एक बार फिर शरणार्थी बन रहे हैं लोग

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Wednesday, October 30, 2013-5:57 PM

नई दिल्ली/मुजफ्फरनगर (हर्ष कुमार सिंह): वेस्ट यूपी के मुजफ्फरनगर जिले के सांप्रदायिक दंगों को लेकर चल रही राजनीति  एक बात है और इसे लेकर चल रही जांच और राहत का काम एक अलग चीज है। लगभग एक महीने तक चले इस दंगे के बाद जहां हालात सामान्य होने लगे थे, वहीं यूपी सरकार की नीतियों की वजह से परिस्थितियां चाहकर भी सुधरने का नाम नहीं ले रही हैं। 

अब अखिलेश सरकार ने हर दंगा पीड़ित परिवार को पांच-पांच लाख रुपये देने की घोषणा करके आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एक और दांव चल दिया है। इस घोषणा से जरूरतमंदों को राहत तो मिलेगी लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलू यह है कि लगभग खाली होते जा रहे शरणार्थी शिविर एकदम से भरे नजर आने लगे हैं। जो लोग गांवों में वापस लौट गए थे वे फिर से शरणार्थी बनकर मुआवजा पाने का कोशिश में लग गए हैं। मुजफ्फरनगर के शाहपुर ब्लाक के गांव कुटबी में मुस्लिम परिवारों पर हमला करके पांच लोगं की हत्या कर दी गई थी और घरों में आग लगा दी गई थी। यहां हुई हिंसा सबसे ज्यादा चर्चाओं में रही थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी जब मुजफ्फरनगर दौरे पर आए थे तो सबसे पहले यहीं गए थे। इस गांव के मुस्लिम परिवारों का शिविर निकटवर्ती गांव बसी कला के मदरसे में चल रहा है और कुछ परिवार शाहपुर कस्बे में चल रहे शिविर में रह रहे हैं। 

वैसे तो यहां पर लगभग एक हजार लोग रह रहे थे लेकिन सरकारी आंकड़ों के अनुसार, यहां 900 लोग रह रहे हैं और जो हिसाब निकलकर सामने आया है उसके मुताबिक ये लोग 265 परिवारों का हिस्सा हैं। इन आंकड़ों पर सहज ही यकीन नहीं किया जा सकता। मुस्लिम परिवार अक्सर बड़े होते हैं और इस हिसाब से यहां एक परिवार में लगभग तीन सदस्यों का औसत ही निकलकर सामने आ रहा है। पांच अक्तूबर को जब शिवपाल यादव के नेतृत्व में दस मंत्रियों का प्रतिनिधिमंडल यहां आया था तो यह बात उठी थी कि मदरसों में चल रहे शिविरों में रह रहे लोगं को जान बूझकर गांवों में वापस नहीं जाने दिया जा रहा है। 

मदरसों की प्रबंध समितियों ने ही इन शिविरों के संचालन का भी जिम्मा लिया हुआ है और इस बारे में यूपी सरकार को जो रिपोर्ट मिली थी उसमें ये कहा गया था कि मदरसों के संचालक नहीं चाहते कि ये लोग गांव में वापस लौटें। इस तथ्य के उजागर हो जाने के बाद काफी विवाद हुआ था और मदरसों के मौलानाओं ने तीखी प्रतिक्रियाएं दी थीं। बात अगर कुटबा के पीड़ितों की ही करें तो यहां जमीयत उलेमा ए हिंद ने 12 बीघा जमीन पास के ही पलड़ा गांव के मजरे में खरीदी है और यहां पर सौ मकान बनवाने का फैसला किया है। 27 अक्तूबर को यहां बाकायदा ईंटे भी पहुंचनी शुरू हो गई। 

आसान नहीं है मुआवजे का वितरण: अखिलेश सरकार के दंगा पीड़ितों के लिए घोषित किए गए विशेष राहत पैकेज के बाद से सारे शिविरों में फिर से भीड़ नजर आने लगी है। एडीएम प्रशासन डॉ. इंद्रमणि त्रिपाठी का कहना है कि पूरे जिले में 14 शिविरों में 7732 लोग रह रहे हैं जबकि शिविर संचालकों का कहना है कि अभी भी 25 हजार लोग शरणार्थियों का जीवन गुजार रहे हैं। 

फिर से भर गए हैं सारे कैंप: जहां लोगं ने धीरे-धीरे हालात सामान्य हो जाने के बाद शिविरों से घरों की ओर लौटना शुरू कर दिया था वहीं पांच लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा के बाद ये लोग फिर से शरणार्थी बन गए हैं। इसका सबसे जीता जागता उदाहरण शामली जिले के गांव बहावड़ी का नवाब मियां है। प्रशासन ने दंग पीड़ितों को वायदा किया था अगर वे गांव वापस लौटना चाहेंगे तो उन्हें 15 दिन का राशन सरकार की ओर से दिया जाएगा। 

इसके बाद बहुत से लोग लौट गए थे। बहावड़ी के नवाब मियां भी इनमें से ही एक थे। लोकल मीडिया ने नवाब मियां की वापसी की खबर को काफी हाईलाइट किया था और जब 22 अक्तूबर को वे वापस लौटे थे तो एक कहानी भी अखबारों में छपी थी। इसमें कहा गया था कि नवाब ने गांव की रहने वाली हिंदू महिला शिमला को बहन बनाया हुआ था। 22 को जब वह गांव लौटा था तो शिमला ने उसका स्वागत किया था लेकिन जैसे ही अखिलेश सरकार ने पांच लाख रुपये की घोषणा की तो 28 अक्तूबर को नवाब फिर परिवार के साथ शरणार्थी शिविर में पहुंच गया। और ऐसे एक नहीं हजारों नवाब मियां हैं। 


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