DHFL में डूबे कोयला कर्मचारियों के 727 करोड़, झारखंड हाई कोर्ट ने दिए CBI जांच के आदेश

Edited By Updated: 08 Oct, 2026 06:57 PM

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यह मामला 'कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गनाइज़ेशन' (CMPFO) द्वारा DHFL में किए गए 1,300 करोड़ रुपये के निवेश से जुड़ा है। बाद में यह हाउसिंग फाइनेंस कंपनी दिवालिया हो गई, जिससे CMPFO के निवेश में 727.67 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

रांची : झारखंड हाई कोर्ट ने गुरुवार को कोयला कंपनियों के कर्मचारियों के प्रोविडेंट फंड के पैसे से हुए 727.67 करोड़ रुपये के नुकसान की CBI जांच का आदेश दिया। यह नुकसान तब हुआ जब 1,300 करोड़ रुपये 'दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड' (DHFL) में निवेश किए गए थे, जो बाद में दिवालिया हो गई। चीफ जस्टिस एम.एस. सोनाक की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने 'कोल एम्प्लॉई वेलफेयर एसोसिएशन' की ओर से दायर एक PIL पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। CBI जांच का आदेश देने के बाद कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।

यह मामला 'कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गनाइज़ेशन' (CMPFO) द्वारा DHFL में किए गए 1,300 करोड़ रुपये के निवेश से जुड़ा है। बाद में यह हाउसिंग फाइनेंस कंपनी दिवालिया हो गई, जिससे CMPFO के निवेश में 727.67 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। कोयला कंपनी के कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन की याचिका में आरोप लगाया गया कि DHFL की बिगड़ती आर्थिक स्थिति के बारे में चेतावनी मिलने के बावजूद समय रहते निवेश वापस नहीं निकाला गया। याचिका के अनुसार, CMPFO के फंड मैनेजर - स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (SBI) और UTI - ने 24 जून 2019 को ही DHFL की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि कंपनी मुश्किल में पड़ सकती है और सलाह दी थी कि निवेश वापस निकाल लिया जाए।

हालांकि, याचिका में आरोप लगाया गया कि चेतावनी के बावजूद समय पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके बाद DHFL दिवालिया हो गई, जिससे CMPFO के फंड को 727.67 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। लगभग छह महीने बाद, 20 दिसंबर 2019 को CMPFO ने एक बैठक की जिसमें DHFL से निवेश वापस लेने का प्रस्ताव पारित किया गया। हालांकि, तब तक नुकसान का पता चल चुका था। लगभग दो साल बाद, 22 नवंबर 2021 को CMPFO बोर्ड की निवेश से जुड़ी एक सब-कमेटी की बैठक हुई, जिसमें 727.67 करोड़ रुपये को बट्टे खाते में डालने (यानी नुकसान मानकर हटाने) का प्रस्ताव रखा गया। कर्मचारियों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया।

मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। नुकसान की भरपाई के लिए, कोल इंडिया बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ने कोयला उत्पादन पर 10 रुपये प्रति टन का सेस लगाने का प्रस्ताव भी दिया था। इस मामले के सिलसिले में तत्कालीन कोयला सचिव अनिमेष भारती के खिलाफ विभागीय कार्यवाही भी शुरू की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि विभागीय कार्यवाही की रिपोर्ट मिलने से पहले ही, CMPFO ने हाई कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर अपने अधिकारियों को क्लीन चिट दे दी। हाई कोर्ट ने इस कदम का गंभीरता से संज्ञान लिया। याचिकाकर्ता ने पूरे मामले की CBI जांच और साथ ही डूबे हुए 727.67 करोड़ रुपये की वसूली की मांग की थी। अधिवक्ता अनिल कुमार सिंह ने कोर्ट में याचिकाकर्ता का पक्ष रखा। हाई कोर्ट द्वारा CBI जांच का आदेश दिए जाने के बाद, DHFL में इतनी बड़ी रकम निवेश करने का फैसला लेते समय अपनाई गई प्रक्रियाओं, चेतावनियों के बावजूद पैसा निकालने में हुई देरी के कारणों और 727.67 करोड़ रुपए के नुकसान के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए, इन सभी बातों की जांच की जाएगी।
 

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