साइरस बोेले- मैं तो बस नाम का चेयरमैन था, टाटा के मालिक ने भी तोड़ी चुप्पी

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Thursday, October 27, 2016-8:36 AM

मुंबई: टाटा ग्रुप से हटाए जाने के बाद पहली बार सायरस मिस्त्री खुलकर सामने आए। उन्होंने टाटा बोर्ड को एक ई-मेल में कहा, ‘‘इस तरीके से पद से हटाए जाने से मैं शॉक्ड हूं।’’ मिस्त्री ने यह भी कहा कि टाटा की रूल बुक के अनुसार उन्हें अपने बारे में कहने के लिए 15 दिन का नोटिस दिया जाना चाहिए था। मिस्त्री को अचानक इस तरह निकाले जाने से दोनों तरफ  से आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। टाटा ग्रुप ने सुप्रीम कोर्ट, बॉम्बे हाईकोर्ट और नैशनल लॉ ट्रिब्यूनल में कैविएट दायर की है। सायरस मिस्त्री की ओर से भी ट्रिब्यूनल में 4 कैविएट दायर करने की खबर आई थी। हालांकि बाद में मिस्त्री की ओर से इस बारे में इंकार किया गया है।

मीडिया में आई रिपोर्ट के अनुसार मिस्त्री ने लिखा है कि इस फैसले से वह ‘शॉक्ड’ हैं, उन्हें अपनी बात रखने का अवसर तक नहीं दिया गया। बोर्ड ने अपनी साख के मुताबिक काम नहीं किया। यहां तक कि बोर्ड मीटिंग के दौरान भी खुद को हटाए जाने पर मिस्त्री ने इसका विरोध किया था और कहा था कि यह गैर-कानूनी तरीका है।  मिस्त्री को हटाने के पीछे कोई कारण भी नहीं बताया गया था।

टाटा ग्रुप का मार्कीट कैप 21,000 करोड़ रुपए घटा
सायरस मिस्त्री को टाटा ग्रुप के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद ग्रुप की प्रमुख लिस्टिड कंपनियों के शेयरों में दूसरे दिन करीब 10,000 करोड़़ रुपए की हानि हुई। इसके साथ ही कंपनी के बाजार पूंजीकरण में 2 दिन में कुल 21,000 करोड़ रुपए से भी अधिक की कमी हुई है।

सायरस मिस्त्री ने और क्या लिखा
सायरस ने कहा, ‘‘इस तरह अचानक किए गए फैसले और बचाव का अवसर नहीं दिए जाने से कई तरह की अटकलें शुरू हो गईं। इससे मेरी और ग्रुप की साख को गहरा नुक्सान हुआ है।’’ मिस्त्री ने आरोप लगाया कि टाटा संस और ग्रुप कंपनियों के स्टेक होल्डर्स के प्रति जिम्मेदारी निभाने में डायरैक्टर्स विफल रहे और कार्पोरेट गवर्नैंस का कोई ख्याल नहीं रखा गया। वहीं अपने ऊपर कार्पोरेट स्ट्रैटजी नहीं होने के आरोप के जवाब में मिस्त्री ने कहा कि टाटा संस बोर्ड को उन्होंने वर्ष 2025 तक की स्ट्रैटजी सौंप दी थी। इतना ही नहीं, उन्होंने शुरूआत में रतन टाटा और लॉर्ड भट्टाचार्य का ग्रुप को लीड करने का ऑफर ठुकरा दिया था लेकिन कैंडिडेट्स नहीं होने के चलते उन्हें आगे लाया गया। साथ ही यह भरोसा दिया गया था कि उन्हें काम करने की पूरी आजादी होगी। इसमें रतन टाटा की भूमिका सलाहकार और गाइड की होगी।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ
अप्वाइंटमैंट के बाद टाटा ट्रस्ट ने आर्टिकल ऑफ एसोसिएशंस में संशोधन किया। इसमें ट्रस्ट, टाटा संस बोर्ड और चेयरमैन के बीच एंगेजमैंट की टर्म को बदला गया। नियमों में बदलाव के जरिए टाटा संस के चेयरमैन के रोल को कम किया गया और एक अल्टरनेटिव पावर स्ट्रक्चर तैयार किया गया। मिस्त्री ने दावा किया है कि ट्रस्ट की तरफ  से नॉमिनेटेड डायरैक्टर नितिन नोहरिया और विजय सिंह को महज पोस्टमैन बना दिया गया।

टाटा ग्रुप के असली ‘मालिक’ ने तोड़ी चुप्पी
टाटा समूह में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले बेहद शक्तिशाली लेकिन लो-प्रोफाइल चैरीटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी वी.आर. मेहता का कहना है कि सायरस मिस्त्री को टाटा सन्स के चेयरमैन पद से हटाए जाने के पीछे की अहम वजह ग्रुप की पुअर फाइनैंशियल परफॉर्मैंस है। मेहता ‘सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट’ के ट्रस्टी हैं जिसके पास इस विशाल ग्रुप के 60 प्रतिशत शेयर हैं और इससे ग्रुप के संचालन में इनकी राय काफी अहम हो जाती है। मेहता ने कहा, ‘‘मिस्त्री की अध्यक्षता के दौरान पूरा ग्रुप केवल 2 कंपनियों टाटा कन्सल्टैंसी सर्विसिज (टी.सी.एस.) और जगुआर लैंड रोवर (जे.एल.आर.) पर ही डिपैंड हो गया था।’’

उन्होंने कहा कि इसके बाद टाटा ग्रुप से जुड़े ट्रस्टों की परोपकारी गतिविधियों को कम कर दिया गया जो कि उन्हें मंजूर नहीं। वह कहते हैं कि वह इस घटनाक्रम से पूरी तरह खुश नहीं हैं। कम से कम इतना तो कहा जा सकता है कि यह बेहद बुरा दिख रहा है लेकिन यह कहने के साथ ही मैं यह भी जोड़ूंगा कि शायद ‘मिस्त्री को हटाने के अलावा’ कोई ऑप्शन बचा नहीं रह गया था।


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