दंगा विस्थापितों को वोट नहीं देने दूंगा

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Thursday, March 27, 2014-4:11 AM

नई दिल्ली : पिछले वर्ष मुजफ्फरनगर में हुए दंगों को उकसाने के लिए जिन लोगों से पूछताछ की जा रही है उनमें से एक और उत्तर प्रदेश में कैराना निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी हुक्म सिंह ने इस सप्ताह के शुरू में कहा कि वह दंगों के विस्थापित लोगों को अपने निर्वाचन क्षेत्र में मतदान करने से रोकेंगे। क्यों? क्योंकि हुक्म सिंह महसूस करते हैं कि शरणार्थी सरकारी जमीन पर कब्जा किए हुए हैं। क्या उनके पास कोई और विकल्प है?

 वास्तव में हुक्म सिंह ने भारत के सबसे बदतर और गंदे रहस्य की सच्चाई का पर्दाफाश किया है। वर्षों से हजारों भारतीय अपने घरों से भागकर शरणार्थी कैम्पों में रह रहे हैं। क्या वे वोट डालने में कामयाब होते हैं, यह एक विवादास्पद मामला है। रियांग्स त्रिपुरा में सबसे बड़ा आदिवासी ग्रुप है। वह सबसे बड़े आदिवासी ग्रुप ब्रू का एक हिस्सा है जो मिजोरम, असम, मणिपुर, बंगलादेश, म्यांमार, थाईलैंड, लाओस और वियतनाम के पहाड़ी क्षेत्रों में रहता है।

यही कारण है कि मिजो और ब्रू एक-दूसरे को नहीं भाते इसलिए पिछले 17 वर्षों से ब्रू या रियांग्स त्रिपुरा की सीमा के पार अड्डा जमाए हुए हैं जहां ब्रू के शरणार्थी कैम्पों में बड़ी कालोनियां विकसित की गई हैं। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालथनहवला चाहते हैं कि 2013 के विधानसभा चुनावों में त्रिपुरा राहत कैम्पों में बसे ब्रू को वोट न देने दिया जाए। उनकी दलील हुक्म सिंह के बयान से थोड़ी-सी अधिक आधुनिक है। उनका कहना है कि चुनाव अधिकारियों को शरणार्थी कैम्पों का दौरा कर इस बात की पुष्टि करने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है कि मिजोरम में कौन असली मतदाता है। उनके बयान पर अमल करने की बजाय चुनाव अधिकारियों ने सही काम किया। वे त्रिपुरा में कैम्पों में गए और उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि ब्रू शरणार्थियों को डाक से वोट देने की अनुमति दी जा सकती है। चुनाव आयोग की 93 सदस्यीय टीम ने पश्चिम मिजोरम की सीटों के लिए यह चुनाव करवाया। त्रिपुरा के 67 हजार ब्रू में से 37 हजार शरणार्थी हैं। इनमें से 12 हजार ही मिजोरम में मतदाता सूचियों में नाम दर्ज कराने में कामयाब हुए हैं।

 ब्रू की तरह बहुत से विस्थापित लोग दशकों से कैम्पों में रह रहे हैं। बोडो मुस्लिम हिंसा बार-बार होती है और 1980 के बाद हर दशक में यह  हिंसा जरूर होती है लेकिन इस बार हिंसा भारत भर में फैल गई। उत्तर पूर्व के लोगों पर ही नहीं, मुम्बई, पुणे, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में भी हमले किए गए। इस बार चुनाव आयोग को असम के राहत कैम्पों में शरणार्थियों के लिए भी मतदान का प्रबंध करना होगा जो एक बहुत बड़ा काम है। इन शरणार्थियों की संख्या त्रिपुरा या मुजफ्फरनगर से अधिक है। इनमें से कुछ को वोट डालने का अधिकार जरूर मिलेगा।

हुक्म सिंह ने कहा कि वह अपनी सीट में शरणार्थियों को वोट नहीं डालने देंगे। 1999 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक फैसला दिया था जिसमें विस्थापित भारतीयों को वोट का अधिकार दिया गया। चुनाव आयोग इस फैसले को मुजफ्फरनगर में भी विस्थापित करेगा।

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