प्रधानमंत्री का नाम ‘साजिशकर्ता’ के रूप में होना चाहिए: पूर्व कोयला सचिव

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Wednesday, October 16, 2013-5:11 PM

हैदराबाद: कोयला खदान आवंटन मामले में सीबीआई जांच का सामना कर रहे पूर्व कोयला सचिव पी सी पारेख ने आज कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोयला मंत्रालय के प्रमुख के रूप में अंतिम निर्णय किया जिससे उनका नाम भी साजिशकर्ता के रूप में होना चाहिए तथा और मामले में उन्हें आरोपी बनाया जाना चाहिए। पारेख के इस बयान से राजनीतिक हलकों में नया तूफान खड़ा हो गया है। पारेख ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘....अगर कोई साजिश हुई है तब इसमें विभिन्न लोग शामिल हैं। इनमें के एम बिड़ला हैं जिन्होंने अर्जी लगाई थी। इसमें मैं भी हूं, जिसने मामले को देखा था और सिफारिश की थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं जो उस समय कोयला मंत्री थे और जिन्होंने अंतिम निर्णय किया था, वह तीसरे साजिशकर्ता हैं।’’

  उन्होंने कहा, ‘‘इसीलिए अगर साजिश हुई है तो हम सभी को आरोपी बनाया जाना चाहिए।’’ यह पूछे जाने पर कि क्या प्रधानमंत्री का नाम ‘पहले साजिशकर्ता’ के रूप में लिया जाना चाहिए, उन्होंने कहा, ‘‘निश्चित रूप से। उन्होंने ही अंतिम निर्णय किया था....जवाबदेही प्रधानमंत्री की थी क्योंकि वह मेरी सिफारिशों को खारिज कर सकते थे। कोयला मंत्री के नाते यह पूरी तरह उनकी जवाबदेही थी।’’ पारेख ने कहा, ‘‘सीबीआई को यदि यह लगता है कि कोई साजिश हुई है, तो उन्होंने बिड़ला और मुझे ही क्यों चुना। उसने प्रधानमंत्री का नाम क्यों नहीं लिया। अगर साजिश हुई है तो जो भी इससे जुड़ा है, वह साजिश का हिस्सा है।’’ सीबीआई ने आठ साल पहले ओडि़शा में दो कोयला खानों के आवंटन में कथित अनियमितता के सिलिसिले में आपराधिक साजिश तथा भ्रष्टाचार निरोधक कानून की विभिन्न धाराओं के तहत कुमार मंगलम बिड़ला, पारेख तथा अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है।

 पारेख ने कहा कि हिंडाल्को का ‘सही फैसला’ था। उन्होंने बताया कि हिंडाल्को तथा सार्वजनिक क्षेत्र की नेवेली लिग्नाइट कारपोरेशन ने उसी कोयला खदान के लिये आवेदन दिये थे। उन्होंने बताया कि कोयला मंत्रालय के अधीन आने वाली जांच समिति ने यह निर्णय किया था कि यह खदान नेवेली को आवंटित किया जाना चाहिए क्योंकि वह सार्वजनिक उपक्रम है और इसके लिये पात्र भी है। लेकिन इस फैसले के बाद बिड़ला ने प्रधानमंत्री को ज्ञापन दिया जिसमें कहा गया था कि यह कोयला खान हिंडाल्को को आवंटित की जानी चाएिह। बिड़ला ने कहा था कि की कंपनी इसके लिए समान रूप से योग्य है और इसके लिए प्रथम आवेदन उसका है।  पारेख के इस बयान को आधार बना कर भाजपा तथा वाम दलों ने प्रधानमंत्री पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री इस विवादास्पद आवंटन की जवाबदेही से नहीं बच सकते क्योंकि उस समय कोयला मंत्रालय उनके ही पास था।


इन पार्टियों ने इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है। पारेख ने कहा, ‘‘मुझे उनकी बात में दम लगा और सुझाव दिया कि हिंडाल्को तथा नेवेली को संयुक्त उद्यम गठित करना चाहिए। मेरी सिफारिश को प्रधानमंत्री ने मंजूरी दी।’’ यह पूछे जाने पर कि क्या सीबीआई ने प्रधानमंत्री का नाम जानबूझकर छोड़ दिया है, पूर्व नौकरशाह ने कहा, ‘‘यह प्रश्न सीबीआई से पूछा जाना चाहिए कि उनका नाम क्यों छोड़ा गया।’’ यहां सीबीआई अदालत में ताजा प्राथमिकी दर्ज करने के बाद एजेंसी की टीम ने मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद तथा भुवनेश्वर में करीब छह परिसरों की तलाशी ली। जिन परिसरों की तलाशी ली गयी है, उसमें हिंडालको के कार्यालय तथा हैदराबाद के सिकंदराबाद में पारेख का आवास शामिल हैं।अपने खिलाफ आरोप को आधारहीन बताते हुए पारेख ने कहा कि उन्हें सरकार के निर्णय में कुछ भी गलती नहीं दिखती।


 पूर्व कोयला सचिव पारेख ने कहा, ‘‘वास्तव में निर्णय लेने में कुछ भी गलत नहीं है। जो भी निर्णय किये गये वे निष्पक्ष तथा सही थे। मुझे नहीं पता कि आखिर सीबीआई को इसमें साजिश क्यों नजर आ रही है।’’ उन्होंने यह भी कहा कि सीबीआई को तत्कालीन कोयला राज्यमंत्री डी नारायण राव का नाम निश्चित रूप से लेना चाहिए क्योंकि फाइल उनके जरिये ही आगे गयी थी। एक सवाल के जवाब में पारेख ने कहा कि उन्हें ओडि़शा में तालाबिरा दो तथा तालाबीरा तीन के आवंटन के मुद्दे पर कभी भी प्रधानमंत्री कार्यालय से कोई दबाव का सामना नहीं करना पड़ा।

उन्होंने कहा, ‘‘हां, सांसदों की तरफ से जरूर लांबिंग हुई थी लेकिन पीएमओ की तरफ से कोई दबाव नहीं था।’’  पारेख ने दावा किया कि सीबीआई निष्पक्ष और सही निर्णय तथा गलत निर्णय के बीच अंतर करने में विफल रही। उन्होंने कहा, ‘‘अगर सीबीआई इस तरह व्यवहार करती है, तब लोगों खासकर युवा अधिकारियों के लिये निर्णय लेना कठिन होगा। उन्हें पूरे मामले पर फिर से गौर करना चाहिए और इसे फाड़ देना चाहिए। ’’

पारेख ने कहा कि कोयला सचिव के रूप में उन्होंने कोयला आवंटन प्रक्रियाओं को ज्यादा पारदर्शी बनाने की कोशिश की। उन्होंने इसके लिये संबंधित कानून में संशोधन कर खुली नीलामी तथा ई-नीलामी की सिफारिश की थी।   उन्होंने दावा किया कि कोयला मंत्री शिबू सोरेन इस विचार का विरोध किया था लेकिन जब उन्होंने सरकार से इस्तीफा दे दिया तो प्रधानमंत्री ने इस विचार को मंजूरी दी और उनसे केंद्रीय मंत्रिमंडल के लिये नोट तैयार करने को कहा। पारेख ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय कानून में बदलाव लाने के लिये अध्यादेश लाने का विरोध किया और संसद में विधेयक लाने को तरजीह दी।


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