नवरात्रों में करें शक्ति की आराधना, पाएं मनवांछित फल

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Saturday, October 05, 2013-8:28 AM

शक्ति की आराधना का पर्व नवरात्र साल में दो बार आते है। प्रथम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल दशमी तक जिसे बासन्तीय नवरात्र कहते है 2 आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल दशमी तक जिसे शारदीय नवरात्र कहते है लेकिन आपको बता दूं नवरात्र साल में 4 बार आते है 2 गुप्त नवरात्र होते है 3 अषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से अषाढ़ शुक्ल दशमी तक 4 माघ शुक्ल प्रतिपदा से माघ शुक्ल दशमी तक गुप्त नवरात्र का समय होता है।

1 माता की पूजा " लाल रंग के कम्बल " के आसन पर बैठकर करना प्रकृष्ट माना गया है।

2 साधको, योगियों, सिद्धि प्राप्त करने वालो के लिए " कुश " का आसन सर्वोत्तम होता है।

3 माता के पूजन हेतु सोने चांदी कांसे के दीपक का उपयोग उत्तम होता है।

4 माता की पूजा हेतु शुद्ध घी का दीप जलाना सर्वश्रेष्ठ होता है।

5 तिल के तेल का दीपक मौली की बाती का उपयोग शुभ माना गया है।

6 शत्रुओं से मुक्ति पाने के लिए सरसों व चमेली के तेल का दीपक जलाएं ।

7 माता के मंत्रों का जाप करने के लिए रुद्राक्ष अथवा लाल चन्दन की माला का प्रयोग करें।

8 माता के बिशेष अनुष्ठान के समय सोने,चांदी,कांसा,तांबा और लोहे का दीपक अवश्य जलाना चाहिए।

9 धन प्राप्ति हेतु माता के मंत्रो का जाप कमलगट्टे की माला से करना चाहिए।

10 दीपक के नीचे " चावल " रखने से मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है तथा " सप्तधान्य " रखने से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते है।

11 घर में पूजा करते समय माता के सम्मुख 1 बाती का दीपक तथा विशेष अनुष्ठान के समय 9 बाती का दीपक जलाएं।

12 अगर आप सक्षम है तो " सोने के मनकों वाली माला " से माता के मंत्रो का जाप करें ।

13 माता की पूजा करते समय " गुडहल " के फूल अवश्य अर्पित करें। इससे माता प्रसन्न होती है।

14 " नवरात्र " पूजा के समय 9 दिन अखंड दीप प्रज्वलित करना चाहिए।

15 अष्टमी - नवमी तिथी को दो से दस वर्ष तक की 9 कन्याओं को देवी का रूप मानकर पूजन करने के पश्चात भोजन करवाना चाहिए तथा फल,दक्षिणा भेंट देनी चाहिए।

16 दो वर्ष की कन्या - कुमारी
तीन वर्ष की - त्रिमुर्तनी
चार वर्ष की - कल्याणी
पांच वर्ष की - रोहिणी
छह वर्ष की - काली
सात वर्ष की - चंडिका
आठ वर्ष की - शाम्भकी
नो वर्ष की - दुर्गा और दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा स्वरुप माना गया है।

                                                                                                                                   -आचार्य पंडित तिलक मणि जी



 


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