त्यौहारों का स्वाद बिगाड़ती मिलावट

Edited By Updated: 08 Oct, 2026 07:03 AM

adulteration spoils the taste of festivals

अनवरत बढ़त बनाती मिलावटखोरी देश के लिए एक गंभीर समस्या बन चुकी है। रोजाना प्रयुक्त होने वाले दाल-तेल-मसालों से लेकर सम्पूर्ण आहार कहलाने वाला दूध तक मिलावट की मार से महफूज नहीं रह पाया। विशेषकर, त्यौहारी सीजन के दौरान मावा, घी, मिठाइयों के स्तरहीन...

अनवरत बढ़त बनाती मिलावटखोरी देश के लिए एक गंभीर समस्या बन चुकी है। रोजाना प्रयुक्त होने वाले दाल-तेल-मसालों से लेकर सम्पूर्ण आहार कहलाने वाला दूध तक मिलावट की मार से महफूज नहीं रह पाया। विशेषकर, त्यौहारी सीजन के दौरान मावा, घी, मिठाइयों के स्तरहीन होने का अंदेशा कई गुणा बढ़ जाता है। 

इस संदर्भ में हुई सरकारी जांच के आंकड़े देखकर कौन भला मानुष चिंतित न होगा? बीते अगस्त माह, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की ओर से खाद्य मिलावट, दूषित तथा नकली खाद्य पदार्थों एवं खाद्य सुरक्षा नियमोल्लंघन से संबंधित प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने बताया कि 2025-26 समेत पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों के मुताबिक, कई राज्यों में दूध-दही-तेल तथा मिष्ठान-भंडार स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पाए गए। उत्तर प्रदेश में जांचे गए 39519 नमूनों में 20427, यानी 51.7 प्रतिशत सैंपल तय मानकों के अनुरूप नहीं थे। हरियाणा में जांचे गए 2335 नमूनों में 723 गुणवत्ताहीन निकले। वर्ष 2025-26 के मध्य देश भर में जांचे गए 2 लाख 23 हजार 808 नमूनों में से 40 हजार 23 गैर अनुरूप (प्रोविजनल) मिले। खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर देश भर में 1,918 आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि भी दर्ज हुई, हालांकि गैर-अनुरूप सैंपल तथा आपराधिक मामले में दोषसिद्धि अलग-अलग प्रक्रियाएं होने के कारण दोनों आंकड़ों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जा सकता।

खाद्य सैंपलों की तस्वीर दर्शाने के साथ, आंकड़ों में निगरानी तंत्र की कमी भी ख़लती है। हरियाणा में 45 स्वीकृत फूड सेफ्टी आफिसर पदों में 22 पद खाली हैं। उत्तर प्रदेश में 662 में से 110, पंजाब में 60 में से 8, हिमाचल में 22 में से आठ, उत्तराखंड में 57 में से 37 तथा दिल्ली में 32 में से 13 पद रिक्त हैं। देश में 259 मान्यता प्राप्त फूड टैस्टिंग लैब तथा 24 रैफरल फूड लैब हैं। 13 अधिसूचित लैब में सभी जांच सुविधाएं उपलब्ध नहीं। 

पंजाब की स्थिति आंकें  तो त्यौहारी आहट के चलते शिकायतों के अंबार लगने लगे हैं। राज्य में व्यापक स्तर पर रसायन युक्त पनीर बनाने की सूचनाएं आ रही हैं। अन्य प्रांतों से घटिया मावे-पनीर की आमद भी बदस्तूर जारी है। खाद्य सुरक्षा विभाग की टीमों द्वारा चलाए गए जांच अभियानों के तहत गत दिनों बठिंडा, जालंधर,  अमृतसर, कपूरथला, फिरोजपुर समेत कई जिलों में छापे मारे गए। जांच के दौरान जालंधर से बड़ी मात्रा में संदिग्ध पनीर मिला। अमृतसर में मजीठा क्षेत्र की दो डेयरियों से करीब 70 किलो पनीर जब्त किया गया। गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरने तथा मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त होने के संदेह में 35 किलो पनीर मौके पर ही नष्ट किया गया। फिरोजपुर के जीरा, मक्खू तथा मल्लांवाला क्षेत्र में लगभग 50 किलो मिठाई नष्ट कराई गई। कार्रवाई का सिलसिला लगातार चल रहा है। विगत पांच वर्षों पर दृष्टि डालें तो पंजाब में इस दौरान लिए नमूनों में से 16.67 फीसदी गुणवत्ता मानकों के आधार पर अनुत्तीर्ण सिद्ध हुए।  मिलावट का यह गोरखधंधा, दरअसल, बहुत पुराना है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा घटिया व मिलावटी खाद्य पदार्थ बेचने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करने संबंधी दावों के बावजूद, विभागीय आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जाती हैं। मसालों की ही बात लें, ‘फूड सेफ्टी एंड

स्टैंडडर््स एक्ट’ के मुताबिक, कोई भी पिसा मसाला बिना पैकिंग नहीं बेचा जा सकता। पैकेट पर कंपनी का नाम, प्रयुक्त पदार्थों की मात्रा, निर्माण तिथि, निर्धारित मूल्य एवं एक्सपायरी डेट लिखना भी अनिवार्य है, लेकिन यथार्थ में होलसेल की मंडियों से लेकर फड़ी वाले बेधड़क खुले मसाले बेचते देखे जा सकते हैं। कानून के लंबे हाथ क्योंकर सबको नहीं पकड़ पाते, इस बाबत विभागीय अधिकारी ही बेहतर जानें!

दूध तथा मावे में स्टार्च,  यूरिया,  डिटर्जेंट तथा सिंथेटिक कैमिकल मिलाए जा रहे हैं। सरसों के तेल में आर्जीमोन ऑयल तथा घी में सस्ते फैट या चर्बी की मिलावट हो रही है। हल्दी में मेटानिल पीला रंग, लाल मिर्च में ईंट का चूरा तथा शहद में राइस सिरप मिलाया जाता है। कुल मिलाकर, शायद ही कोई वस्तु मिलावट के प्रहार से बची हो! मुनाफा बटोरने की अंध लालसा जन कल्याण अथवा मानवीय मूल्य जैसे मुद्दे सिरे से नकार देती है। मिलावटी वस्तुओं का सेवन किसी को कैंसर, डायबिटीज, थायराइड, पेट की गंभीर बीमारियों आदि का शिकार बना डाले तो उनकी बला से, न नियम-कानून की परवाह, न जांच अधिकारियों का खौफ, मानो भ्रष्टाचार के अवलंबन में बहती हवाओं का रुख मोड़ देना उनके लिए बाएं हाथ का खेल हो! मिलावटखोरी की इस विषबेल को पोषित करने में कौन कितना भागीदार रहा, यह पता लगा पाना भी सरल है क्या? ऐसे में जांच-परख कर खाद्य वस्तुएं खरीदने का सम्पूर्ण जिम्मा या तो उपभोक्ताओं के सिर आ जाता है या फिर उन चंद ईमानदार अधिकारियों के कंधों पर, जो देश के हालात वाकई सुधारने की चाह में ‘भयंकर तूफानों’ से भिडऩे का हौसला दिखा रहे हैं।

विभाग द्वारा जारी मोबाइल वैन के जरिए नागरिकों को खाद्य-गुणवत्ता परखने के लिए सचेत करना, नि:संदेह सराहनीय है किंतु अपर्याप्त सुविधाओं तथा पदों की रिक्ता के बारे विचारना भी अत्यावश्यक है। समूचे तौर पर ये खामियां वांछित परिणामों को प्रभावित करने का निमित्त बनती हैं। समस्या का समूल निराकरण तभी संभव है, जब मिलावटखोरों के विरुद्ध निष्पक्षतापूर्वक कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करने के साथ, उन रिश्वतखोर तथा अकर्मण्य अधिकारियों को भी बराबर दंडभागी बनाया जाए, जिनकी शह पर मिलावट का काला कारोबार जड़ पकड़ता है।-दीपिका अरोड़ा
 

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