वित्तीय घाटा घटाने पर समझौता नहीं : चिदंबरम

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Wednesday, December 11, 2013-9:26 PM

नई दिल्ली: सरकार वित्तीय घाटा पर समझौता नहीं करेगी और वित्त वर्ष 2016-17 तक इसे कम करते हुए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन फीसदी के दायरे में सीमित कर दिया जाएगा। यह बात केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बुधवार को कही। दिल्ली आर्थिक कॉनक्लेव 2013 में उन्होंने कहा, ‘‘सर्वोच्च प्राथमिकता है वित्तीय घाटा। इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता है और मैं सरकार की ओर से बोल रहा हूं कि वित्तीय मितव्ययिता के रास्ते पर आगे बढऩे के फैसले पर कोई समझौता नहीं होगा।

वित्तीय घाटा कम करने के रास्ते पर चरणबद्ध तरीके से, साल-दर-साल बढ़ा जाएगा और 2016-17 तक इसे जीडीपी के तीन फीसदी तक ले आने का लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा।’’ मार्च 2014 में समाप्त होने वाले मौजूदा कारोबारी साल के लिए वित्तीय घाटा का लक्ष्य है जीडीपी का 4.8 फीसदी। उन्होंने कहा, ‘‘चालू खाता घाटा पर भी ध्यान दिया जाएगा। भारत 2012-13 की तरह 88 अरब डॉलर आकार के चालू खाता घाटा का बोझ नहीं उठा सकता है।

न ही भारत सोने के आयात पर 50 अरब डॉलर जैसा खर्च उठा सकता है। न ही भारत को प्रचुर मात्रा में कोयले का भंडार रहते हुए कोयले का अयात करना चाहिए। न ही भारत को नीतिगत अवरोध में फंसे रहना चाहिए, जिसके कारण उत्पादन क्षमता रहते हुए इसे विभिन्न वस्तुओं का आयात करना पड़ता है।’’ उन्होंने कहा कि इस सूची में अगली प्राथमिकता महंगाई की है। उन्होंने कहा, ‘‘आज यह आम धारणा है कि उच्च महंगाई की कीमत सरकार को चुकानी होगी, खासकर तब जब यह लंबे समय तक ऊपरी स्तर पर बनी रहे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘महंगाई और खासकर खाद्य महंगाई का जवाब आपूर्ति बढ़ाना और वस्तुओं तथा खाद्य पदार्थों के भंडारण, परिवहन, वितरण और विभिन्न बाजारों में बिक्री में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना है।’’ उन्होंने साथ ही कहा कि कटाई और विपणन के साथ बुद्धिमानीपूर्वक निपटने तथा जमाखोरी तथा मुनाफाखोरी के साथ सख्ती से निपटने की जरूरत है। उन्होंने कहा, ‘‘यह मामला राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में है। इस संबंध में दो कानून हैं : कृषि उत्पाद विपणन अधिनियम और आवश्यक वस्तु अधिनियम।’’

वित्त मंत्री ने कहा, ‘‘इस अधिनियम के अंतर्गत अधिसूचना और कार्यान्वयन का अधिकार राज्य सरकार के पास है, फिर भी राज्य सरकार कदम नहीं उठा रही है। मेरे खयाल से इस मामले में राज्य सरकारों की अकर्मण्यता को सामना लाया जाना चाहिए यह मानते हुए भी कि केंद्र सरकार को महंगाई कम करने के लिए जो भी संभव हो करना चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि वित्तीय क्षेत्र में वस्तु एवं सेवा कर, प्रत्यक्ष कर संहिता, बीमा कानून संशोधन विधेयक और समान वित्तीय संहिता परिदृश्य बदलने वाला है। उन्होंने कहा, ‘‘इनमें से हर एक पर व्यापक सहमति बनाने की जरूरत है। मेरा अनुभव है कि महीनों तक अथक परिश्रम करने के बाद सहमति बनती है, लेकिन राजनीतिक अवसरवाद के कारण यह धाराशाई हो जाती है।’’


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