भागवत के भाषण एक कठिन और खतरनाक दुनिया में उम्मीद का प्रतिनिधित्व करते हैं

Edited By Updated: 12 Sep, 2026 05:13 AM

bhagwat s speeches represent hope in a difficult and dangerous world

जो लोग भगवा खेमे को नापसंद करते हैं, वे अक्सर उनकी सबसे मूर्खतापूर्ण राजनीतिक आदत का मजाक उड़ाते हैं, जो यह है कि वे भारत की अर्थव्यवस्था के साथ जो कुछ भी हुआ, उसके लिए जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन भगवा-विरोधियों की भी ऐसी ही एक...

जो लोग भगवा खेमे को नापसंद करते हैं, वे अक्सर उनकी सबसे मूर्खतापूर्ण राजनीतिक आदत का मजाक उड़ाते हैं, जो यह है कि वे भारत की अर्थव्यवस्था के साथ जो कुछ भी हुआ, उसके लिए जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन भगवा-विरोधियों की भी ऐसी ही एक समस्या है, वे ङ्क्षहदू आंदोलन के पूरे इतिहास को उसके मातृ संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के वर्तमान के विरुद्ध खड़ा कर देते हैं।

हर बार जब वह (संघ) मुसलमानों के समान भारतीयों के रूप में अस्तित्व के अधिकार पर जोर देता है, तो भगवा-विरोधी हमें आगाह करते हैं कि उन पर विश्वास न करें, यह सब केवल एक दिखावा है। जैसा कि कुछ दिन पहले हुआ, जब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में हजारों लोगों से कहा कि जो ङ्क्षहदू यह मानता है कि मुसलमानों को भारत से निकाल दिया जाना चाहिए, वह ‘ङ्क्षहदू नहीं रह सकता।’ उन्होंने यह भी कहा कि विविधता भारत के ‘डी.एन.ए.’ में है। उन्होंने ङ्क्षहदू देवी-देवताओं को अलौकिक आकृतियों के रूप में नहीं, बल्कि आदर्श मनुष्यों के प्रतिरूप के रूप में चित्रित किया और राक्षसों को हम सभी के भीतर मौजूद बुराई के रूप में। उन्होंने हमें यह भी याद दिलाया कि चुनावी राजनीति में खामियां हैं और सत्तावादी किसी राष्ट्र को एक सूत्र में नहीं पिरो सकते।

यह उस तरह की बात है जो आंतरिक सुंदरता की वकालत करने वाले सभी कार्यकत्र्ता कहते हैं। लेकिन भगवा-विरोधी कहते हैं कि संघ प्रमुख की बातों को जस का तस मान लेना भोलापन है। वे कहते हैं कि वह पश्चिम के सामने ढोंग कर रहे हैं। लेकिन वह यहां प्रांतीय श्रोताओं से भी यही बातें कहते रहे हैं, जो यह सुनने के आदी नहीं हैं कि ‘जिस दिन यह कहा जाएगा कि मुसलमान नहीं चाहिएं, उस दिन हिंदुत्व नहीं रहेगा।’ कुछ लोगों का घिसा-पिटा तर्क यह है कि वह चाहते हैं कि मुसलमान भारत में रहें ताकि ङ्क्षहदू अपने ही लोगों से लडऩे की बजाय उनसे लड़ सकें। इससे भी अधिक प्रेरक बात यह है कि कुछ बुद्धिजीवी चाहते हैं कि संघ अतीत में ही जमा रहे, ताकि उनके पास ङ्क्षनदा करने के लिए कोई हो और इस तरह वे अपने सद्गुणों के प्रति आश्वस्त हो सकें।

संघ जो कहने की कोशिश कर रहा है, वह यह है कि वह पारंपरिक है लेकिन विकासशील है। और चाहे लोग इसे स्पष्ट रूप से कहें या न कहें, विकास में किसी न किसी चीज का अंत शामिल होता है। शायद वैज्ञानिक प्रगति की तरह, आर.एस.एस. भी एक-एक अंत के साथ आगे बढ़ा है। इसके अलावा, हो सकता है कि भाजपा, जिसे वह राजनीति के लिए मार्गदर्शन देता है या देता था, बहुत बड़ी हो गई है, और मातृ संगठन इस जबरदस्त सफलता के सभी पहलुओं का आनंद नहीं ले रहा तथा एक वैकल्पिक हिंदू बौद्धिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहता है जो पेशेवर राजनेता नहीं कह रहे।

बिना संघ को एक विशाल मानवतावादी संगठन बताए भी, एक कारण है कि हमें भागवत के शब्दों की भावना पर भरोसा क्यों करना चाहिए। शक्तिशाली हिंदू नेताओं की ओर से मुसलमानों के बारे में नैतिक रूप से स्पष्ट बयान, भले ही वे केवल शब्द हों, सामान्य लोग अपनी दुनिया को किस रूप में देखते हैं, इसमें अत्यधिक योगदान देते हैं। अच्छी चीजें इतनी दुर्लभ और धुंधली होती हैं कि जब वे आती हैं, तो हमें उन्हें उलझाना नहीं चाहिए। किसी हिंदू सार्वजनिक हस्ती के लिए वे बातें कहना, जो उन्होंने कहीं, संभावित रूप से एक भारी कीमत चुकाने जैसा हो सकता है। इसलिए, यह सोचना कि संघ अपनी छवि सुधारने के लिए मुसलमानों के प्रति प्रेम का नाटक करेगा, सरासर हास्यास्पद है।

मैं स्वीकार करता हूं कि भाषणों को खारिज करने के कुछ अच्छे कारण हैं। जमीनी स्तर पर क्या है, यह मायने रखता है। भारत में मुसलमानों की सामाजिक सुरक्षा चरमरा गई है। सोशल मीडिया पर कुछ ङ्क्षहदू संगठनों के प्रति स्पष्ट निष्ठा रखने वाले कई ऐसे उपद्रवी हैं, जो खुले तौर पर मुसलमानों, दलितों, आधुनिक महिलाओं व जिसे भी वे दुश्मन मानते हैं, उन्हें धमकाते हैं और शायद ही कभी पुलिस उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करती है। एक व्यक्ति ने तो अभी-अभी दावा किया है कि उसने कॉकरोच विरोध प्रदर्शन के दौरान किसी का सिर फोड़ दिया और कुछ नेताओं ने यह सुनिश्चित किया कि वह जेल न जाए। गौरक्षकों की हिंसा जारी है।

आर.एस.एस. के बयान प्रभावशाली हो सकते हैं लेकिन हमेशा नहीं। एक सच्चाई यह भी है जिसे शक्तिशाली लोग कभी स्पष्ट नहीं करते, कि वे उतने शक्तिशाली नहीं हैं जितना लोग सोचते हैं, लोगों पर उनका सीमित नियंत्रण होता है। जो पुरुष ‘आदर्श मनुष्य’ में विश्वास करते हैं, वे शायद यह न जानते हों कि ‘दानवों’ से कैसे निपटा जाए। वैश्विक स्तर पर अच्छी प्रतिष्ठा चाहने वाले आर.एस.एस. को इस पर और अधिक मेहनत करने की आवश्यकता हो सकती है। फिर भी, ऐसे अच्छे कारण हैं कि हमें संघ के शीर्ष नेता के शब्दों पर भरोसा क्यों करना चाहिए, इस तथ्य के अलावा कि इस बात के परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं कि वह जो कुछ कह रहे हैं, गंभीरता से कह रहे हैं। उनके भाषण एक कठिन और खतरनाक दुनिया में उम्मीद का प्रतिनिधित्व करते हैं।

पश्चिमी ‘दक्षिणपंथी’ संगठनों की तरह, भारत का ङ्क्षहदू आंदोलन एक बड़े बहुमत को प्रताडि़त अल्पसंख्यक की तरह व्यवहार करवाकर लोकप्रिय हुआ। अब, दुनिया का सबसे प्रभावशाली ङ्क्षहदू संगठन पुरानी शिकायतों को त्याग रहा है और आत्म-आश्वस्त होने की उदारता दिखा रहा है। साथ ही, इसका एक कारण यह भी है कि भागवत ही सामाजिक रूप से आधुनिक बातें कह रहे हैं, न कि ङ्क्षहदू आंदोलन के राजनीतिक चेहरे, भाजपा के नेता। चूंकि पार्टी को चुनाव लडऩा है और बहुत कुछ दांव पर लगा है, इसलिए उसके नेताओं को शालीन बातें कहने का जोखिम बहुत अधिक लगता है।

आधुनिक भारत इस बात का जीवंत प्रमाण प्रस्तुत करता है कि चुनावी लोकतंत्र त्रुटिपूर्ण है और भारत को जन दबाव समूहों के माध्यम से एक संतुलनकारी शक्ति (काऊंटरफोर्स) की आवश्यकता है। इस वर्ष के छात्र विरोध प्रदर्शनों की जीत इस बात का प्रमाण थी कि कुछ आंदोलन संस्थाओं की विफलताओं की भरपाई कर सकते हैं और चुनी हुई सरकारों को नियंत्रण में रख सकते हैं। अपने तरीके से, संघ पर्दे के पीछे यह भूमिका निभाता रहा है और हाल ही में उसने इसे और अधिक खुले तौर पर करना शुरू कर दिया है। हमें इसकी आवश्यकता है। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कोई यह अनुमान लगा सकता है कि भारत की मुस्लिम आबादी का वह अधिकतम आकार क्या होगा जो सद्भाव के इन स्वरों को बनाए रख सके।-मनु जोसेफ
 

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