त्याग, अपनत्व, बन्धुत्व की अनूठी पवित्रतम निर्मल भाव निहित पर्व है भरत-मिलाप

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Monday, October 14, 2013-7:46 AM

कल दशहरा था और आज भरत-मिलाप है | उस भरत का राम से मिलन जो राम का वनवास सुनकर पिता की मृत्यु क्षण भर के लिए ही सही भूल से गए, “भरतहि बिसरेहु पितु मरन, सुनत राम वन गौनु |”

वह भरत जो माताओं, मंत्री तथा गुरु किसी का भी कहना नहीं मानते और राम से मिलने चित्रकूट चल देते हैं उनकी मनुहार करने, उन्हें अयोध्या लौटाने | जब वे नहीं लौटते तो उनकी कृपा से प्राप्त चरण-पादुका अयोध्या के सिंहासन पर स्थापित करते हैं | नित्य प्रति पादुकाओं का चौदह वर्षों तक पूजन करते हैं | चम्पा के बाग में भ्रमर की भांति अयोध्या के सारे सुखों को त्याग देते हैं |

 वे नंदिग्राम में पर्णकुटी बनाकर रहते हैं सिर पर जटाजूट, शरीर पर वल्कल धारण करते हैं तथा भूमि पर कुश की आसनी बिछा कर परम त्यागी का जीवन व्यतीत करते हैं | भरत ने चौदह वर्षों तक भोजन, वस्त्र, बर्तन, व्रत, नियम आदि को ऋषियों की तरह कठोरता के साथ अपनाया | उन्होंने राजा राम की धरोहर के रूप में प्रजा की सेवा की |

कितना विलक्षण उदाहरण है कि जिस सिंहासन के लिए कैकेयी ने राम को वन भिजवा दिया, उस सिंहासन पर भरत कभी बैठे नहीं, निर्बाध निकट रहकर भी नहीं | गुरु, माता, मंत्री, प्रजा यहां तक कि स्वयं उन रघुपति राघव के समझाने-बुझाने पर भी नहीं, जिनका कि राज्याभिषेक ही नहीं हो पाया है। अभी वे राजा ही नहीं हुए हैं | राम तथा भरत का मिलाप संसार की अनूठी घटना है |

इस घटना के निहितार्थ में विश्व-वन्धुत्व का वह पवित्रतम निर्मल भाव निहित है, जिसमें कि सम्पूर्ण मानव-जाति को एक जुट करने का सामाजिक सौहार्द समाहित हो गया है  और उस सौहार्द का आधार है त्याग, अपने हिस्से का त्याग, अपने अतिरिक्त हिस्से का त्याग, दूसरों के प्राप्य का त्याग | त्याग उस भाग का, जो भले ही कितना ही अपना क्यों न हो परन्तु औरों के लिए अपने से अधिक की आवश्यकता में त्याज्य हो ।

 त्याग उस भोग का जो अभद्र, अनावश्यक और अनुचित है, निकृष्ट है | अपनत्व बस उस भर का, उतने भर का, जो ईश का दान है, परम सत्ता द्वारा सत्कर्मों के प्रतिफल में हमें प्रदान किया गया है तथा जिसके भोग-उपभोग से धन-धर्म, जीवन सब-के-सब धन्य होते हों, सब-के-सब कल्याण-भाव से ललित मुद्रा में छविमान हो उठते हों।वही त्याग भरत ने किया, वही राम ने किया और जो उन दोनों ने किया, वही हमें भी करना चाहिए, अपने लिए, अपने इर्द-गिर्द के समाज के लिए, अपने देश के लिए और समस्त विश्व के कल्याण लिए इसलिए दोनों ही भाई-चारे और सौहार्द के अनोखे प्रतीक हैं |

जैसे-जैसे नवरात्रि के दिनों में रामलीलाएं और शक्ति-पूजा बाह्याडम्बर, प्रदर्शन और चौंधियाने वाली रोशनी में तब्दील होते गए, वैसे-वैसे राम और भरत हमारे जीवन से दूर होते गए, शक्ति की आराधना दिखावटी होती गई | आध्यात्मिकता-नैतिकता कमजोर पड़ने लगी और समाज पर लोभ, झूठ, फरेब, अनाचार, अहंकार, कुसंस्कार, भोग-विकृति, वैमनस्य, तीव्र भौतिकता आदि का दुष्प्रभाव बढ़ता चला गया | ऐसे में राम और भरत की याद आती है।

आज एक बार फिर भरत-मिलाप का पर्व है और एक बार फिर राम-भरत की याद आई है | हर साल आती है और आती रहेगी, किन्तु कब भाई-भाई का झगड़ा ख़त्म होगा | आखिर कब भारत सच्चे अर्थों में भरत-मिलाप का ईदगाह बनेगा और दूसरों को भी प्रेरित करेगा | सारा चक्कर धन-दौलत के मद और अहंकार की मदिरा का है | उसे त्यागे बिना रावण के कितने ही पुतले दहन किए जाएं।

कितने ही सालों तक दहन करते जाएं, बुराई नहीं मिटेगी और राम और भरत भी हमारे ह्रदय की ओर उन्मुख नहीं होंगे | भरत-मिलाप तो भारत के जनमन को यही सीख देता है कि धन-दौलत, अहंकार और विद्वेष के नशे के साथ कोई भी भाई, भाई को हृदयपूर्वक गले नहीं लगा सकता; तभी तो रामकथा से, भरत-मिलाप की आधार भावभूमि से ये पंक्तियां गूंज उठती है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पद पाकर भी भरत को राजमद नहीं हो सकता—

“भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरिहर पद पाइ |”


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