Edited By ,Updated: 11 Sep, 2026 04:04 AM

13 अप्रैल, 2016 को पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि ‘‘देर से मिलने वाला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है।’’
13 अप्रैल, 2016 को पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि ‘‘देर से मिलने वाला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है।’’ आज देश में पीड़ितों को न्याय के इंतजार में वर्षों लग रहे हैं और अदालतों में जारी ‘तारीख पर तारीख’ के गलत रुझान के चलते मुकद्दमों के लटकते चले जाने के कारण न्याय की प्रतीक्षा में ही लोगों की पूरी जिंदगी बीत रही है जिसकी इसी वर्ष सामने आई ऐसी ही चंद घटनाएं निम्न में दर्ज हैं :
* 4 फरवरी को ‘गुजरात हाई कोर्ट’ ने नवम्बर, 1996 से लटकते आ रहे 30 वर्ष पुराने एक मामले में पुलिस कांस्टेबल ‘बाबूभाई प्रजापति’ को एक ट्रक ड्राइवर से 20 रुपयों की रिश्वत लेने के आरोप में बाइज्जत बरी कर दिया। वर्ष 2004 में निचली अदालत ने उसे 4 वर्ष की सजा सुनाई थी जिसके कारण ‘बाबूभाई प्रजापति’ की नौकरी और पैंशन सब चली गई।
‘बाबूभाई प्रजापति’ ने उक्त फैसले के विरुद्ध हाई कोर्ट में न्याय की गुहार लगाई थी। बरी होने के बाद ‘बाबूभाई प्रजापति’ ने अपने वकील से कहा था, ‘‘मेरे जीवन से यह कलंक मिट गया, अब यदि भगवान मुझे उठा भी लें तो कोई दुख नहीं।’’ इसे संयोग ही कहा जाएगा कि फैसला आने के अगले ही दिन 5 फरवरी, 2026 को दिल का दौरा पडऩे से उनका निधन हो गया।
* 5 अप्रैल को ‘दिल्ली हाई कोर्ट’ ने गवाहों के बयानों में भारी कमियों के दृष्टिगत ‘संदेह का लाभ’ देते हुए 2 इंजीनियरों ‘वी.के. दत्ता’ और ‘दिनेश गर्ग’ को 35 वर्ष पूर्व 20 सितम्बर, 1991 को उन पर लगे 1,800 रुपए रिश्वत मांगने के आरोपों से यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को साबित करने में नाकाम रहा है। निचली अदालत ने वर्ष 2002 में इन्हें 2 वर्ष कैद की सजा सुनाई थी।
* 1 जुलाई को ‘लखनऊ’ की सी.बी.आई. अदालत ने ‘लखनऊ बार एसोसिएशन’ के पूर्व अध्यक्ष ‘इंद्रदेव सिंह’ की 8 अगस्त, 2002 को हत्या के लगभग 23 वर्ष बाद फैसला सुनाते हुए ‘विक्रम यादव’ उर्फ ‘कालिया’, ‘पन्ना सिंह’ और ‘बृजेश यादव’ को उम्रकैद की सजा सुनाई। सुनवाई के दौरान अन्य आरोपी ‘मन्नालाल’, ‘वेद प्रकाश’ व ‘छोटेलाल’ मर चुके हैं।
* 19 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1996 के 30 वर्ष पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए गुजरात सरकार के 2 कर्मचारियों (1 क्लर्क और 1 चपरासी) को बरी कर दिया क्योंकि उन पर अभियोग पक्ष अपना आरोप सिद्ध न कर सका। इन दोनों पर एक छात्र को वजीफे के लिए आय प्रमाण पत्र जारी करने के बदले में 20 रुपए की रिश्वत लेने का आरोप था और निचली अदालत ने उन्हें एक वर्ष की सजा सुनाई थी।
* 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने डबल मर्डर से जुड़े लगभग 45 वर्ष पुराने मामले में देश की न्यायिक प्रणाली की विफलता पर बेहद सख्त और चिंताजनक टिप्पणी की। निचली अदालत को इस मामले का ट्रायल (सुनवाई) पूरा करने में ही 22 वर्ष लग गए।
इसके बाद, जब मामले की अपील की गई, तो झारखंड हाई कोर्ट ने भी अपना फैसला सुनाने में 22 वर्ष का लंबा समय लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस भयंकर देरी को ‘न्यायिक व्यवस्था की विफलता’ करार देते हुए 70 वर्षीय आरोपी की सजा को सस्पैंड (स्थगित) करते हुए उसे रिहा कर दिया। अदालत ने गौर किया कि 6 आरोपियों में से 2 की मौत आरोप तय होने से पहले ही हो गई थी जबकि दोषी ठहराए गए 4 में से 3 आरोपियों की मौत हाई कोर्ट में ममला लम्बित रहने के दौरान हो गई थी।
* 1 सितम्बर को ‘सुप्रीम कोर्ट’ ने ‘इंडियन बैंक’ के एक पूर्व ब्रांच मैनेजरको वर्ष 1991 से उसके विरुद्ध चल रहे 35 वर्ष पुराने भ्रष्टाचार के मामले में बरी कर दिया। ‘सुप्रीम कोर्ट’ ने सी.बी.आई. पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि उसके लगाए हुए आरोप पूर्णत: मनगढ़ंत पाए गए।
अदालतों पर मुकद्दमों का भारी बोझ होने के चलते न्याय मिलने में विलंब को देखते हुए ही लोगों ने कई मामलों में स्वयं कानून हाथ में लेना शुरू कर दिया है और इसीलिए समय-समय पर लोगों द्वारा अपराध के शक में लोगों को पकड़ कर बिना सच्चाई जाने ही पीट-पीट कर मार डालने के समाचार तक आने लगे हैं। इस तरह की नौबत न आए इसके लिए जहां देश की छोटी-बड़ी सभी अदालतों में जजों की कमी यथाशीघ्र दूर करने की आवश्यकता है, वहीं अदालतों में न्याय प्रक्रिया को चुस्त तथा और तेज करने की भी जरूरत है। यदि अदालतों में पर्याप्त संख्या में जज ही नहीं होंगे तो फिर भला लोगों को समय पर न्याय किस प्रकार मिल सकता है।—विजय कुमार