धरती को संभालना मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य

  • धरती को संभालना मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य
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Friday, May 19, 2017-5:27 PM

सभ्यता के आरंभिक दौर में मनुष्य पूर्णतया धरती से जुड़ा था। चलते-फिरते, बैठते, खाते, सोते वह निरंतर धरती के सान्निध्य में रहता था। समस्त जीवों और वनस्पतियों को उसी से पोषण मिलता। इसीलिए धरती को माता का स्थान दिया गया। चूंकि उसी में एक दिन शरीर का विलोप हो जाता है, इसलिए संतों ने शरीर को माटी की संज्ञा दी है। इस सबके चलते मां समान धरती की आराधना सभी समुदायों में होती रही। जिस प्रकार मां बच्चों की भूल-चूक की अनदेखी कर उनके अनुचित कृत्य स्वयं पर ले लेती है, वैसे ही धरती बिजली के या अन्य झटके अपने भीतर समा लेती है और उस पर उलट दिए गए तमाम कचरे की विषाक्तता को निराकृत, समाशोधित कर संवारती है। अल्पकालीन, निजी हितों से अभिप्रेरित हो कर धरती का निरंतर दोहन, इससे अधिकाधिक लाभ उठाने का प्रयास और इसकी हिफाजत के सवाल से उदासीनता का सिलसिला लंबे समय तक चलने वाला नहीं है। 

धरती की व्यवस्था से अवांछित खिलवाड़ हमारा जीवन दुष्कर कर देगा। जो हम सीधे नहीं समझना चाहते उसे प्रकृति अपने ढंग से सिखाना जानती है। धरती की उपेक्षा का अन्य कारण मनुष्य की सीमित जानकारी का दंभ है। अलबर्ट आइंस्टाइन, थॉमस एडिसन, आइजक न्यूटन, बेंजामिन फ्रैंकलिन, ग्राहम बैल जैसे शीर्ष विज्ञानी प्रकृति के अनुपम, महान स्वरूप के समक्ष नतमस्तक रह कर वैज्ञानिक प्रयासों और मनुष्य के अहंकार के घिनौनेपन का बेबाक उल्लेख करते रहे। विक्टर शाबर्गर ने कहा, ‘‘पृथ्वी माता ऐसी अस्मिता है जिसकी थाह विज्ञान कभी नहीं ले सकेगा।’’ एडिसन की राय में, ‘‘जब तक घास का एक तृण प्रयोगशाला में ईजाद नहीं कर लिया जाता तब तक प्रकृति तथाकथित वैज्ञानिक ज्ञान का उपहास करती रहेगी।’’

धरतीपुत्र होने के नाते इससे हमारा रिश्ता टूट नहीं सकता, कहने को हम कुछ भी कहते रहें। जैसे डिजिटल तौर-तरीकों के पुरजोर पक्षधरों की बात तभी बनती है जब वे फैक्टरी या मकान की नींव धरने से पहले भूमि पूजन करवाते हैं। कुपुत्र की भांति अपनी चेष्टाओं से हम धरती को आहत करेंगे तो बाहरी विपदाएं आएंगी, अंदरूनी सामंजस्य को भी डावांडोल करेंगे जो पारस्परिक वैमनस्य, तनाव, क्लेश आदि में परिलक्षित होता है।
 

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