पर्वों का संगम : जीवन में सहज-सजग शुरुआत का आनंद

Edited By Updated: 08 Jan, 2026 07:01 AM

a confluence of festivals enjoying a natural and mindful beginning in life

नववर्ष  जब लोहड़ी और मकर संक्रांति के साथ दस्तक देता है, तो समय मानो एक क्षण ठहरकर हमें कुछ याद दिलाने आता है। आंगनों में जलती लोहड़ी की अग्नि, अन्न की सांझेदारी, सूर्य का उत्तरायण होना-ये केवल पर्व नहीं, जीवन के संतुलन के संकेत हैं। यह संयोग हमें...

नववर्ष जब लोहड़ी और मकर संक्रांति के साथ दस्तक देता है, तो समय मानो एक क्षण ठहरकर हमें कुछ याद दिलाने आता है। आंगनों में जलती लोहड़ी की अग्नि, अन्न की सांझेदारी, सूर्य का उत्तरायण होना-ये केवल पर्व नहीं, जीवन के संतुलन के संकेत हैं। यह संयोग हमें बताता है कि जीवन में सच्ची शुरुआत कभी हड़बड़ी से नहीं होती, वह हमेशा लय और सजगता से जन्म लेती है। नया साल हमसे तेज दौडऩे की मांग नहीं करता। वह हमसे सजग होकर मंजिल तक पहुंचने को प्रेरित करता है। लेकिन हर जनवरी के साथ हमारे मन में एक अजीब-सी बेचैनी घर कर जाती है-और बेहतर, और तेज, और अधिक साबित करने की होड़ में हड़बड़ी। लक्ष्य ऊंचे करने, टाइम-टेबल ठूंसने और साल के शुरुआती दिनों में ही उपलब्धियां दिखाने का दबाव। जैसे समय स्वयं हमसे हिसाब मांग रहा हो। जबकि सच्ची शुरुआत कभी दबाव में नहीं होती। वह तब होती है, जब हड़बड़ी की जगह सजगता हो, जब गति से पहले संतुलन बनाया जाए। 

आज की अधिकांश महत्वाकांक्षाएं प्रेरणा से नहीं, तुलना से जन्म लेती हैं। हम उधार की समय-सीमाओं और परिभाषाओं में सफलता को नापने लगे हैं। ऐसी परिभाषाएं, जो हमारे जीवन के भीतर की ऋतु, लय और सीमा को शायद ही मानती हों। नतीजा यह है कि जनवरी के अंत में ही बहुत से लोग थक चुके होते हैं। यह थकान अनुशासन की कमी नहीं, सुनने व समझने की कमी का परिणाम है। यह असफलता नहीं, असंतुलन है। कर्म समस्या नहीं है। बिना भीतर टिके किया गया कर्म ही कई बार संकट का रूप ले लेता है। सजगता रहित महत्वाकांक्षा शोर बन जाती है। वह आगे तो धकेलती है, पर यह नहीं पूछती कि दिशा सही है या नहीं। सजगता महत्वाकांक्षा को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे शुद्ध करती है।

पर्वों में छिपा जीवन-विज्ञान : भारत के फसल पर्व इसी समय आते हैं-यह संयोग नहीं, संकेत है। ये पर्व हमें बिना उपदेश दिए सिखाते हैं कि जीवन केवल महत्वाकांक्षा से नहीं, संतुलन से चलता है। अग्नि शुद्ध करती है। भोजन पोषण देता है और संतुलन उपचार करता है। जब हम अग्नि को कृतज्ञता से, भोजन को संयम से और शरीर को लय से सम्मान देते हैं, तो मन स्वत: स्थिर होने लगता है। ये पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य की गहरी समझ हैं। लोहड़ी हमें सिखाती है कि जो पक चुका है, जो भारी हो गया है, उसे छोड़ देना चाहिए। मकर संक्रांति का संदेश है कि रोशनी की ओर मुडऩा अचानक नहीं, धीरे.धीरे होता है। दोनों मिलकर एक शाश्वत सत्य कहते हैं-विकास कठोर होना जरूरी नहीं। परिवर्तन जल्दबाजी में नहीं होता और सजग प्रगति अंतत: शांति बन जाती है। सजगता को अक्सर जीवन से पलायन समझ लिया जाता है। जबकि सच यह है कि सजगता जीवन से सबसे गहरा संवाद है। अपनी सांस, थकान और इच्छा को बिना जजमैंट देख पाना-यह आत्मिक ईमानदारी है और वही साहस है। आधुनिक विज्ञान भी अब मानता है कि जब कर्म विवशता से नहीं, सजगता से उपजता है, तो मन स्थिर होता है, प्रतिक्रियाएं नरम पड़ती हैं और स्पष्टता जन्म लेती है।

सहज शुरुआत धीमी इसलिए नहीं होती कि उसमें ऊर्जा कम है, बल्कि इसलिए कि उसमें दिशा का सम्मान होता है। जब हम नया साल सजगता से शुरू करते हैं, तो सवाल बदल जाते हैं। ‘मैं कितना हासिल कर सकता हूं’ की जगह ‘क्या आवश्यक है’ सामने आता है। सहजता कमजोरी नहीं है। वह बिना हिंसा की शक्ति है। आज की थकान शारीरिक से अधिक मानसिक है। कठोर आत्मसंवाद, अवास्तविक अपेक्षाएं और निरंतर स्वयं पर निगरानी-इनमें कोई भी जीवित तंत्र फलता-फूलता नहीं। श्रीमद् भगवत गीता यहां भी करुणा से मार्ग दिखाती है-‘उद्धरेदात्मनाऽत्मानं’ अर्थात स्वयं को स्वयं उठाओ, गिराओ मत। जैसे बीज केवल कोमल मिट्टी में फूटता है, वैसे ही भीतर का परिवर्तन सुरक्षा और करुणा में होता है।

सफलता की नई परिभाषा : ‘बर्नआऊट’, चिंता और भावनात्मक दूरी व्यक्तिगत असफलता नहीं, सामूहिक संकेत हैं। ये बताते हैं कि हमारी सफलता की मौजूदा परिभाषा मानव स्वभाव से मेल नहीं खा रही। उपस्थिति के बिना उत्पादकता खोखली है। भीतर के आधार के बिना उपलब्धि टिकती नहीं। सजगता को चुनना लक्ष्य छोडऩा नहीं है। यह लक्ष्य को भय की जगह स्पष्टता से आगे बढऩे देना है।

नववर्ष और लोहड़ी-मकर संक्रांति (उत्तरायण) के इस संगम पर शायद सबसे बड़ा संकल्प यह हो सकता है कि हम समय को जीतने नहीं, समझने की कोशिश करें। बोलने से पहले देखें। तय करने से पहले सुनें। आगे बढ़ें, पर भीतर आक्रामकता के बिना। सहज शुरुआत अनिर्णय नहीं, चलती हुई बुद्धि है। इस राह पर हम पीछे नहीं छूटते। हम पहुंचते हैं, जड़ में टिके, उपस्थित और शांत आत्मविश्वास के साथ। सहजता हमसे ताकतवर बनने को नहीं कहती, वह हमें सच्चा बनने को कहती है। नव वर्ष, लोहड़ी-मकर संक्रांति (उत्तरी भारत), पोंगल (दक्षिणी भारत), उत्तरायण (गुजरात, राजस्थान), माघ बिहू (असम), मकर विलक्कू (केरल) का संगम हमें सहजता व सजगता से जीवन को आगे बढ़ाने का संदेश देता है।(लेखिका स्प्रिचुअल-लाइफस्टाइल मैंटर एवं ‘अमृतम’ की संस्थापक हैं)-संगीता मित्तल
 

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