम होंगे। तेजाब बिक्री को लेकर कानून बनाए जाने का निर्देश देना शीर्षस्थ अदालत की महत्वपूर्ण पहल रही। नौकरशाहों को निश्चित अवधि के लिए तैनाती दिए जाने की वकालत करते हुए न्यायालय ने मौखिक आदेश पर कोई कार्रवाई न करने के निर्देश भी दिए।


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