संतोषी माता का लो नाम, जिससे बन जाएं सब बिगड़े काम

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Friday, December 27, 2013-7:39 AM

संतोषी माता का व्रत करने का आशय है की महिलाएं अपने ह्रदय में संतुष्टि की भावना को बनाए रखें। संतोषी माता को प्रसाद के रूप में चने और गुड़ का भोग लगाया जाता है इससे भाव है कि जो वस्तु अथवा पदार्थ हमारे पास नहीं है उस के प्रति तृष्णा की भावना न रखे तो परिवार में सहज ही सम्पन्नता आने लगती है अन्यथा अपनी क्षमता से अधिक व्यय कर साधनों को अपेक्षा रखने वाले व्यक्ति से श्री और सम्पन्नता दूर होती जाती है

शुक्रवार व्रत कथा

एक बुढ़िया थी। उसका एक ही पुत्र था। बुढ़िया पुत्र के विवाह के बाद बहू से घर के सारे काम करवाती और उस बेचारी को पेट भर खाना भी नहीं देती। यह सब लड़का देखता पर मां से कुछ भी नहीं कह पाता। बहू दिन भर काम में लगी रहती- उपले थापती, रोटी-रसोई करती, बर्तन साफ करती, कपड़े धोती और इसी में उसका सारा समय बीत जाता। काफी सोच-विचारकर एक दिन लड़का मां से बोला, 'मां, मैं परदेस जा रहा हूं।´

मां को बेटे की बात पसंद आ गई तथा उसे जाने की आज्ञा दे दी। इसके बाद वह अपनी पत्नी के पास जाकर बोला, 'मैं परदेस जा रहा हूं। अपनी कुछ निशानी दे दे।´

बहू बोली, 'मेरे पास तो निशानी देने योग्य कुछ भी नहीं है।´

 यह कहकर वह पति के चरणों में गिरकर रोने लगी। इससे पति के जूतों पर गोबर से सने हाथों से छाप बन गई। पुत्र के जाने बाद सास के अत्याचार बढ़ते गए। एक दिन बहू दु:खी हो मंदिर चली गई। वहां उसने देखा कि बहुत-सी स्त्रियां पूजा कर रही थीं। उसने स्त्रियों से व्रत के बारे में जानकारी ली तो वे बोली कि हम संतोषी माता का व्रत कर रही हैं। इससे सभी प्रकार के कष्टों का नाश होता है।

स्त्रियों ने बताया,' शुक्रवार को नहा-धोकर एक लोटे में शुद्ध जल लेकर गुड़-चने का प्रसाद लेना तथा सच्चे मन से मां का पूजन करना चाहिए। खटाई भूल कर भी मत खाना और न ही किसी को देना। एक वक्त भोजन करना।´

व्रत विधान सुनकर अब वह प्रति शुक्रवार को संयम से व्रत करने लगी। माता की कृपा से कुछ दिनों के बाद पति का पत्र आया। फिर कुछ दिन बाद पैसा भी आ गया। उसने प्रसन्न मन से फिर व्रत किया तथा मंदिर में जा अन्य स्त्रियों से बोली, 'संतोषी मां की कृपा से हमें पति का पत्र तथा रुपया आया है।´

 सभी स्त्रियों ने उसे बधाई दी। बहू ने कहा, 'हे मां ! जब मेरा पति घर आ जाएगा तो मैं तुम्हारे व्रत का उद्यापन करूंगी।´

अब एक रात संतोषी मां ने उसके पति को स्वप्न दिया और कहा कि, 'तुम अपने घर क्यों नहीं जाते ?'

तो वह कहने लगा, ' सेठ का सारा सामान अभी बिका नहीं। रुपया भी अभी नहीं आया है। '

उसने सेठ को स्वप्न की सारी बात कही तथा घर जाने की इजाजत मांगी पर सेठ ने इनकार कर दिया। मां की कृपा से कई व्यापारी आए, सोना-चांदी तथा अन्य सामान खरीदकर ले गए। कर्ज़दार भी रुपया लौटा गए। अब तो साहूकार ने उसे घर जाने की इजाजत दे दी। घर आकर पुत्र ने अपनी मां व पत्नी को बहुत सारे रुपए दिए। पत्नी ने कहा कि मुझे संतोषी माता के व्रत का उद्यापन करना है।

 उसने सभी को न्योता दे उद्यापन की सारी तैयारी की। पड़ोस की एक स्त्री उसे सुखी देख ईर्ष्या करने लगी थी। उसने अपने बच्चों को सिखा दिया कि तुम भोजन के समय खटाई जरूर मांगना। उद्यापन के समय खाना खाते-खाते बच्चे खटाई के लिए मचल उठे। तो बहू ने पैसा देकर उन्हें बहलाया। बच्चे दुकान से उन पैसों की इमली-खटाई खरीदकर खाने लगे।

तो बहू पर माता ने कोप किया। राजा के दूत उसके पति को पकड़कर ले जाने लगे। तो किसी ने बताया कि उद्यापन में बच्चों ने पैसों की इमली खटाई खाई है तो बहू ने पुन: व्रत के उद्यापन का संकल्प किया। संकल्प के बाद वह मंदिर से निकली तो राह में पति आता दिखाई दिया।

पति बोला,' इतना धन जो कमाया है, उसका टैक्स राजा ने मांगा था। '

अगले शुक्रवार को उसने फिर विधिवत व्रत का उद्यापन किया। इससे संतोषी मां प्रसन्न हुईं। नौ माह बाद चांद-सा सुंदर पुत्र हुआ। अब सास, बहू तथा बेटा मां की कृपा से आनंद से रहने लगे।

संतोषी माता व्रत फल
संतोषी माता का व्रत करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है। लक्ष्मी आती है। मन की चिन्ताएं दूर होती है। घर में सुख होने से मन को प्रसन्नता और शान्ति मिलती है। निपूती को पुत्र मिलता है, प्रीतम बाहर गया हो तो शीध्र घर आ जाता है। क्वांरी कन्या को मन पसंद वर मिलता है, बहुत दिनों से मुकदमा चल रहा हो तो वो खत्म हो जाता है, कलह क्लेश की निवृति हो सुख-शान्ति का समावेश होता है।

माता संतोषी को भोग लगाते समय आरती करें

मैया योगेश्वरी भोग लगाओ मैया भुवनेश्वरी ।
भोग लगाओ माता अन्नपूर्णेश्वरी मधुर पदार्थ मन भाए ॥
थाल सजाऊं खाजा खीर प्रेम सहित विनती करूं धर धीर ।
तुम माता करुणा गंभीर भक्त चना गुड़ प्रिय पाए ॥
शुक्रवार तेरो दिन प्यारो कथा में पधारो दुःख टारो ।
भाव मन में तेरो न्यारो मन मानै दुःख प्रगटाए ॥
तेरा तुझको दे रहे, करो कृतारथ मात ।
भोग लग मां कर कृपा, कर परिपूरन काज ॥
करो क्षमा मेरी भूल को तुम हो मां सर्वज्ञ ॥
सब बिधि अर्पित मात हूं, मैं बिल्कुल अल्पज्ञ ॥
 कुछ न मांगूं आपसे दो हित को पहचान ।
 मां संतोषी आप हैं दया-स्नेह की खान ॥


 ॥ बोलो संतोषी माता की जय ॥




 


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