नवरात्र में शक्ति पूजा ही क्यों?

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Monday, April 07, 2014-10:25 AM

नवरात्रि की नौ रातों में देवी के सभी नाम रुपों की आराधना की जाती है। शिव में शक्ति या महामाया है, इसे निकाल दिया जाए तो शिव ही रह जाएगा अर्थात् शक्ति के सिद्ध हो जाने से शिव तो अपने आप सिद्ध हो जाएंगे। इसलिए इस सिद्ध काल में शक्ति की उपासना की जाती है। देवी दुर्गा ही शक्ति हैं। इनके कई रूप हैं, पर मूल दुर्गा ही है, यही दुर्गतिनाशिनी हैं। दुर्गा ही सर्वव्यापिनी हैं। हमारे समक्ष जो दृश्य है जैसे सारे भुवन, स्त्री, पुरुष, पशु, पक्षी और समस्त भूत दुर्गा के ही स्वरूप हैं।

धन प्राप्ति के लिए भी शक्ति की जरूरत है और प्राप्त धन की सुरक्षा के लिए भी शक्ति आवश्यक है। हमें अपनी जायदाद, परिवार सबकी सुरक्षा के निमित्त शक्ति की आवश्यकता होती है, बिना शक्ति न तो भक्ति संभव है और न ही भोग। जीवन को जीने के लिए शक्ति का उपयोग हर क्षेत्र में आवश्यक है। अत: बिना शक्ति की साधना के जीवन सराहनीय नहीं है।

मां दुर्गा की पूजा को शक्ति-पूजन भी कहा जाता है। राक्षसराज रावण पर विजय पाने के लिए स्वयं भगवान राम ने भी शक्ति-पूजा की थी। प्रतिवर्ष शरद ऋतु में करोड़ों हिंदू दुर्गा-पूजा मनाते हैं। देवी का हरेक नाम और रुप दिव्य शक्ति के एक विलक्षण गुण या स्वरूप का प्रतीक है। नवदुर्गा दुर्गा शक्ति के नौ स्वरूप हैं जो कि नकारात्मकता के प्रति एक ढाल का काम करती हैं। दिव्यता के इस दुर्गा देवी स्वरूप का यही महत्व है। नवरात्र दुर्गा की पूजा का विशेष अवसर है ताकि जीवन में ये सब गुण एक साथ पनपें और बढ़ें . सामंजस्य और एकता बनी रहे।

नवरात्र के नौ दिनों को नवरात्र ही क्यों कहते हैं?


नवरात्र दिन काल का वह भाग है जिसमें इंद्रियां अपने विषयों में रत रहती हैंं और रात्रि काल के भाग में इंद्रियां अपने विषयों से निवृत्त होकर अंतर्मुखी हो जाती हैं। किसी साधना को सफल करना है तो उसके प्रति हमें अंतर्मुखी होना पड़ेगा। इस प्रकार इन नौ दिनों में अपने को अंतर्मुखी कर जगत-जननी की उपासना में रत कर लेना चाहिए। इसलिए इन दिनों को नवरात्र कहते हैंं।
















 


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