हिंसा की डर से अफगान शरणार्थियों का स्वदेश लौटने से इंकार

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Sunday, December 22, 2013-12:24 PM

नई दिल्ली: अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की जाने के तैयारी के बीच दिल्ली में रहने वाले अफगान शरणार्थियों ने हिंसा की डर से अपने देश लौटने से इंकार किया है। युद्धग्रस्त अफगानिस्तान से बड़ी संख्या में शरणार्थी 1979 में यहां आए और दक्षिणी दिल्ली के लाजपत नगर में रहने लगे। 1979 में सोवियत संघ के आक्रमण के बाद अफगानिस्तान में लंबे समय तक युद्ध चला था। तालिबान का शासन आने के बाद अफगान शरणार्थियों का भारत की ओर फिर पलायन हुआ।

विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत में 2011 में 18,000 से अधिक अफगान शरणार्थी थे। इनमें से करीब 10,000 शरणार्थी संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के साथ पंजीकृत हैं। अफगान शरणार्थियों को डर है कि अमेरिका नीत गठबंधन सेना के अफगानिस्तान को चले जाने के बाद हिंसा जारी रह सकती है और तालिबान का भी खतरा है।

शेर मोहम्मद (35) करीब एक साल पहले तालिबान के डर से भारत आए थे। उनके 11 साल के बेटे आमिर को तालिबान ने अगवा कर लिया था। उन्होंने कहा, ‘‘बातचीत के बाद तालिबान ने उसे छोड़ दिया। इसके तत्काल बाद हम भारत आ गए। अगर मैं लौटा तो वे हमें जिंदा नहीं रहने देंगे। वे हमें मार डालेंगे। सब खत्म हो जाएगा।’’

अफगानिस्तान के गजनी प्रांत से आए मोहम्मद उन हजारों अफगान शरणार्थियों में शामिल हैं, जो भारत में रह रहे हैं। वह अफगानिस्तान नहीं लौटना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें तालिबान से खतरा है। मोहम्मद और उनका बड़ा बेटा हामिद (15) लाजपत नगर में फास्टफूड स्टॉल चलाते हैं। मोहम्मद के बच्चे अलकनंदा स्थित डॉन बॉस्को स्कूल में पढ़ते हैं। पढ़ाई के बाद हामिद स्टॉल पर अपने पिता की मदद करता है।

काबुल के रहने वाले 26 वर्षीय सुलेमान को भी हिंसा का डर सता रहा है। वह कहते हैं, ‘‘अफगानिस्तान में स्थिति अभी बहुत खराब है। वहां शांति का कोई संकेत नहीं है। लोगों को डर है कि नाटो सैनिकों के लौटने के बाद अफगानिस्तान फिर से तालिबान के हाथों में चला जाएगा। स्वदेश लौटने के लिए यह सुरक्षित समय नहीं है।’’
 


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