जनरल बिक्रम सिंह के जनादेश पर सवालिया निशान!

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Thursday, January 16, 2014-11:09 AM

श्रीनगर: भारतीय सेना के प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह द्वारा सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) को हटाने और कश्मीर में सेना की मौजदूगी पर टिप्पणी की अलगववादियों ने आलोचना करते हुए उनके जनादेश पर सवालिया निशान लगाया। वरिष्ठ अलगाववादी नेता और हुरियत कांफ्रैंस (जी) चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी ने कहा कि भारतीय सत्ता के अहंकार से सेना के प्रमुख ने ऐसे ‘विचित्र’ बयान जारी किया है और इससे कश्मीर के बारे में स्थापना की कठोर नीति की पुष्टि होती है।

उन्होने कहा कि हम कश्मीर से सेना की पूर्ण वापसी चाहते हैं। साथ ही अफस्पा को हटाना उनकी पार्टी के लिए एक गैर मुद्दा है। तस्वीर का एक सकारात्मक पक्ष भी है कि सेना की भारी मौजूदगी और हमारे लोगों पर किए जा रहे दमनकारी उपायों के बावजूद भारत हमारी इच्छा और आजादी के लिए संकल्प को नही तोड़ पाया है। जनरल सिंह की टिप्पणी की कड़ी आलोचना करते हुए हुरियत कांफ्रैंस (एम) के चेयरमैन मीरवायज उमर फारुक ने कहा कि ऐसा लगता है कि निहित स्वार्थ सतर्क हुए हैं और इसी कारण सेना के प्रमुख ने इस तरह की टिप्पणी की है। हुरियत कांफ्रैंस सहित लोगों की यह आम राय है और उस बात के लिए लगभग सभी मुख्यधारा पार्टियां अफस्पा को हटाने का समर्थन करती है। और सेना के प्रमुख की टिप्पणी का आम जनता की राय के लिए कोई सम्मान नही है जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

मीरवायज ने जनरल सिंह द्वारा सेना के प्रमुख के रुप में मुद्दों पर जो राजनीतिक डोमेन से संबंधित है पर बात करने के अधिकार पर सवाल उठाया। यह विडंबना है कि सेना अब मुद्दों पर बात कर रही है और लगभग संवेदनशील, राजनीतिक मुद्दों पर फैसले ले रही हैं। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जे.के.एल.एफ.) के प्रमुख मोहम्मद यासीन मलिक ने कहा कि हम समझ नही पा रहे है कि भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है या कुछ और। उन्होने कहा कि अतीत में भारत के राजनीतिक परिदृश्य में सेना कुछ नही कहती थी लेकिन अब हम सेना के अधिकारियों को टेलीवीजन बहस में राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करते देखते हैं।

मलिक ने कहा कि जनरल मानिक शाह को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करने पर ठुकरा दिया था। कश्मीर एक सर्वोच्च सैन्य क्षेत्र है जहां लोगों के असंतोष को दबाने के लिए सेना तैनात है। साथ ही सदभावना के माध्यम से भ्रष्टाचार को संस्थागत किया जा रहा है। जे.के.एल.एफ. प्रमुख ने कहा कि अफस्पा को हटाना मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों के डोमेन में था और मुद्दे पर सेना की कोई भूमिका नही है। पिछले 11 सालों से हम पी.डी.पी., कांग्रेस और नैकां की सरकारों को अनुभव कर रहे हैं लेकिन काले कानूनों को हटाने में उनकी भूमिका उल्लेख के अयोग्य है। उन्होने कहा कि जब तमिलनाडू और पंजाब सरकारें उनके लोगों की फांसी को रोक सकते हैं फिर यहां मुख्यधारा पार्टियां खामोश कैसे हैं और बाद में मगरमच्छ के आंसू बहाते हैं।


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