कैसे बनता है व्यक्ति बुद्धिमान

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Thursday, October 24, 2013-7:20 AM

शास्त्रोें में कहा है: बुद्धेः फलं अनाग्रहः।

अर्थात बुद्धि का फल क्या है ? बुद्धि का फल है भोगों में और संसार की घटनाओं में आग्रह नहीं रहना। बड़ा सिद्ध हो, त्रिकाल ज्ञानी हो लेकिन हेय और उपादेय बुद्धि हो तो वह तुच्छ है।

हेय और उपादेय बुद्धि क्या है ? हेय माने छोड़ने योग्य, उपादेय माने ग्रहणीय। जब जगत ही मिथ्या है तो उसमें यह पाना है, यह छोड़ना है, यह करना है, यह नहीं करना है। ऐसी बुद्धि जब तक बनी रहेगी तब तक वह बुद्धि अकृत्रिम शान्ति में टिकेगी नहीं। अकृत्रिम शान्ति में टिकने के लिए हेयोपादेय बुद्धि का त्याग करना पड़ता है। छोड़ने योग्य और ग्रहणीय न हो।

यह हेय-उपादेय बुद्धि है। जो जहां है वहीं रहकर हेयोपादेय बुद्धि छोड़कर भीतर की यात्रा करता है तो वह ऊंचे पद को पाता है। जो छोड़ने पकड़ने में लगा है तो वह वैकुण्ठ में जाने के बाद भी शान्ति नहीं पाता इसलिए हेयपादेय बुद्धि छोड़ दें जैसे मिट्टी में बैठते हैं, फिर कपड़े झाड़ कर चल देते हैं, इसी प्रकार व्यवहार करके सब छोड़ दो।

व्यवहार मनुष्य का वह गुण है, जो पग-पग पर उसकी रक्षा करता है। मनुष्य की व्यवहार कुशलता ही दूसरे मनुष्य के हृदय पर कोई छाप छोड़ सकती है, जिसकी वजह से दूसरा व्यक्ति उसकी तरफ आकर्षित होता है। किसी से उस तरह से बात करो जिस तरह तुम यह पसंद करते हो कि लोग तुम्हारे साथ बात करें क्योंकि ईश्वर लानत व धिक्कार करने वाले,गाली देने वाले और बुरा भला कहने वाले से घृणा करता है और सहनशील और सदाचारी को पसंद करता है।

अष्टावक्र मुनि कहते हैं- अकर्तृत्वं अभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा। तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः।।

अर्थात जब पुरूष अपने आत्मा के अकर्त्तापने को और अभोक्तापन को मानता है तब उसकी सम्पूर्ण चित्तवृत्तियां करके नाश होती हैं। चित्त में जब अकर्तृत्व और अभोक्तृत्व कि निष्ठा जमने लगती है तो वासनाएं क्षीण होने लगती हैं।

 


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