सैक्स वर्करों को जमा पूंजी खोने का डर, बोले-जिंदगी खराब हो गई

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Thursday, November 17, 2016-10:51 AM

नई दिल्ली: राजधानी के जी.बी. रोड पर स्थित रैड लाइट एरिया की करीब 5000 सैक्स वर्करों में से 800 का बैंकों में खाता है। इनमें से कुछ ने अपने मित्रों के खातों में पैसा जमा किया हुआ है। मोदी सरकार द्वारा 500 और 1000 के नोटों पर लगाई पाबंदी से उन्हें डर सताने लगा है कि कहीं वर्षों से बैंक में अपनी जमा पूंजी से वे हाथ न धो बैठें।

जिंदगी खराब हो गई:  इन्हीं में से एक सैक्स वर्कर मोना (काल्पनिक नाम) बताती है कि 8 नवम्बर की रात को जब वह ग्राहक का इंतजार कर रही थी अचानक उसके स्मार्टफोन पर एक अन्य वर्कर का संदेश आता है कि ग्राहकों से 500 और 1000 के नोट नहीं लो। सरकार ने इन पर पाबंदी लगा दी है। धीरे-धीरे यह संदेश सभी वेश्यालयों में फैल जाता है। वह कहती है कि इसके बाद तो मेरी जिंदगी खराब हो गई। दिन भर उसका समय खाली बीत जाता है और ज्यादातर ग्राहक रात को ही आते हैं।

ज्यादातर लड़कियां गांव चली गईं : नोटबंदी ने जी.बी. रोड के व्यापार को बुरी तरह प्रभावित किया है। एक अनुमान के अनुसार यहां काम करने वाली 5000 में से 80 प्रतिशत सैक्स वर्करों के पास कोई काम नहीं है। उनमें से ’यादातर अपने गांव चली गई हैं। प्राय: ग्राहक इन्हें प्रतिबंधित नोट ही देते हैं, इनमें से कुछ ही डांस के दौरान उन पर पुराने नोट फैंकते हैं। यह सिर्फ वहीं होता है जिन वेश्यालयों में मुजरा हो। जी.बी. रोड पर ऐसे 3 वेश्यालय हैं। एक अन्य सैक्स वर्कर जूली (काल्पनिक नाम) बताती है कि उसके कोठे की ज्यादातर लड़कियां अपने गांव चली गई हैं। इससे पहले यह कोठा कभी इतना सूना नहीं हुआ। यहां अब कोई काम नहीं रहा है। कभी-कभार कोई ग्राहक आ जाता है तो वह पुराने नोट ही ऑफर करता है। टीना (काल्पनिक नाम) जिस कोठे में काम करती है वहां भी यही हाल है। यहां कुल 35 लड़कियां थीं जिनमें से 20 आंध्र प्रदेश, बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार स्थित अपने गांव चली गई हैं।

आधे में ही करो गुजारा : एक बात और सामने आई है। ये सैक्स वर्कर जितने दाम पहले अपने ग्राहकों से वसूलती थीं अब उनसे आधे में ही इन्हें गुजारा करना पड़ रहा है। यहां काम करने वाली 5000 में से 800 सैक्स वर्करों के बैंकों में खाते हैं या उन्होंने अपनी साथी वर्करों के खाते में पैसा जमा किया हुआ है। बताया जाता है कि पुराने नोटों को बदलवाने के लिए वे गांव गई हैं। कुछ मध्यस्थों या दलालों के जरिए नोटों को बदलवा रही हैं।

बैंक वाले भी कम जालिम नहीं : एक समस्या और है। अगर वे नोट बदलवाने के लिए बैंक जाएं तो वहां भी लोगों की नजरें उनका पीछा नहीं छोड़ती हैं। सैक्स वर्कर शबनम (काल्पनिक नाम) का कहना है कि वह नजदीक के बैंक के बाहर लगी लाइन में अपनी बारी का इंतजार कर रही थी। तभी आवाज आई कि अरे, जी.बी.वाली भी यहां आ गई अपना पैसा जमा करने। शबनम कहती है कि सैक्स वर्करों के लिए अलग बैंक होना चाहिए। उसकी बात काटते हुए मोना (काल्पनिक नाम) बताती है कि जब बैंक वालों को यह पता चल जाता है कि हम सैक्स वर्कर हैं तो उनमें से कुछ जालिमों का हमें देखने और बात करने का तरीका ही बदल जाता है। वे आपत्तिजनक भाषा पर भी उतर आते हैं।


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