Edited By Sarita Thapa,Updated: 27 Sep, 2026 03:12 PM

पितृपक्ष का समय हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे पावन पर्व माना जाता है। हिंदू धर्म में पितृपक्ष के दौरान तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन का जितना महत्व है, उतना ही महत्व शाम के समय पितरों के नाम का दीया जलाने का भी है।
Pitru Paksha 2026 : पितृपक्ष का समय हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे पावन पर्व माना जाता है। हिंदू धर्म में पितृपक्ष के दौरान तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन का जितना महत्व है, उतना ही महत्व शाम के समय पितरों के नाम का दीया जलाने का भी है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शाम ढलते ही पितरों के लिए दीया क्यों जलाया जाता है। इसे किस दिशा में रखना चाहिए और इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यताएं हैं? तो आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।
पितृपक्ष में शाम को ही क्यों जलाया जाता है दीया?
धर्म-शास्त्रों और लोक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष के 16 दिनों में हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में पृथ्वी पर अपने परिवारजनों के बीच आते हैं और आशीर्वाद देते हैं। माना जाता है कि शाम के समय पितर अपने लोक की ओर लौटने की तैयारी करते हैं। ढलते सूरज के बाद अंधेरा होने लगता है, इसलिए उनके मार्ग को आलोकित और सुगम बनाने के लिए दीया जलाया जाता है। यह दीपक उनके लिए एक मार्गदर्शक ज्योति का काम करता है। इस समय घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और पितरों की आत्मा को असीम शांति मिलती है।
दीपक जलाने की सही दिशा कौन सी है?
पितरों की पूजा में दिशा का सही ज्ञान होना बेहद जरूरी माना गया है, क्योंकि गलत दिशा में रखा दीपक शुभ फल नहीं देता। वास्तु शास्त्र और धर्म ग्रंथों के अनुसार, दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना गया है। इसलिए जब भी आप पितरों के नाम का दीया जलाएं, तो उसकी लौ का मुख हमेशा दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए।
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