रावत की पहचान मजबूत राजनीतिज्ञ के रूप

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Saturday, February 01, 2014-7:26 PM

देहरादून: उत्तराखंड के कददावर नेताओं में शुमार किए जाने वाले हरीश रावत ऐसे राजनीतिज्ञ माने जाते है जो अपने प्रतिद्वंदियों से मात खाने के बाद हर बार और मजबूत होकर उभरे और केंद्र में कैबिनेट मंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद अंतत: प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए।

करीब तेरह साल पहले जब केंद्र में राजग सरकार और मूल प्रदेश उत्तर प्रदेश में भाजपा के कार्यकाल में उत्तराखंड का जन्म हुआ। उस दौरान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में सामने आए हरीश रावत ने पूरे प्रदेश में ऐसा बदलाव ला दिया कि वर्ष 2002 की शुरूआत में हुए पहले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बेदखल करते हुए सरकार बना ली। हालांकि यह अलग बात है कि सत्ता तक पहुंचाने वाले रावत की मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी वयोवृद्घ कांग्रेसी नेता एनडी तिवारी के सामने खारिज कर दी गई।

पार्टी सूत्रों का मानना है कि इस समय लोकसभा चुनावों से ऐन पहले पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को हटाकर उनके स्थान पर रावत को लाए जाने के पीछे भी कांग्रेस आलाकमान को उनसे उसी करिश्मे की उम्मीद है।

27 मार्च, 1949 को अल्मोड़ा जिले की भिकियासैंण तहसील में मोहनरी गांव में जन्में हरीश रावत का बचपन से ही रूझान राजनीति की ओर रहा। अल्मोडा में भिकियासैंण और सल्ट तहसील का इलाका स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में काफी चर्चित रहा है और ऐसे वातावरण में पले बढ़े रावत का राजनीति से लगाव होना स्वभाविक ही रहा।

लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलबी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद रावत ने वकालत को अपने जीवन यापन का साधन बनाया लेकिन राजनीति का दामन भी थामे रखा। विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने भारतीय युवक कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। वर्ष 1973 में कांग्रेस की जिला युवा इकाई के प्रमुख चुने जाने वाले वे सबसे कम उम्र के युवा थे।

वर्ष 1973 और 1980 के बीच की अवधि में रावत जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक युवक कांग्रेस के महत्वपूर्ण पदों पर रहे। वर्ष 1980 में वह पहली बार अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए। उसके बाद वर्ष 1984 व 1989 में भी उन्होंने संसद में इसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।

वर्ष 1992 में उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का महत्वपूर्ण पद संभाला जिसकी जिम्मेदारी वह वर्ष 1997 तक संभालते रहे। राज्य निर्माण के पश्चात रावत प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए और उनकी अगुवाई में 2002 के विधान सभा चुनावों में कांग्रेस को बहुमत प्राप्त हुआ और उत्तराखण्ड में कांग्रेस की सरकार बनी।

तिवारी के मुकाबले मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से बाहर होने के बाद उसी साल नवम्बर में रावत को उत्तराखण्ड से राज्य सभा के सदस्य के रूप मेें भेजा गया। पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान उन्होंने हरिद्वार संसदीय सीट सें चुनाव लड़ा जहां से वह भारी मतों से जीते। उनके निकटस्थ प्रतिद्वंदी से जीत का अंतर एक लाख वोटों से भी ज्यादा रहा। पिछले काफी समय से भाजपा, सपा या बसपा की झोली में रही हरिद्वार सीट जीतने वाले रावत को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने मंत्रिमंडल में पहले राज्य मंत्री ओर बाद में कैबिनेट मंत्री का दायित्व दिया।

हालांकि, वर्ष 2012 में कांग्रेस के प्रदेश में एक बार फिर सत्ता में आने के बाद उनका नाम मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे चलता रहा लेकिन इस बार भी पार्टी आलाकमान ने उनकी दावेदारी को नकार दिया और उनकी जगह विजय बहुगुणा को तरजीह दी।

बहुगुणा के सत्ता संभालने के बाद से लगातार प्रदेश में नेत्त्व परिवर्तन की अटकलें चलती रहीं जो पिछले साल जून में आई प्राकतिक आपदा से निपटने में राज्य सरकार की कथित नाकामी के आरोपों के चलते और तेज हो गईं।


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