शिवरात्रि की घटना ने बदल दिया था स्वामी दयानंद सरस्वती को

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Thursday, February 27, 2014-4:31 PM

नई दिल्ली: मूर्ति पूजा और आडंबर का पुरजोर विरोध करने वाले आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती की जीवनधारा शिवरात्रि की एक घटना ने बदल कर रख दी थी। शिव भक्त पिता के कहने पर उन्होंने शिवरात्रि का उपवास रखा था, लेकिन मध्य रात्रि में शिवलिंग पर एक चुहिया को नैवेद्य खाते देख उनका मूर्ति पूजा पर से भरोसा जाता रहा। भारतीय नव जागरण के अग्रदूत माने जाने वाले स्वामी दयानंद सरस्वती असाधारण प्रतिभा के धनी और ऐसे तपस्वी थे जिन्होंने मिथ्याडंबर का खुलकर विरोध किया था।

 

वे आर्य समाज के प्रवर्तक और सुधारवादी संन्यासी थे। स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म गुजरात की छोटी सी रियासत मोरवी के टंकारा नामक गांव में 12 फरवरी 1824 को हुआ था। मूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण उनका नाम मूलशंकर रखा गया। प्रखर बुद्धि के धनी मूलशंकर को 14 वर्ष की उम्र तक उन्हें रुद्री आदि के साथ-साथ यजुर्वेद तथा अन्य वेदों के भी कुछ अंश कंठस्थ हो गए थे। वे व्याकरण के भी अच्छे ज्ञाता थे। इनके पिता का नाम ‘अंबाशंकर’ था। स्वामी दयानन्द बाल्यकाल में शंकर के भक्त थे। यह बड़े मेधावी और होनहार थे।

 

शिवभक्त पिता के कहने पर मूलशंकर ने भी एक बार शिवरात्रि का व्रत रखा था। लेकिन जब उन्होंने देखा कि एक चुहिया शिवलिंग पर चढ़कर नैवेद्य खा रही है, तो उन्हें आश्चर्य हुआ और धक्का भी लगा। उसी क्षण से उनका मूर्तिपूजा पर से विश्वास उठ गया। पुत्र के विचारों में परिवर्तन होता देखकर पिता उनके विवाह की तैयारी करने लगे। ज्यों ही मूलशंकर को इसकी भनक लगी, वे घर से भाग निकले। उन्होंने सिर मुंडा लिया और गेरुए वस्त्र धारण कर लिए। बहुत से स्थानों में भ्रमण करते हुए इन्होंने कतिपय आचार्यों से शिक्षा प्राप्त की।

 

प्रथमत: वेदान्त के प्रभाव में आए तथा आत्मा एवं ब्रह्म की एकता को स्वीकार किया। ये अद्वैत मत में दीक्षित हुए एवं इनका नाम ‘शुद्ध चैतन्य’ पड़ा। पश्चात ये संन्यासियों की चतुर्थ श्रेणी में दीक्षित हुए एवं यहां इनकी प्रचलित उपाधि दयानन्द सरस्वती हुई। सच्चे ज्ञान की खोज में इधर-उधर घूमने के बाद स्वामी दयानन्द सरस्वती मथुरा में वेदों के प्रकांड विद्वान प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द के पास पहुंचे। दयानन्द ने उनसे शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने इन्हें वेद पढ़ाया।

 

वेद की शिक्षा दे चुकने के बाद उन्होंने इन शब्दों के साथ दयानन्द को छुट्टी दी ‘‘मैं चाहता हूं कि तुम संसार में जाओ और मनुष्यों में ज्ञान की ज्योति फैलाओ।’’ गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करके महर्षि स्वामी दयानन्द ने अपना शेष जीवन इसी कार्य में लगा दिया। हरिद्वार जाकर उन्होंने ‘पाखण्डखण्डिनी पताका’ फहराई और मूर्ति पूजा का विरोध किया। उनका कहना था कि यदि गंगा नहाने, सिर मुंडाने और भभूत मलने से स्वर्ग मिलता, तो मछली, भेड़ और गधा स्वर्ग के पहले अधिकारी होते। बुजुर्गों का अपमान करके मृत्यु के बाद उनका श्राद्ध करना वे निरा ढोंग मानते थे। छूत का उन्होंने जोरदार खंडन किया। दूसरे धर्म वालों के लिए हिन्दू धर्म के द्वार खोले। महिलाओं की स्थिति सुधारने के प्रयत्न किए। मिथ्याडंबर और असमानता के समर्थकों को शास्त्रार्थ में पराजित किया।

 

1863 से देश भ्रमण करने के बाद 1875 में उन्होंने मुंबई में ‘आर्यसमाज’ की स्थापना की। आर्यसमाज की स्थापना के बाद स्वामी जी ने हिन्दी में ग्रन्थ रचना आरम्भ की। साथ ही पहले के संस्कृत में लिखित ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद किया। ‘ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका’ उनकी असाधारण योग्यता का परिचायक ग्रन्थ है। ‘सत्यार्थप्रकाश’ सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ है। अहिन्दी भाषी होते हुए भी स्वामी जी हिन्दी के प्रबल समर्थक थे। उनके शब्द थे, ‘मेरी आंखें तो उस दिन को देखने के लिए तरस रहीं हैं, जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा को बोलने और समझने लग जाएंगे।’

 

स्वामी दयानन्द सरस्वती का निधन एक वेश्या के कुचक्र से हुआ। जोधपुर की एक वेश्या ने, जिसे स्वामी जी की शिक्षाओं से प्रभावित होकर राजा ने त्याग दिया था, स्वामी जी के रसोइये को अपनी ओर मिला लिया और विष मिला दूध स्वामी जी को पिला दिया। इसी षड्यंत्र के कारण 30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के दिन स्वामी जी का भौतिक शरीर समाप्त हो गया।

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