मोदी और कार्नी : एक नए ग्लोबल ऑर्डर के रचयिता

Edited By Updated: 08 Feb, 2026 04:16 AM

modi and carney architects of a new global order

इकोनॉमिक नैशनलिज्म के फिर से उभरने से दुनिया की राजनीति में पुराने रिवाज हिल गए हैं और नियमों पर आधारित इंटरनैशनल ऑर्डर में भरोसा डगमगा गया है। यह सबसे साफ तौर पर डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ वॉर के दौरान दिखा, जिसमें न सिर्फ दुश्मनों को, बल्कि साथियों...

इकोनॉमिक नैशनलिज्म के फिर से उभरने से दुनिया की राजनीति में पुराने रिवाज हिल गए हैं और नियमों पर आधारित इंटरनैशनल ऑर्डर में भरोसा डगमगा गया है। यह सबसे साफ तौर पर डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ वॉर के दौरान दिखा, जिसमें न सिर्फ दुश्मनों को, बल्कि साथियों को भी टारगेट किया गया। भारत, जो कभी अमरीका की इंडो-पैसिफिक पॉलिसी में एक पसंदीदा पार्टनर था और कनाडा, जो एक अच्छा पड़ोसी और समय की कसौटी पर खरा उतरा दोस्त था, दोनों टैरिफ का शिकार हुए।

मैसेज साफ था-स्वार्थ से चलने वाली दुनिया में, भरोसेमंद पार्टनर भी अब स्थिरता को हल्के में नहीं ले सकते।इसने मध्यम और उभरते देशों को ग्लोबल सिस्टम में अपनी जगह पर फिर से सोचने पर मजबूर किया। यहीं पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और मार्क कार्नी के बताए गए विचार खास अहमियत रखते हैं। साथ मिलकर, अपने कामों और अपने आइडिया के जरिए, वे सहयोग और नियमों के सम्मान पर आधारित एक बैलेंस्ड ग्लोबल ऑर्डर की ओर इशारा करते हैं।

दावोस में कार्नी ने समाज के उस हिस्से की आवाज बनकर बात की, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है-डिवैल्प्ड और डिवैल्पिंग दुनिया की ‘मिडल पावर्स’। उनकी स्पीच ने बड़े पावर स्ट्रगल और आर्थिक संकटों में फंसे देशों की नाराजगी को साफ तौर पर दिखाया। इससे भी जरूरी बात यह है कि उन्होंने दुनिया को एक नई वोकैबुलरी दी, जिसने डिवैल्प्ड और डिवैल्पिंग देशों के बीच बढ़ते गैप को कम करने और एक सांझा भविष्य की रक्षा करने की सांझी जिम्मेदारी पर जोर दिया। कार्नी का संदेश साफ था-रूल्स-बेस्ड ऑर्डर पर दबाव है लेकिन यह न तो आऊटडेटेड है और न ही रिप्लेसेबल। इसे रिफ्रैश करने की जरूरत है, छोडऩे की नहीं।

इसी ग्लोबल इनस्टेबिलिटी के जवाब में प्रधानमंत्री मोदी की अप्रोच कम शोर वाली रही लेकिन कम असरदार नहीं। बयानबाजी की बजाय, भारत ने रणनीतिक आर्थिक राजनीति पर फोकस किया। ट्रेड वॉर के एक दौर के बाद, नई दिल्ली ने न्यूजीलैंड, यूनाइटेड किंगडम और यूरोपियन यूनियन जैसे पार्टनर्स के साथ उच्च गुणवत्तापूर्ण फ्री ट्रेड एग्रीमैंट्स को तेजी से आगे बढ़ाया है। ये एग्रीमैंट इंटरनैशनल ट्रेड में बहुत जरूरी स्थिरता देते हैं, खुलेपन के लिए भारत की कमिटमैंट दिखाते हैं और इसे ग्लोबल कैपिटल के लिए एक पसंदीदा मार्कीट और गंतव्य बनाते हैं। सप्लाई चेन में रुकावटों और अस्थिर कैपिटल फ्लो के समय में, भारत स्थिरता का एक मजबूत पिल्लर बनकर उभरा है।

इन दोनों अप्रोच का कॉम्बिनेशन-कार्नी की आइडियोलॉजिकल दिशा और मोदी का प्रैक्टिकल परफॉर्मैंस-एक मजबूत कम्युनिटी के लिए स्टेज तैयार करता है। मार्च में कार्नी का भारत दौरा, जिसके दौरान एक बड़ी एनर्जी डील होने की संभावना है और कॉम्प्रिहैंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमैंट (सी.ई.पी.ए.) पर बातचीत चल रही है, इस कॉम्बिनेशन को दिखाता है। एक स्ट्रक्चर्ड इंडिया-कनाडा फ्री ट्रेड एग्रीमैंट से दोनों देशों को फायदा होगा-एनर्जी को-ऑप्रेशन मजबूत होगा, सप्लाई चेन में डायवर्सिटी आएगी और इन्वैस्टमैंट फ्लो बढ़ेगा।

मोटे तौर पर, भारत और कनाडा दुनिया में स्थिरता के केंद्र बन सकते हैं। दोनों ही प्लूरलिस्टिक डैमोक्रेसी हैं, ग्लोबलाइजेशन के लाभार्थी हैं लेकिन इसकी इनइक्वालिटीज के बारे में भी अच्छी तरह जानते हैं। इकोनॉमिकली, डिप्लोमैटिकली और मोरली एक साथ आगे बढ़कर, ये दोनों देश रूल्स-बेस्ड ऑर्डर में भरोसा बनाए रख सकते हैं-एक ऐसा सिस्टम, जो सिर्फ पावरफुल लोगों के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए काम करे। ग्लोबल लीडरशिप अब सिर्फ दबदबे से तय नहीं होती। इसे पुल बनाने, भरोसा फिर से बनाने और तब स्थिरता देने से तय किया जाता है, जब दूसरे देश जीरो-सम सोच की ओर मुड़ जाते हैं। अलग-अलग तरीकों से, मोदी और कार्नी एक ही काम कर रहे हैं-चुपचाप एक नए ग्लोबल ऑर्डर का ब्लूप्रिंट बना रहे हैं।-लवलीन गिल 
 

Related Story

    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!