यहां सूरज ढलते ही जाग जाती हैं आत्माएं

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Thursday, December 05, 2013-12:56 PM

देश विदेश में भूतों के बसेरे के नाम से चर्चित भानगढ़ का प्रेतग्रस्त किला राजस्थान के जयपुर से 80 किलोमीटर दूर स्थित है। 1573 में आमेर के राजा भगवंतदास द्वारा बनाए गेए भानगढ़ किले के रातों रात खण्डर में तबदील हो जाने के बारे में कई कहानियां मशहूर हैं। इन किस्सों को सुनकर लोग मायावी और रहस्यों से भरे इस किले की ओर खिंचे चले आते हैं। किले की एक दिवार पर भारतीय पुरातत्त्व विभाग का बोर्ड लगा है। इस पर साफ साफ शब्दों में लिखा है सूर्यास्त के बाद प्रवेश वर्जित है।

भानगढ़ के किले व नगर के उजड़ने की प्राचीन कहानी के अनुसार रत्नावली को भानगढ़ की रानी बताया गया है तो किसी कहानी में भानगढ़ की सुंदर राजकुमारी दोनों ही कथाओं में इस पात्र के साथ सिंघिया नामक तांत्रिक का नाम व कुकृत्य जरूर जुड़ा हुआ है। प्रचलित कहानी के अनुसार सिंघिया महल के पास स्थित पहाड़ पर तांत्रिक क्रियाएं करता था। वे रानी रत्नावली के रूप पर आसक्त था। एक दिन भानगढ़ के बाजार में उसने देखा कि रानी की एक दासी रानी के लिए केश तेल लेने आई है। सिंघिया ने उस तेल को अभिमंत्रित कर दिया कि वह तेल जिस किसी पर लगेगा उसे वह तेल उसके पास ले आएगा। कहते है रानी ने जब तेल को देखा तो वह समझ गई कि यह तेल सिंघिया द्वारा अभिमंत्रित किया गया है।

कहते हैं रानी भी बहुत सिद्ध थी इसलिए उसने पहचान कर ली और दासी से उस तेल को फेंकने के लिए कहा। दासी ने उस तेल को चट्टान पर गिरा दिया। कहते हैं तेल ने चट्टान को उड़ाकर सिंधिया की तरफ रवाना कर दिया। सिंधिया ने चट्टान को देखकर अंदाजा लगाया कि रानी उस पर बैठकर उसके पास आ रही है। सो उसने चट्टान को सिधे अपनी छाती पर उतारने का आदेश दिया।

जब चट्टान पास आई तो उसे असलियत पता चली तो उसने अनन फनन में चट्टान उसके ऊपर गिरने से पहले भानगढ़ उजाड़ने का श्राप दे दिया और खुद चट्टान के नीचे दब कर मर गया। सिद्ध रानी को यह सब समझते देर न लगी  और उसने तुरंत नगर को खाली करने का आदेश दे दिया। इस तरह नगर खाली होकर उजाड़ हो गया और रानी तांत्रिक के श्राप की भेंट चढ़ गई।

आस पास के गांव के लोगों को यकीन है कि सिंघिया के श्राप की वजह से ही रत्नावली और भानगढ़ के बाकी के निवासियों की रूहें अब भी किले में भटकती है। इसके अलावा रात के वक्त इन खण्डरों में जाने वाला कभी वापिस लौटकर नहीं आता। भानगढ़ में किला परिसर के हनुमान गेट पर सुरक्षा में तैनात पुरातत्त्व विभाग के सुरक्षा गार्डो से जब मैंने भूतों के विषय में जानकारी चाही तो उन्होंने बताया कि उन्हें यहां कभी भूत होने का एहसास नहीं हुआ और न ही उन्हें कभी डर लगा।

भानगढ़ किले का वास्तु विश्लेषण करके देखते हैं कि इस किले के आस पास की भौगोलिक स्थिति और किले की बनावट में ऐसा क्या है कि यह स्थान दुनियां के प्रथम पांच प्रसिद्ध प्रेत ग्रस्त स्थानों में गिना जाता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार किसी भी स्थान की नकारात्मक ऊर्जा के कारण ही इस प्रकार का छल होता है कि वहां भूत प्रेत या कोई साया है।

किसी भी भवन में या उसके परिसर के अंदर नैऋत्य कोण के वास्तु दोषों जैसे नैऋत्य कोण में ऊंचाई हो, नमी रहती हो, पानी जमा रहता हो, दिवारों पर सीलन हो, दिवारों पर से रंग की पपड़ियां उतरी हुई हो।  नैऋत्य कोण के दक्षिण या पश्चिम भाग में बढ़ाव हो। इन दोषों के कारण  नैऋत्य कोण में हवा प्रवाह निर्बाध्य रूप से न हो पाने के कारण वहां बहुत ज्यादा मात्रा में नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न हो जाती है। भवन व उसके परिसर के नैऋत्य कोण में वास्तु दोषों के साथ साथ यदि ईशान कोण ऊंचा हो दबा कटा या घटा हो या जरूरत से ज्यादा भवन या उसका परिसर पूर्व ईशान या उत्तर ईशान की ओर बढ़ जाए इत्यादि तो नैऋत्य कोण के दोषों से उत्पन्न हुई नकारात्मक ऊर्जा के कुप्रभाव में और भी अधिक वृद्धी हो जाती है।

 इन्हीं वास्तुदोषों से उत्पन्न हुई नकारात्मक ऊर्जा के कारण यहां रहने वालों को भ्रम होता है कि वहां भूत प्रेत का वास है। भानगढ़ का किला परिसर दक्षिण और पश्चिम दिशा में पहाड़ियों से और उत्तर एवं पूर्व दिशा से पत्थरों से बनी सुरक्षा दिवारों से घिरा है। इसकी पूर्व दिशा में स्थित हनुमान गेट से अंदर घुसते ही दाहिनी ओर हनुमान मंदिर और कुछ हवेलियों के अवशेष दिखाई देते हैं। कहते हैं कि यह भानगढ़ का जौहरी बाजार था। किला परिसर के आखिरी छोर पर दोहरे आहते से घिरा तीन मंजिला महल बना है, जिसकी ऊपरी मंजिल पूरी तरह ढेर हो चुकी है।

किला परिसर के बाहरी आहाते में कभी दूसरी इमारतों के खण्डर बिखरे पड़े हैं। इनमें से एक में तवायफें रहा करती थी और इसे नृर्तकियों के महल के नाम से जाना जाता था। किले के आहाते में गोपिनाथ, सोमेश्वर, मंगलादेवी और केशव मंदिर बने हैं। सोमेश्वर मंदिर किले के दक्षिण भाग में स्थित है। मंदिर की उत्तर दिशा जोकि किले का नैऋत्य कोण है में एक बावड़ी है जिसमें तीन कुण्ड हैं।

महल पश्चिम दिशा की पहाड़ी की तलहटी की कुछ ऊंचाई पर बना है। दक्षिण और पश्चिम दिशा की पहाडियों के बीच में सोमेश्वर मंदिर के पीछे परिसर के नैऋत्य कोण का भाग गहराई लिए हुए है। जहां से पीछे की पहाड़ियों का पानी बहता हुआ सोमेश्वर मंदिर की बावड़ी में आता है और तीन कुण्ड से होता हुआ बावड़ी का पानी बहकर किला परिसर के मध्य से होता हुआ नैऋत्य कोण से पूर्व दिशा हनुमान गेट के पास स्थित हनुमान मंदिर के पीछे एक बड़े प्राकृतिक गड्ढे में एकत्र होकर परिसर के बाहर निकल जाता है। महल के आहाते की जमीन की ढलान उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा एवं नैऋत्य कोण की ओर है जहां किले के नैऋत्य कोण में केवड़े की धाड़िया हैं जहां हमेशा नमी एवं किचड़ रहता है। जब तेज हवा चलती है तो केवड़े की खुशबू चारों तरफ फैल जाती है और किले का रहस्य और भी गाढ़ा हो जाता है।

जहां एक ओर आहाते से महल में ऊपर जाने के लिए जो रैम्प बना है इस रैम्प की बनावट प्रकार ऐसा है कि महल का पूर्व ईशान कोण घट गया है और महल का वायव्य कोण का थोड़ा भाग बड़ा हुआ है। इस बढ़ाव से महल का उत्तर एवं उत्तर इशान भाग घट गया है, वहीं दूसरी ओर परिसर में उत्तर इशान बहुत ज्यादा बढ़ाव लिए हुए है जहां दिल्ली गेट स्थित है।

नैऋत्य कोण और इशान कोण के इन्हीं वास्तुदोषों के कारण भानगढ़ का किला परिसर में भूत प्रेत होने का छल होता है। भानगढ़ का किला भूतहा होने के साथ साथ प्रसिद्ध भी है। जिसे कौतुहलवश दुनियां भर के सैलानी इसको देखने आते हैं। वास्तु सिद्धातों के अनुसार जिस स्थान की उत्तर दिशा में ढलान हो व नीचाई हो और इसी के साथ वहां किला परिसर के बड़े भाग में जोहरी बाजार के पीछे उत्तर दिशा एवं ईशान कोण में बहुत ढलान व गहराई है। इसी वास्तुनुकूसता के कारण भानगढ़ को इतनी प्रसिद्धि मिली है।

                                                                                                                                                           -कुलदीप सलूजा

              


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