हंगामेदार रहे आप के 49 दिन

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Saturday, February 15, 2014-1:55 AM
नई दिल्ली (सतेन्द्र त्रिपाठी/ कुमार गजेन्द्र): दिल्ली सचिवालय पर अस्थाई कर्मचारियों का प्रदर्शन, आजादपुर मंडी में आढ़तियों की हड़ताल, स्वास्थ्य कर्मचारियों की हड़ताल, कानून मंत्री के खिलाफ सचिवालय में विधायकों का धरना। यह सब तो सरकार के खिलाफ हुआ और सरकार भी ड्रामे में आगे बढ़ते हुए खुद भी धरने पर जा बैठी।
 
दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के 49 दिन का कार्यकाल बेहद हंगामेदार रहा है। जनता के काम होने की बजाय केजरीवाल दूसरों पर हमला बोलने और अपनों के हमलों से बचने में ही लगे रहे। जनता से किए गए वादों के नाम पर केजरीवाल की झोली में कुछ नहीं है, लेकिन वह अपनी पीठ खुद ही थपथपाने में पीछे नहीं हैं। 
 
दिल्ली सचिवालय के बाहर जहां पहले हमेशा धारा 144 लगी हुआ करती थी, वहां आम आदमी के नाम पर अब दूसरा जंतर मंतर बनकर खड़ा हो गया है। जहां बाहर के लोगों ने धरने-प्रदर्शन कर सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने की कोशिश की, वहीं सरकार के कर्मचारियों ने भी केजरीवाल से उनकी मांगे मानने के लिए दवाब बनाया। 
 
ठेके पर काम कर रहे अध्यापकों ने तो पूरे पंद्रह दिनों तक लगातार धरने प्रदर्शन किए गए। इसके अलावा अस्पतालों में हड़ताल रही, सरकार के अंदर काम कर रहे द्रास कैडर के अधिकारियों ने सचिवालय के अंदर ही केजरीवाल को घेरने की कोशिश की। यह पहला मौका था कि जब सचिवालय के अंदर मुख्यमंत्री के कार्यालय के बाहर द्रास अधिकारियों ने अपनी मांगों को लेकर हंगामा किया। डीटीसी कर्मचारियों ने भी केजरीवाल से उन्हें पक्का करने की मांग को लेकर हड़ताल कर दी। 
 
 16 जनवरी की रात में सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने मालवीय नगर के खिड़की एक्सटेंशन में विदेशी महिलाओं के घरों पर छापेमारी का आदेश पुलिस को दिया। इस बात को लेकर कानून मंत्री और दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के बीच जमकर झड़प हो गई। हालत यह रही कि सरकार अपने मंत्री को बचाने के लिए सामने आ गई। गलती सोमनाथ भारती की थी, लेकिन केजरीवाल ने पुलिस अधिकारियों को गलत ठहराते हुए, केन्द्र सरकार के खिलाफ पूरा आंदोलन छेड़ दिया। 
 
भारत के लिए यह गणतंत्र दिवस मनाए जाने का मौका था, लेकिन देश की राजधानी के मुख्यमंत्री ने सारे कायदे-कानूनों को ताक पर रख दिया। इस दौरान उनके सबसे पुराने सहयोगी विनोद कुमार बिन्नी ने उनसे बगावत कर दी। केजरीवाल एंड कंपनी ने बिन्नी को पार्टी से बाहर करने में देर नहीं लगाई। 
 
लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज करने और दिल्ली विधानसभा पर पूरी तरह से कब्जा करने की रणनीति पर काम करते हुए केजरीवाल ने विधानसभा में जनलोकपाल बिल पास करने की बात कहकर आखिर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 

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