सीमा पार के संपर्क से कई आतंकी संगठन सक्रिय

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Monday, January 13, 2014-1:21 PM

नई दिल्ली (महेश चौहान):गणतंत्र दिवस समारोह की तैयारियों के लिए राजपथ से इंडिया गेट और वहां से आईटीओ, दिल्ली गेट से लेकर लाल किला के बीच इंतजामों को लेकर तैयारी काफी हद तक पूरी हो गई है। सुरक्षा के लिहाज से दिल्ली के सभी समारोह खासतौर पर गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और दिपावली आतंकवादियों के निशाने पर हमेशा रहे हैं।

इन दिनों में अगर आतंकवादी कोई ब्लास्ट करते हैं तो उनको अंर्तराष्ट्रीय कवरेज मिलती है। हालांकि सुरक्षा तंत्र उनकी हर कोशिश को नाकाम करने की कोशिश करता रहता है। जिनमें उनको कई बार बड़ी कामयाबी भी मिलती है। पिछले साल ही दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने लश्कर ए तौएबा के अब्दुल करीम टुंडा और एनआईए ने भटकल समेत दर्जनभर आतंकवादियों को गिरफ्तार किया था। जिनसे कई ऐसे खुलासे हुए, जिनपर आजतक पुलिस जांच करके उनके साथियों को पकडऩे की कोशिश कर रही है।

पुलिस अधिकारी बताते हैं कि पिछले तीन सालों से खुफिया तंत्र पाकिस्तानी आतंकी संगठनों पर ही नजर नहीं रख रही बल्कि पंजाब के अंडरग्राउंड आतंकी संगठन बब्बर खालासा, लिबरेशन फं्रट,खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट ही नही भारत के माओवादी और नक्सलियों  जैसे संगठनों पर भी नजर रखनी पड़ रही है। क्योंकि पिछले कुछ समय से इन संगठनों के पाकिस्तान संगठनों के साथ सांठगांठ के पुख्ता सबूत हाथ लगे हैं। उनका कहना है कि पिछले कुछ समय से खुफिया तंत्रों आदि से कुछ संदिग्ध सूचनाएं मिल रही है। जिनपर गंभीरता से काम हो रहा है।

आंतकवादियों की गतिविधियों पर सूत्र बताते हैं कि पिछले चार सालों में दिल्ली में स्लीपर सेल की तादात काफी बढ़ी है। ये स्लीपर सेल पुरानी दिल्ली,उत्तर-पूर्वी जिला, दक्षिण जिला के एक दो इलाके और बाहरी जिला के इलाकों में सक्रिय हैं। इसलिए इन इलाकों के फोन करने वालों पर भी नजर रखी जा रही है। पिछले सात सालों में जो आतंकवादी पकड़े हैं उनका कहीं न कहीं से इन इलाकों से वास्ता जरूर रहा था।

उनका कहना था कि इसी लिए ही आतंकियों के स्लीपर सेल पिछले कुछ सालों से फोन से संपर्क नही करके एक दूसरे से मिलकर जानकारियां बांट रहे हैं। इसके अलावा वे इसी तरह से हवाला की रकम का भी लेनदेन कर रहे हैं। उनका कहना है कि इसीलिए आतंकवादियों की कोशिशों को नाकाम करने के लिए सुरक्षा तंत्र गणतंत्र दिवस पर दिल्ली और दिल्ली के बॉर्डरों पर काफी पहले से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कर देते है। जिससे बड़ी वारदात को नाकाम किया जा सके।
 

इन पर रहेंगी निगाहें-

बब्बर खालसा इंटरनेशनल:  भारत में बब्बर खालसा इंटरनेशनल(बीकेआई)का गठन 1978 में हुआ था।  इसका चीफ तलविन्द्र सिंह बब्बर था। इस ग्रुप के ज्यादातर फाइनेंस विदेशों से होता है। इन्होंने पंजाब में ही खालिस्तान की मांग की थी। 1984 में भारत की पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी की हत्या के दौरान यह गु्रप खुलकर सामने आया था। जिसके बाद सरकार की आतंकवाद विरोधी कार्रवाई के बाद यह गु्रप खत्म सा हो गया था। लेकिन पिछले छह सालों से इसके पाकिस्तान आतंकी संगठनों से मिलने की पुख्ता खबरे सुरक्षा तंत्रों को मिल रही है।

40 साल पुराना है माओवादी ग्रुप : भारत में माओवादी विद्रोह 40 साल पुराना है। यह गुरिल्ला समूह के रूप में भी जाना जाता है। 1967 में गु्रप के लोग पश्चिम बंगाल के छोटे से इलाके नक्सबाड़ी में रहते थे। वहीं से गु्रप को चलाया था। जिसको शुरू में काफी हद तक दबा दिया गया था। लेकिन लेकिन उन्हें पूरी तरह से समाप्त नहीं किया था। छत्तीसगढ़,झारखंड,पश्चिम बंगाल,उड़ीसा,बिहार और आंध्र प्रदेश जैसे इलाके इस ग्रुप से प्रभावित हैं। इस गु्रप में नाबालिग लड़का-लड़की होने के साथ साथ उम्रदराज भी है।

बताया जाता है कि 1980 से अभी तक 10 हजार से ज्यादा इसके सदस्य मारे जा चुके हैं। इस गु्रप में 20 हजार से ज्यादा सशस्त्र लड़ाकू और 50 हजार से ज्यादा समर्थक है। जो एक लड़ाकू से कहीं ज्यादा ग्रुप का साथ देते हैं। जंगल ही इनका बसेरा है। 


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