जन लोकपाल पर केजरीवाल का उप राज्यपाल के नाम पत्र

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Friday, February 07, 2014-11:26 PM

नई दिल्ली : आदरणीय श्री नजीब जंग साहब,

मैंने हमेशा आपको बेहद नेक इंसान और अपना हितैषी माना है। मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूं। लेकिन पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने मुझे बेहद पीड़ा पहुंचाई है। उसी को बयान करने के लिए मैं आपको यह पत्र लिख रहा हूं। अगर इस पत्र में आपकों कुछ बातें कड़वी लगे तो पहले ही मैं आपसे माफी मांग रहा हूं।

कल से मीडिया में खबर चल रही है कि आपने शायद दिल्ली जनलोकपाल बिल पर भारत के सॉलिसीटर जनरल की राय मांगी है। खबरों के मुताबिक सॉलिसिटर जनरल ने आपको राय दी है कि दिल्ली जनलोकपाल बिल असंवैधानिक है और उसको राष्ट्रपति की मंजूरी लिए बिना विधानसभा में प्रस्तुत करना भी असंवैधानिक है।

कल जब मैंने टीवी चैनलों पर यह खबर सुनी तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। क्योंकि उस बिल की कॉपी तो हमने आपको कल शाम को ही भेजी है। मीडिया के अनुसार सॉलिसीटर जनरल साहब का कहना है कि दिल्ली विधानसभा में इस कानून को प्रस्तुत करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी।

लेकिन संविधान में ऐसा कहीं नहीं लिखा है। तीन विषयों को छोड़कर संविधान दिल्ली विधानसभा को अन्य सभी विषयों पर कानून बनाने का पूरा अधिकार देता है। लेकिन यदि दिल्ली विधानसभा कोई ऐसा कानून पास करती है, जिसकी कुछ धाराएं किसी केंद्रीय कानून के खिलाफ है तो ऐसे कानून को दिल्ली विधानसभा में पारित होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी की जरूरत पड़ेगी।

ऐसा संविधान की धारा 239 एए (3)(सी)में लिखा है। संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि दिल्ली विधानसभा में कानून प्रस्तुत करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक आदेश जारी किया हुआ है जिसके तहत उन्होंने दिल्ली सरकार को आदेश दिया है कि दिल्ली विधानसभा में कानून प्रस्तुत करने से पहले केंद्रीय सरकार से मंजूरी लेनी होगी। जाहिर है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय का यह आदेश गैर संवैधानिक है। दिल्ली विधानसभा का अधिकार क्षेत्र संविधान ने तय किया है। क्या केंद्रीय गृह मंत्रालय एक आदेश पारित करके उस पर अंकुश लगा सकता है? ...

. जैसे आपने सॉलिसीटर जनरल की राय ली है वैसे ही दिल्ली सरकार ने भी देश के तीन जाने-माने वकीलों और एक रिटायर्ड चीफ जस्टिस की राय ली है। इन चारों महानुभावों का मानना है कि गृह मंत्रालय का आदेश गैर संवैधानिक है। उन चारो महानुभावों का नाम है- जस्टिस मुकुल मुदगल, पी.वी. कपूर, के.एन. भट्ट व पिनाकी मिश्रा।

इनकी राय मिलने के बाद दिल्ली कैबिनेट ने 3 फरवरी 2014 को प्रस्ताव पारित करके केंद्रीय गृह मंत्रालय के उस आदेश को वापिस लिए जाने की सिफारिश की और तब तक उसे न मानने का निर्णय लिया। यह सब बातें मैं आज आपसे मिलकर बताना चाह रहा था, लेकिन उससे पहले ही कल मीडिया में सॉलिसीटर जनरल की राय लीक हो गई। 

आप जानते हैं कि आज देश एक बहुत ही दुखद दौर से गुजर रहा है, जहां चारों ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है और राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है। ऐसे माहौल में आम आदमी पार्टी की सरकार इस देश के लोगों के लिए एक आशा की किरण के रूप में उभरी है। आम आदमी पार्टी की सरकार भ्रष्टचारियों के खिलाफ सख्त कदम उठा रही है। तो जाहिर है कि सारी भ्रष्टाचारी ताकतें इकट्ठा हो रही हैं। 

छोटी-छोटी बातों को उठाकर हमें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। मैं मानता हूं कि आपके ऊपर कांग्रेस और गृह मंत्रालय का बहुत दबाव है। मुझे मालूम है कि आने वाले दिनों में वो आप पर दबाव डालेंगे कि आप दिल्ली विधानसभा का सत्र इंदिरा गांधी स्टेडियम में न होने दें। मुझे मालूम है कि  वो आप पर दबाव डालेंगे कि आप दिल्ली विधानसभा में दिल्ली जनलोकपाल बिल प्रस्तुत न होने दें। क्योंकि उन्हें पता है कि अगर यह बिल पास हो गया तो उनमें से कई लोग जेल चले जाएंगे।

मुझे मालूम है कि वो लोग आपके दफ्तर के जरिए मुझे और मेरी सरकार को बदनाम करने के लिए चुन-चुन कर गलत तरीके से बातें लीक करवाएंगे। अब आप को तय करना है कि आप उनके दबाव को बर्दाश्त कर पाते हैं या नहीं। आप बड़े नेक इंसान हैं। मैं आपसे बहुत छोटा हूं। आपके बेटे के उम्र का हूं। फिर भी एक छोटी सी सलाह देने की धृष्टता कर रहा हूं। आपने संविधान की वफादारी की कसम खाई है। किसी पार्टी और गृह मंत्रालय की वफादारी की नहीं। कृपया संविधान को मरने मत दीजिए।

मैं इस पत्र को लीक नहीं कर रहा, परन्तु आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक कर रहा हूं, क्योंकि जो मुद्दे अभी तक लीक हुई बातों द्वारा उठाए गए हैं, उनका सार्वजनिक तौर पर बयान देना जरूरी है।

हार्दिक शुभकामनाओं सहित

           आपका

    अरविंद केजरीवाल


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