... फिर भी दान से तुमने अपना हाथ क्यों खींचा

  • ... फिर भी दान से तुमने अपना हाथ क्यों खींचा
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Friday, November 22, 2013-4:52 PM
जनाब इब्राहिम खां का नियम था कि जब तक वे भूखे अतिथियों को भोजन न करा लेते थे तब तक जल स्पर्श तक नहीं करते थे। एक दिन बहुत बरसात होने के कारण एक भी अतिथि उनके घर नहीं आया। वे सारा दिन भूखे रहे। शाम के समय वह अतिथि की खोज में निकले। बहुत भटकने के उपरांत उन्होंने देखा एक बहुत ही वृद्ध व्यक्ति पेड़ की छाया में बैठा कांप रहा था।

वे उस वृद्ध के पास गए और बोले, "महाशय! आज आप मेरे घर आतिथ्य ग्रहण करें।"

वृद्ध खुशी - खुशी मान गया और उनके साथ चल पड़ा। घर पहुंच कर उन्होंने उस वृद्ध का खूब आदर सत्कार किया। जब वह वृद्ध हाथ-पांव मुंह धोकर आसन पर बैठा तो नौकरों ने उसके सामने विभिन्न पकवान पेश किए। जब वह भोजन का पहला निवाला अपने मुंह में डालने लगा तो इब्राहिम खां उस पर गुस्सा होने लगे क्योंकि वह ईश्वर को बिना धन्यवाद दिए भोजन आरंभ करने जा रहा था।

इब्राहिम खां बोले," तुम्हारा यह कैसा व्यवहार है जिनकी कृपा से तुम्हें यह मधुर अन्न खाने को मिला है, तुम उन्हें बिना धन्यवाद दिए ही खाने लगे।"

वृद्ध बोला," मैं नास्तिक हूं।"

उसका ऐसा उत्तर सुन कर इब्राहिम क्रोध से जल उठा। उन्होंने तुरंत उसे अपने घर से बाहर कर दिया। तब इब्राहिम के ह्रदस में देव वाणी हुई, "इब्राहिम! मैंने जिसको यत्न पूर्वक अन्न देकर इतनी बड़ी उम्र तक बचा रखा है। उसे घड़ी भर भी तुम उपने यहां न रख सके और तुमने उसके साथ इतनी घृणा करी। वह नास्तिक था फिर भी दान से तुमने अपना हाथ क्यों खींचा।"

इब्राहिम को अपनी भूल का एहसास हो गया।

भगवद गीता में वर्णित है

"दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌॥"

दान मेरा कर्तव्य है और मैं ईश्वर का आभारी हूं कि मैं परोपकार करने योग्य हूं ऐसी भावना से बिना स्वार्थ के दिया गया दान ही उच्च कोटि का दान होता है। दान सदैव स्वयं की स्थिति तथा प्राप्तकर्ता की आवश्यकता एवं प्रमाणिकता पर विचार करने के बाद ही दिया जाना चाहिए।

धर्म ने दान रूपी संस्था की स्थापना इसलिए की थी ताकि मनुष्य उदार बन जाएदान देते समय इस बात का भी ख्याल रखना आवश्यक है कि जो पैसा दान में दिया जा रहा है, वह मेहनत और हलाल की कमाई का हो क्योंकि बिना मेहनत के अवैध रूप से पैसा कमाया गया होता है, वह धर्म की दृष्टि से दान योग्य नहीं होता। ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की पीड़ा और कष्टकारक समय से मुक्ति पाने के लिये भी विशेष वस्तुओं का विशेष दिन दान किया जाता है। दान में जो भी वस्तुएं दी जाएं, वे हमेशा उत्तम श्रेणी की होनी चाहिए या कम से कम वैसी तो हों ही, जैसी आप खुद प्रयोग करते हों।


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