पहले प्रत्याशी, फिर पार्टी बाद में कुछ और

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Tuesday, April 01, 2014-10:18 AM

नई दिल्ली: एसोसिएशन फॉर डैमोक्रेटिक रिफार्म्स (ए.डी.आर.) ने बेंगलूर के गैर लाभकारी संगठन दक्ष के साथ मिलकर 2009 के लोकसभा चुनावों को लेकर एक सर्वे किया। सर्वे का मकसद यह जानना था कि लोगों ने किस आधार पर अपने उम्मीदवार को वोट दिया। सर्वे में देश के सारे संसदीय क्षेत्रों में 20 पैमानों के आधार पर 2,40,000 लोगों की राय ली गई। इसमें उनसे कुछ सवाल पूछे गए जिनमें से कुछ के जवाब हां, या न में थे और उसके बाद उनके जवाब के आधार पर कुछ विकल्पों को चुनना था।

सवाल: किसी उम्मीदवार को आपने किस आधार पर वोट दिया?
जवाब के लिए लोगों को 5 विकल्प दिए गए थे-उम्मीदवार, पार्टी, पार्टी का प्रधानमंत्री प्रत्याशी, जाति और प्रत्याशी का पैसा बांटना। ज्यादातर लोगों का कहना था कि वोट देने से पहले उन्होंने सबसे पहले उम्मीदवार, फिर उसकी पार्टी देखी। हालांकि सर्वे में यह विकल्प नहीं दिया गया था कि किसी उम्मीदवार में क्या महत्वपूर्ण, क्या ज्यादा महत्वपूर्ण है और क्या महत्वपूर्ण नहीं है।

सवाल: क्या आपने जिस उम्मीदवार को वोट दिया, वह जीता?
75 फीसदी लोगों का कहना था कि उन्होंने सचमुच जीतने वाले वर्तमान उम्मीदवार को वोट दिया था। अगर यह देखें कि 2009 में जीतने वाले उम्मीदवारों को औसतन 44 फीसदी वोट मिले थे, यह आंकड़ा भी सही नहीं लगता। सर्वे में यह पक्षपात देखा गया कि लोग जीतने वाले उम्मीदवार को वोट देने की बात करते हैं।

सवाल: आखिर लोग किसी अपराधी उम्मीदवार को वोट क्यों देते हैं।
जवाब में 6 संभावनाएं दी गई थीं और एक से ज्यादा विक ल्प चुनने की आजादी थी। (देखें ग्राफिक)

सवाल: पिछले चुनाव में वोट डाला या नहीं। अगर नहीं तो उसकी वजह क्या थी?
86 फीसदी लोगों का जवाब था कि उन्होंने पिछले चुनाव में वोट डाला था। अगर पिछले चुनावों के मतदान प्रतिशत को देखें तो 60 फीसदी लोगों ने वोट डाला था। इस घालमेल की 2 वजह हो सकती हैं, पहली या तो लोग यह छुपाना चाहते हैं कि उन्होंने पिछले चुनाव में वोट नहीं डाला था या फिर सर्वे के सैंपल उन लोगों के पक्ष में हों जिन्होंने वोट डाला हो। मजेदार बात यह है कि सर्वे में वोट डालने वालों का प्रतिशत, डाटा की सही तस्वीर पेश नहीं करता। उदाहरण के लिए धर्म के मामले में यह 84 फीसदी से 87 फीसदी के बीच रहता है जबकि कुल 86 फीसदी है। जाति के लिए 86 से 88 फीसदी के बीच है। जिन 10,000 छात्रों का सर्वे करवाया गया उनमें से केवल 45 फीसदी ने वोट दिया था जबकि पिछले चुनावों में वोट डालने वाले 60,000 लोगों में केवल 67 फीसदी ऐसे थे जिनकी उम्र 40 से कम थी।

सवाल: वोट क्यों नहीं दिया?
सर्वे में शामिल सभी उम्र के एक चौथाई लोगों का कहना था कि लिस्ट में नाम न होने की वजह से उन्होंने वोट नहीं डाला। 30 साल से कम उम्र के एक तिहाई लोगों का कहना था कि वे वोट डालने के लिए रजिस्टर्ड ही नहीं थे। मजेदार बात यह दिखी कि उम्र बढऩे के साथ-साथ लोगों में वोट डालने को लेकर अनिच्छा भी बढ़ती नजर आई।    


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