...वो द्वार जहां खुलता है स्‍वर्ग का रास्‍ता

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Saturday, March 29, 2014-8:05 AM

कुरआन शरीफ
‘तुम अल्लाह के साथ इंकार की नीति कैसे अपनाते हो, जबकि तुम निर्जीव थे, उसने तुम्हें जीवन प्रदान किया फिर वही तुम्हें मृत्यु देगा, फिर वही तुम्हें पुन: जीवित करेगा फिर उसी की ओर तुम्हें पलट कर जाना है।’
(कुरआन : 2 : 28)
                      
कुरआन के अनुसार ईश्वर ने इंसान को एक निश्चित अवधि के लिए इस जमीन पर भेजा है और उसे जिंदगी के लिए जरूरी साधन और उनके इस्तेमाल के लिए बुद्धि और विवेक प्रदान किया। फिर उसके मार्गदर्शन के लिए इंसानों में से ही अपने दूत नियुक्त किए। उनके साथ इंसानों के मार्गदर्शन के लिए किताबें भेजीं। उसने इंसान को आदेश दिया कि वह ईश्वर के ‘खलीफा’ (प्रबंधकर्ता) की हैसियत से इस जमीन पर रहे, बसे और इसका प्रबंध ईश्वर के निर्देशानुसार चलाए। उसे एक निश्चित अवधि के बाद लौट कर ईश्वर ही की ओर जाना है और उसके सामने खड़े होकर अपने उन सभी कर्मों का लेखा-जोखा देना है जो उसने धरती पर किए।
 
‘फिर जिस किसी ने कण बराबर अच्छा कर्म किया होगा वह उसे देख लेगा और जिस किसी ने कण बराबर बुरा कर्म किया होगा वह उसे देख लेगा। (कुरआन-99 :7, 8)  

                      
जिस किसी ने ईश्वर के आदेशानुसार धरती पर जीवन गुजारा वह उसका कृपा पात्र ठहरेगा और उसे स्वर्ग में रखा जाएगा। जहां वह सब कुछ होगा, जो वह चाहेगा बल्कि उससे भी अधिक सुख एवं आनन्द उसे मिलेगा। जबकि ईश्वर की अवज्ञा करते हुए जीवन बिताने वाले का स्थान नर्क है जहां उसकी कल्पना से अधिक कष्टों का उसे सामना करना होगा। हर एक शख्स को न्याय के दिन दुबारा उठाया जाएगा ताकि ईश्वर उसके कर्मों के अनुसार फैसला करे।

                                                                                                                                डॉ. मोहम्मद इकबाल सिद्दीकी  
                                                                                                                                 इस्लामी विद्वान, जयपुर


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