बल्ली को अकालियों के विरोध का मिला खामियाजा

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Thursday, November 14, 2013-9:09 PM

नई दिल्ली: हरीनगर सीट से पिछले चार बार से अजेय रहे विधायक हरशरण सिंह बल्ली को आखिरकार अकालियों से भीतरघात करना महंगा पड़ ही गया है। हालांकि, दिल्ली के सिखों में यह आम धारणा रही है कि भाजपा अकाली दल को जो सीटें देती है उनको उनका ही संगठन जानबूझ कर जीतने नहीं देता। ताकि, उनको सीट पर दावा पक्का न हो जाए। अकाली नेता मंजीत सिंह जीके के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा और अकाली दल में बेहतर तालमेल बनना शुरू हुआ।

2010 में गुरुतेग बहादुर नगर के लिए हुए निगम उपचुनाव में न केवल अकाली दल ने भाजपा से अपनी सीट वापस ली, बल्कि उनके उम्मीदवार कैप्टन इंदरप्रीत सिंह हजारों वोटों से विजयी हुए। उसके बाद 2012 में हुए दिल्ली नगर निगम चुनाव में अकाली दल ने 8 सीटें भाजपा से ली। जिसमें से 5 उम्मीदवार निगम पार्षद बनने में कामयाब रहे। इस बार भी विधानसभा चुनावों के लिए अकाली दल को चारों सीटों का भरोसा लग रहा है।

हालंाकि, पिछले निगम चुनाव में अकाली दल के वरिष्ठ नेता अवतार सिंह हित हरीनगर नगर निगम सीट से 5 हजार वोटों से कांग्रेस के उम्मीदवार राजकुमारी ढिल्लों से हार गए थे। चूंकि, यह सीट अकाली दल ने नांगल राय सीट के महिला आरक्षित होने के बाद बदले में ली थी। उसका गुस्सा वहां की स्थानीय निगम पार्षद किरण चोपड़ा और विधायक बल्ली  दोनों को था।

हार के बाद अवतार सिंह हित के समर्थकों ने शरेआम कहा था कि बल्ली  ने मंडल को हमारे साथ अंतिम समय भितरघात करने के लिए मजबूर कर दिया, ताकि अकालियों का दावा इस सीट पर हमेशा के लिए न हो जाए।

2013 में हुए गुरुद्वारा चुनाव में बल्ली के विधानसभा हल्के में आती सुभाषनगर सीट पर बल्ली ने जानबूझ कर अकाली उम्मीदवार जगजीत सिंह रिहल को सरना के उम्मीदवार तेजेंद्रपाल सिंह गोपा के सामने भीतरघात करके हरवा दिया था।


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