शेयर बाजार को किस बात का डर

Edited By ,Updated: 15 May, 2024 05:40 AM

what is the stock market afraid of

चौथे दौर के मतदान के प्रारम्भिक आंकड़े पिछले चुनाव से नीचे के ही हैं लेकिन इस बार का अंतर पहले दो दौर जैसा नहीं रहा। अब चुनाव आयोग अंतिम आंकड़े के नाम पर कौन-सा मतदान प्रतिशत दिखाता है, इस पर सबका ध्यान है लेकिन शेयर बाजार में वैसी बेचैनी नहीं है,...

चौथे दौर के मतदान के प्रारम्भिक आंकड़े पिछले चुनाव से नीचे के ही हैं लेकिन इस बार का अंतर पहले दो दौर जैसा नहीं रहा। अब चुनाव आयोग अंतिम आंकड़े के नाम पर कौन-सा मतदान प्रतिशत दिखाता है, इस पर सबका ध्यान है लेकिन शेयर बाजार में वैसी बेचैनी नहीं है, जैसी पहले दो दौर के मतदान के बाद दिखी थी। यह बेचैनी चौथे दौर तक खत्म नहीं हुई लेकिन अब बाजार में लाखों करोड़ की पूंजी टूटने की खबर नहीं आ रही। मई के 5 ट्रेडिंग दिनों में ही निवेशकों के 15 लाख करोड़ रुपए डूब जाने का हिसाब लगाया जा रहा था।

इस हफ्ते की शुरुआत में गिरावट का सिलसिला थम गया था लेकिन बाजार का भरोसा लौट नहीं रहा था। सोमवार को बाजार का भय या अस्थिरता मापने वाला सूचकांक वी.आई.एक्स. हजार अंक ऊपर था, जिसे 19 महीनों का उच्चतम माना गया। अगले दिन जरूर बाजार बढ़ कर अंत हुआ। अब बाजार का भय दूर करने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की जगह गृह मंत्री अमित शाह और विदेश मंत्री जयशंकर की कोशिशों के बाद भी  बाजार का भरोसा नहीं जम रहा। अमित शाह ने तो भाजपा के 400 पार के नारे को दोहराया भी। अर्थात उन्हें भी लग रहा है कि गिरावट की वजह चुनाव के संकेत और उसमें भी मतदान में कमी में छुपा है। सरकार इस गिरावट को थामने और बाजार को सहारा देने की भरपूर कोशिश कर रही है। 

यह साफ हिसाब है कि मई महीने में अब तक अगर विदेशी संस्थागत निवेशकों ने बाजार से 22,800 करोड़ रुपए की पूंजी निकाली और बाहर से निवेश आने का क्रम थम सा गया है, तो हमारी अपनी सरकारी वित्तीय संस्थाओं ने बाजार में 23000 करोड़ रुपए की खरीद इसी अवधि में की है। अर्थात सामान्य ढंग से नफा-नुकसान संभाल लिया गया है। एच.एस.बी.सी. इंडिया के भारतीय प्रमुख हितेन्द्र दवे की सफाई थी कि यह गिरावट विदेशी निवेश के बाहर के बाजारों में जाने से आई है। यह बात एक हद तक सही भी है क्योंकि चीन और हांगकांग के वित्तीय बाजार में इधर काफी तेजी देखने में आ रही है लेकिन यह व्याख्या आंशिक सच ही है। हमारी अर्थव्यवस्था के आंकड़े हाल के वर्षों में अविश्वसनीय बने हैं, उनके जुटाने का काम बहुत ढीला-ढाला रहा है और कई बार तो जुटाए गए आंकड़े जारी नहीं किए गए। 

अगर टैस्ला वाले एलन मस्क ने बड़ा निवेश करने की मंशा से भारत यात्रा का कार्यक्रम टाला है (हालांकि इसे भी अनेक लोग चुनावी अनिश्चितता और मोदी जी द्वारा ऐसे निवेश के फैसले का चुनावी लाभ लेने का डर मान रहे हैं), तो महंगाई के मामले में सूचकांक अच्छी खबर दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और कोकोआ जैसी चीजों की कीमत कम होने का लाभ हमें मिलेगा। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का मुनाफा कई गुना बढ़ा है। अर्थव्यवस्था के बाकी क्षेत्रों से भी मिली-जुली खबरें आ रही हैं और विकास दर को लेकर तो सरकार के दावे बहुत ऊंचे हैं। 

इन सबके बावजूद चुनाव के नतीजों को लेकर बाजार के मन में गंभीर संशय है और जब मतदान का प्रतिशत गिरा तो उसने इस संशय को और गहरा किया कि एन.डी.ए. को आसान जीत मिलती नहीं लगती। इसमें भाजपा नेताओं द्वारा बीच चुनाव में मुद्दे बदलने का प्रयास, विपक्ष का ज्यादा मजबूत होकर उभरना, पहली बार कांग्रेस का घोषणापत्र आम लोगों में चर्चा का विषय बनाना और संविधान तथा आरक्षण को लेकर दलित समाज में डर समाने की खबर भी अपनी-अपनी भूमिका निभाते गए हैं। इस बाजार में देशी बचतकत्र्ताओं का हजारों करोड़ झोंककर गिरावट रोकने का प्रयास भी ङ्क्षचता को बढ़ाता है लेकिन नतीजे आने तक इस पर रोक लगाना किसी के लिए संभव नहीं।-अरविन्द मोहन 
 

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