न्याय की आस में हार गई जिंदगी

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Sunday, January 12, 2014-3:48 PM

नई दिल्ली (मनीषा खत्री): दिल्ली में मकान मालिक व किराएदारों के बीच चलने वाले मुकद्दमों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। परंतु न्याय के धीमे से चलने वाले पहिए के कारण हालात ये हैं कि लगभग 36 साल पुराने एक मामले में कानूनी लड़ाई इतनी लंबी चली कि जिंदगी उससे हार गई और अपना बकाया किराया वसूलने की आस में मकान मालिक स्वर्ग सिधार गया। इतना ही नहीं किराया देने से बचने वाला किराएदार भी अब इस दुनिया में नहीं रहा।

ऐसे ही एक मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने किराएदार की तरफ से दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि उसे अपने मकान-मालिक डी.के.जैन को बकाया किराया देना ही होगा। न्यायमूर्ति मनमोहन सिंह की खंडपीठ ने किराएदार अमरनाथ की तरफ से दायर याचिका को खारिज कर दिया है और कहा है कि वह निचली अदालत के उस आदेश में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है, जिसके तहत अमरनाथ को लगभग 5 साल का बकाया किराया देने का आदेश दिया गया था।

खंडपीठ ने कहा कि अमरनाथ ने यह याचिका निचली अदालत के आदेश के 4 साल बाद दायर की थी। वह यह नहीं बता पाया कि उसने ऐसा क्यों किया। कानून की दृष्टि में उसकी याचिका पर सुनवाई नहीं की जा सकती है। इसलिए उसे खारिज किया जाता है। दरअसल डी.के.जैन ने अपना तिलक बाजार में स्थित एक घर अमरनाथ व उसके साझेदार को किराए पर दिया था। इसी घर का बकाया किराया वसूलने के लिए उसने निचली अदालत में दायर किया था।

उसने अमरनाथ से एक जनवरी 1977 से 31 अगस्त 1979 की अवधि और एक सितम्बर 1979 से 30 सितम्बर 1981 की अवधि का बकाया किराया  मांगा था। किराए की कुल राशि लगभग 15 हजार 105 रुपए थी। सिविल कोर्ट ने जैन के केस को अप्रैल 1985 में खारिज कर दिया। जिसे उसने ए.डी.जे. की कोर्ट में चुनौती दी। ए.डी.जे कोर्ट ने 19 सितम्बर 1992 को सिविल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए फिर से सुनवाई का आदेश दिया।

इसी बीच मामला हाईकोर्ट पहुंच गया। जनवरी 2006 में उच्च न्यायालय ने फिर से मामले को ए.डी.जे. कोर्ट में भेज दिया। जिसके बाद 10 सितम्बर 2009 को ए.डी.जे. कोर्ट ने आदेश दिया कि अमरनाथ को एक जनवरी 1977 से 30 सितम्बर 1981 की अवधि के लिए 265 रुपए प्रति महीने के हिसाब से किराया देना होगा। इस अवधि की राशि पर 6 प्रतिशत की दर से ब्याज भी देना होगा। इसी आदेश को 4 साल बीतने के बाद अब अमरनाथ ने फिर से उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। इसी मामले की सुनवाई के दौरान अमरनाथ व जैन दोनों की मौत हो गई।


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