क्या ठाकुरवाद की राजनीति कर रहे हैं राजनाथ सिंह!

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Saturday, March 29, 2014-11:18 PM

नई दिल्ली: क्या भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह पार्टी में ठाकुरवाद फैला रहे हैं? वेसे तो यह लग रहा है कि राजनाथ सिंह, मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए ही सारा प्रयास कर रहे हैं लेकिन देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में उनकी रणनीति के चलते ब्राह्मण ऐसा आरोप लगा रहे हैं।

ठाकुर इन, ब्राह्मण आउट
वाराणसी से लेकर लखनऊ तक ब्राह्मण  यह आरोप लगा रहे हैं कि राजनाथ की इच्छा वी.पी. सिंह और चन्द्रशेखर के बाद ठाकुर प्रधानमंत्री के तौर लाल किले से झंडा फहराने की है। अगर एन.डी.ए. मोदी के नेतृत्व में 272 के आंकड़े को नहीं छू पाती है तो राजनाथ सिंह को यह मौका मिल सकता है।

वाराणसी में दूध की दुकान चलाने वाले प्रदीप चौबे कहते हैं ‘राजनाथ सिंह ने कलराज मिश्र, मुरली मनोहर जोशी और लालमुनि चौबे और ताराकांत झा जैसे वरिष्ठ नेताओं को टिकट न देकर उनका अपमान किया है जबकि ठाकुरों को खैरात में टिकट बांटे हैं। भाजपा ने कांग्रेस से पार्टी में शामिल हुए जगदंबिका पाल को डुमरियागंज से और ब्रजभूषण सिंह को गोंडा को टिकट दिया है। अपनी सीट गाजियाबाद छोड़कर लखनऊ पहुंचे राजनाथ ने गाजियाबाद से वी.के.सिंह को टिकट दिया है। बिहार में उन्होंने एन.के.सिंह को पार्टी में ले लिया है। यह सब ठाकुरवाद नहीं तो और क्या है।’

ब्राह्मणों की रणनीति
हालांकि लखनऊ के पॉलिटिकल एक्टिविस्ट ओंकार सिंह इससे इंकार करते हैं। उनके मुताबिक, यह प्रचार ब्राह्मणों की राजनीति का हिस्सा है। वे पहले भी ऐसी राजनीति करते रहे हैं। उन्होंने मायावती के खिलाफ भी ऐसा ही किया था जिसकी वजह से वह 2012 का विधानसभा चुनाव हार गई। जैसे ही मायावती ठाकुर तबके के करीब जाने की कोशिश करने लगीं, ब्राह्मण लॉबी उनके खिलाफ हो गई और बसपा को हार का सामना करना पड़ा।

अपने लिए चुना लखनऊ
उत्तर प्रदेश में 10 फीसदी ब्राह्मण हैं, जो यहां के चुनावों में अहम भूमिका निभाते हैं। राजनाथ ने पार्टी के लिहाज से सबसे सुरक्षित लखनऊ सीट अपने लिए ले ली है। लखनऊ की सीट पर 15 फीसदी ब्राह्मण और 30 फीसदी मुस्लिम हैं लेकिन दिक्कत यह है कि उनके खिलाफ कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी और बसपा के नकुल दूबे के अलावा अब सपा के अखिलेश मिश्रा होंगे। ये तीनों ब्राह्मण हैं।

बसपा ने साधा ब्राह्मण वोट बैंक
मायावती ने उत्तर प्रदेश में किसी दूसरी पार्टी से ज्यादा 21 ब्राह्मणों को टिकट दिया है। 2007 में भारी बहुमत में बसपा की सरकार बनने की वजह राज्य में उनका दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण वोट बैंक ही था। अगर ब्राह्ममण वोटर फिर से बसपा के साथ गया तो सबसे ज्यादा नुक्सान भाजपा का ही होगा।

बढ़ सकता है संकट
उत्तर प्रदेश में पाटी में दो जातियों के बीच इस तरह की रार से पार्टी का संकट बढ़ सकता है। खासकर वाराणसी में जहां ब्राह्मण मतदाताओं की अच्छी-खासी तादाद है। बी.एच.यू. में राजनति विज्ञान के प्रोफैसर और मोदी के समर्थक कौशल किशोर मिश्रा का कहना है कि पार्टी को इन विवादों को सुलझाना चाहिए और वरिष्ठों को दरकिनार करने की नीति से बचना चाहिए।       

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