मतदाता उपनिवेशवाद से जूझता चुनाव आयोग

Edited By Updated: 01 Oct, 2026 05:14 AM

election commission grapples with voter colonialism

मतदाता लोकतंत्र की आत्मा है। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए उसकी आत्मा की शुचिता, पारदर्शिता और शुद्धता आवश्यक है। एक दूषित मन, सारे शरीर और वातावरण को दूषित कर देता है। आज दुनिया में एक नए किस्म का मतदाता उपनिवेशवाद देखने को मिल रहा है। ये किसी देश में...

मतदाता लोकतंत्र की आत्मा है। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए उसकी आत्मा की शुचिता, पारदर्शिता और शुद्धता आवश्यक है। एक दूषित मन, सारे शरीर और वातावरण को दूषित कर देता है। आज दुनिया में एक नए किस्म का मतदाता उपनिवेशवाद देखने को मिल रहा है। ये किसी देश में अपने लोगों को निवासी बनाकर उन्हें कानूनी रूप से मतदाता, प्रत्याशी और संवैधानिक पदों पर कब्जा करने के माध्यम से होता है। इसमें चीन और मुस्लिम आबादी वाले देश अग्रणी हैं। 

किसी भी देश में मतदान का अधिकार सिर्फ उन्हें है, जो कानूनी रूप से इसके पात्र हैं। लेकिन बाहर से आए लोग मतदाता बनकर, संवैधानिक आड़ में देश को भीतर से खोखला बना देते हैं। इसी को मतदाता साम्राज्यवाद कहा जाता है। इससे लोकतंत्र को लोकतांत्रिक तरीके से नष्ट किया जा सकता है। प्रश्न यह भी है कि बीते 2 दशकों से भारत में कभी सुप्रीम कोर्ट, कभी संसद, कभी चुनाव आयोग को निशाना बनाया जा रहा है। क्या इसमें कोई बाहरी शक्ति भी  है जो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला कर रही है? 

संवैधानिक स्थिति: भारत निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक प्राधिकरण है जो भारत में संघ एवं राज्य निर्वाचन प्रक्रियाओं का संचालन करने के लिए उत्तरदायी है।  यह निकाय भारत में लोक सभा, राज्य सभा, राज्य विधान सभाओं, देश में राष्ट्रपति एवं उप-राष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचनों का संचालन करता है। अनुच्छेद 324 ‘एक स्वतंत्र और स्वायत्त चुनाव आयोग की नियुक्ति’ की व्यवस्था करता है। वहीं अनुच्छेद 325 के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को केवल धर्म, नस्ल, जाति या लिंग के आधार पर मतदाता सूची से बाहर नहीं रखा जा सकता। अनुच्छेद 324 में यह उपबंध है- लोकसभा और प्रत्येक राज्य की विधान सभा के निर्वाचन, वयस्क मताधिकर के आधार पर होंगे; भारत का प्रत्येक नागरिक जिसकी आयु इस संबंध में विधि द्वारा यथानिर्धारित तिथि को 18 वर्ष से कम न हो और जो अन्यथा अयोग्य घोषित न किया गया हो, ऐसे किसी भी निर्वाचन में मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार होगा। 

मौलिक अधिकार या विशेषाधिकार: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324, 325 और 326 चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची संबंधी प्रक्रिया का उल्लेख स्पष्ट है। मतदाता सूची को तैयार करना, उसका पुनर्निरीक्षण और त्रुटियां पाए जाने पर शुद्धिकरण भी होना आवश्यक है। 
जब किसी देश में बाहर से अवैध रूप से घुसपैठ किए लोग हो जाते हैं, तो वहां के लोकतंत्र की वैधता संकट में आ जाती है। धीरे-धीरे चुनाव लड़कर ये देश के कानून और प्रशासन को भी प्रभावित करते हैं। इसलिए मतदाता सूची का अचूक और अद्यतन रहना जरूरी है।  अभी तक एक से अधिक स्थान पर वोटर के रूप में नाम, या मृतकों के नाम न कटने, नए नाम जुडऩे में अनियमितता जैसे विषय आते रहे हैं, जिससे ‘एक व्यक्ति, एक मत’ की धारणा को नुकसान पहुंचता है। इससे लोकतंत्र में प्रतिनिधि चुनाव प्रक्रिया बिल्कुल अशुद्ध और अस्वस्थ हो जाती है। इसलिए समाज और खासतौर से राजनीतिक दलों को मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी रखने में चुनाव आयोग का सक्रिय सहयोग करना चाहिए।

आज बूथ लूटने और फर्जी मतदाताओं के जरिए चुनाव जीतने का दौर बीत चुका है। यह भी स्मरण रहे यूरोप के देशों में लाखों की संख्या में अवैध लोग घुसपैठ करके रहने लगे हैं। धीरे-धीरे वे वहां मतदाता और नागरिक बने। फिर चुनाव लड़कर वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी घुसपैठ कर चुके हैं। जिसका परिणाम आज ब्रिटेन, जर्मनी, स्वीडन, नार्वे, फ्रांस, स्पेन, नीदरलैंड जैसे देश भुगत रहे हैं। इसलिए भारत में अवैध घुसपैठियों को मतदाता बनने से रोकने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। अन्यथा संविधान की आड़ लेकर, लोकतंत्र को बंदी बनाने का काम करने वाली ताकतें देश को बर्बाद कर देंगी। 

चुनाव आयुक्तों के मतभेद का पटाक्षेप: हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी के बीच मतभेद की बात को जोर-शोर से उठाया गया। मीडिया खबरों में मुख्य रूप से तीन मुद्दे उठाए गए थे। पहला मुद्दा था, एसआईआर के तहत नामों को जोडऩे, हटाने को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति। दूसरा, फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई। और तीसरा मुद्दा था ईसीआई नेट के केन्द्रीकरण का, जिससे कि स्थानीय चुनाव अधिकारी उसे एक्सेस नहीं कर सकते थे। इस पर आयोग ने स्पष्टीकरण दे दिया है। साथ ही चुनाव आयुक्तों में एकजुटता और अपनी संवैधानिक एवं गैर दलीय प्रतिबद्धता को सार्वजनिक रूप से दोहराया है। 

विपक्षी दल और नेता बिना विषय की गंभीरता को समझे प्रतिवाद करेंगे तो जनता ज्यादा भ्रमित हो सकती है। भ्रामक दुष्प्रचार रोकने के लिए चुनाव आयोग के तीनों आयुक्तों में तुरंत बैठक करके एक संयुक्त प्रैस विज्ञप्ति को जारी किया। लेकिन इस प्रकार से संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करके, आम जनता में उनकी विश्वसनीयता पर अपुष्ट प्रश्न उठाकर किसे लाभ पहुंचाने का प्रयास किया जाता है? इससे पहले भी सुकुमार सेन और नेहरू में  मतभेद रहे हैं। 

टी.एन. शेषन, जे.एम. लिंगदोह जैसे चुनाव आयुक्तों के तत्कालीन सरकारों से मतभेद रहे हैं।  विपक्ष को सरकार की आलोचना करने का अधिकार और कत्र्तव्य भी है। किंतु चुनाव आयोग जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थान पर सड़क छाप हमले ठीक नहीं हैं। चुनाव हारने पर आत्मचिंतन करने की बजाय, आयोग की आलोचना से क्या हासिल होगा? इसे ही ‘नाच न जाने आंगन टेढ़ा’ की कहावत से चरितार्थ किया जा रहा है। (रवि रमेशचंद्र जे.एन.यू. के अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में  एसोसिएट प्रोफैसर हैं और यदुनाथ देशपांडे मुंबई विश्वविद्यालय में पी.एच.डी. शोधार्थी हैं।)-रवि रमेशचंद्रयदुनाथ देशपांडे

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