इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर : नई हरित क्रांति को प्रोत्साहन की जरूरत

Edited By ,Updated: 15 May, 2024 05:27 AM

electric tractor new green revolution needs encouragement

जलवायु परिवर्तन जैसी कड़ी चुनौती से खेती संकट में है। खेती से उपजी ग्रीनहाऊस गैसें भी लू व बाढ़ के हालात पैदा कर रही हैं। दुबई जैसे रेतीले इलाके का बाढग़्रस्त होना व लू की चपेट में भारत समेत दुनिया के कई इलाके भविष्य के मौसम के लिए खतरे की घंटी का...

जलवायु परिवर्तन जैसी कड़ी चुनौती से खेती संकट में है। खेती से उपजी ग्रीनहाऊस गैसें भी लू व बाढ़ के हालात पैदा कर रही हैं। दुबई जैसे रेतीले इलाके का बाढग़्रस्त होना व लू की चपेट में भारत समेत दुनिया के कई इलाके भविष्य के मौसम के लिए खतरे की घंटी का ताजा उदाहरण हैं। फसलों व किसानों की आजीविका के साथ दुनिया की खाद्य सुरक्षा को खतरा है। ऐसी चुनौतियों से पार पाने की कोशिशों के बीच खेत-खलिहानों की हरियाली बनाए रखने के लिए खेती को भी पर्यावरण अनुकूल बनाना जरूरी है। इन कोशिशों में इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर भी भविष्य की खेती के लिए उभरता हुआ एक बेहतर विकल्प है। 

दुनिया के सबसे बड़े ट्रैक्टर निर्माता के रूप में भारत भले ही सालाना करीब 11 लाख ट्रैक्टर बनाता व बेचता है, पर पर्यावरण संभाल के लिए टैक्नोलॉजी में तेजी से हो रहे बदलाव के बीच ट्रैक्टर को इलैक्ट्रिक वाहन (ई.वी.) की श्रेणी में शामिल ही नहीं किया गया। 

इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर पर सबसिडी नहीं : इलैक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार की 1 अप्रैल, 2019 से 31 मार्च, 2024 तक लागू 10,000 करोड़ रुपए की सबसिडी स्कीम ‘फॉस्ट एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ हाईब्रिड एंड इलैक्ट्रिक व्हीकल्स’ (फेम-2) के तहत 7000 इलैक्ट्रिक बसों, 5 लाख इलैक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स, 55,000 इलैक्ट्रिक कारों व 10 लाख इलैक्ट्रिक टू-व्हीलर्स के उत्पादन व बिक्री का लक्ष्य था। सबसिडी के कारण इलैक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में भारी इजाफा हुआ। सोसायटी ऑफ मैन्युफैक्चरर्स ऑफ इलैक्ट्रिक व्हीकल्स के आंकड़ों के मुताबिक, देश में वित्त वर्ष 2021-22 में 4.90 लाख इलैक्ट्रिक वाहनों की बिक्री 2022-23 में करीब ढाई गुणा बढ़कर 12.43 लाख रही। इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर सबसिडी स्कीम में शामिल नहीं किया गया, इसलिए इनकी बिक्री के कोई पुख्ता आंकड़े नहीं हैं। 

भारी उद्योग मंत्रालय द्वारा हाल ही में फेम-3 स्कीम में 12,600 करोड़ रुपए सबसिडी का प्रस्ताव लोकसभा चुनाव के बाद लागू होने की संभावना है। किसानों को उम्मीद है कि इस स्कीम में इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर भी शामिल होंगे, जिससे कीमत घट जाएगी। औसत एक इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर पर 40 प्रतिशत सबसिडी की तय सीमा से कीमत 2.40 लाख रुपए तक घट सकती है। इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर को इलैक्ट्रिक व्हीकल्स पॉलिसी में शामिल करने की पहल पंजाब व हरियाणा ने की है, बाकी राज्य भी इसे आगे बढ़ाएं। 

जी.एस.टी. व इंश्योरैंस प्रीमियम : जी.एस.टी. व इंश्योरैंस प्रीमियम में रियायत से इलैक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने में बहुत मदद मिली है। तमाम इलैक्ट्रिक वाहनों पर जहां 5 प्रतिशत जी.एस.टी. लगता है, वहीं इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर पर अभी भी डीजल ट्रैक्टर के बराबर 12 प्रतिशत जी.एस.टी. लागू है। इलैक्ट्रिक वाहनों को थर्ड पार्टी इंश्योरैंस प्रीमियम पर 15 प्रतिशत की छूट मिलती है, जबकि इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर पर कोई छूट नहीं है। इंटरनैशनल काऊंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन (आई.सी.सी.टी.) के मुताबिक, जी.एस.टी. 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने व इंश्योरैंस प्रीमियम में रियायत से इलैक्ट्रिक व डीजल ट्रैक्टरों की कीमत लगभग बराबर हो सकती है। अभी डीजल ट्रैक्टर की तुलना में इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर की कीमत 40 से 50 प्रतिशत अधिक है। 

चार्जिंग स्टेशनों की भारी कमी : अभी देश में इलैक्ट्रिक वाहनों की चाॄजग के लिए इंफ्र्रास्ट्रक्चर बहुत कम है। नीति आयोग की ई-अमृत वैबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, ‘देश में 934 सक्रिय सार्वजनिक चाॄजग स्टेशनों का नैटवर्क है, जबकि 70,000 पैट्रोल व डीजल पंप हैं। 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए ग्रामीण इलाकों में भी इलैक्ट्रिक ट्रैक्टरों की चाॄजग के इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश जरूरी है। इसके लिए कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी यानी सी.एस.आर. फंड की मदद से चाॄजग स्टेशन नैटवर्क स्थापित किया जा सकता है। 

शोध व ट्रेनिंग पर निवेश : सैंट्रल फार्म मशीनरी ट्रेनिंग एंड टैस्टिंग इंस्टीच्यूट द्वारा इलैक्ट्रिक ट्रैक्टरों के उत्पादन, संचालन, प्रदर्शन मानकों को विकसित व प्रमाणित करने से इनकी सप्लाई में आने वाली बाधाएं दूर होने में मदद मिलेगी, जिससे कंपनियां इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर बनाने के लिए प्रोत्साहित होंगी। कृषि मशीनरी के ‘कस्टम हायरिंग’ सैंटरों पर भी बड़े पैमाने पर इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर उपलब्ध कराने से किसानों को इन ट्रैक्टरों के लाभ व रखरखाव संबंधी जानकारी हासिल करने में मदद मिलेगी। 

प्रदूषण मुक्त इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर : केंद्रीय पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एक अध्ययन मुताबिक, ‘भारत के कृषि क्षेत्र से लगभग 14 प्रतिशत ग्रीनहाऊस गैस पर्यावरण में घुलती है, जिसमें डीजल से चलने वाली मशीनरी की भूमिका अधिक है। ऐसी चुनौतियों से पार पाने के लिए इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर सही समाधान हो सकते हैं। डीजल से चलने वाले ट्रैक्टर पर कृषि उत्पादन की कुल लागत का लगभग 12-15 प्रतिशत खर्च बैठता है, जबकि इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर पर यह खर्च न के बराबर है। वहीं इस ट्रैक्टर में पुर्जे कम होने के कारण मरम्मत खर्च भी कम है। इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीच्यूट (आई.ए.आर.आई.) की रिसर्च के मुताबिक, ‘डीजल ट्रैक्टर के रखरखाव की तुलना में इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर पर खर्च 40 प्रतिशत तक कम खर्च पर्यावरण अनुकूल खेती पर लागत घटाने का एक बेहतर विकल्प है।’ 

आगे की राह : भारत के ट्रैक्टर निर्माताओं ने बगैर किसी सरकारी प्रोत्साहन के अपने दम पर इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर की उन्नत तकनीक विकसित की है। इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर खरीदने में देश के किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसकी अधिक कीमत है, भले ही इसे चलाने व रखरखाव का खर्च मामूली है। जीरो एमिशन इलैक्ट्रिक ट्रैक्टरों के भारत से एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने की भी अपार क्षमता है। 

अमरीका, यूरोप, जापान व कनाडा जैसे देशों में कृषि मशीनरी को ‘डीकार्बोनाइजिंग’ यानी पर्यावरण के लिए सुरक्षित करने को कड़े नियम लागू हैं। इन बदलावों के बीच नई संभावनाओं में साल 2024 में 0.7 बिलियन अमरीकी डालर का इलैक्ट्रिक ट्रैक्टर बाजार 2030 तक बढ़कर 3.4 बिलियन अमरीकी डॉलर होने के आसार हैं, जो पर्यावरण अनुकूल खेती में आने वाली पीढिय़ों के लिए एक सुरक्षित भविष्य तय करेगा। (लेखक कैबिनेट मंत्री रैंक में पंजाब इकोनॉमिक पॉलिसी एवं प्लानिंग बोर्ड के वाइस चेयरमैन, ट्रैक्टर एंड मैकेनाइजेशन एसोसिएशन (टी.एम.ए.) के प्रैसिडैंट भी हैं।)-डा. अमृत सागर मित्तल(वाइस चेयरमैन सोनालीका)

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