9 सितंबर से 18 सितंबर तक 10 दिन के मीडिया परिचय दौरे में भारत के विकास को दिखाया गया, इसकी ऐतिहासिक विरासत और तेजी से बदलते आर्थिक और तकनीकी सिस्टम का एक साथ होना। इस दौरे से यह पता चला कि देश विरासत, शहरी विकास, फाइनेंस, डिजिटल टेक्नोलॉजी और...
India Development Journey : 9 सितंबर से 18 सितंबर तक 10 दिन के मीडिया परिचय दौरे में भारत के विकास को दिखाया गया, इसकी ऐतिहासिक विरासत और तेजी से बदलते आर्थिक और तकनीकी सिस्टम का एक साथ होना। इस दौरे से यह पता चला कि देश विरासत, शहरी विकास, फाइनेंस, डिजिटल टेक्नोलॉजी और क्रिएटिव एंटरप्राइज को कैसे जोड़ता है। यह प्रोग्राम भारत के विदेश मंत्रालय ने अफ्रीका, एशिया, यूरोप, मिडिल ईस्ट और लैटिन अमेरिका के 19 देशों के मीडिया एडिटर और पत्रकारों के लिए आयोजित किया था।
इसमें भाग लेने वाले देश थे बेलारूस, बोलीविया, ब्राज़ील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, कज़ाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, युगांडा, उज़्बेकिस्तान और वियतनाम। आने वाले पत्रकारों के लिए, इस प्रोग्राम ने आधिकारिक मीटिंग और डिप्लोमैटिक कार्यक्रमों से परे भारत के पहलुओं को अनुभव करने के मौके दिए।अफ्रीकन आर्ट खरीदें
ताजमहल और आगरा का किला: इतिहास की अनमोल विरासत
आगरा और मुंबई की यात्रा ने एक बड़ा सवाल उठाया: कोई देश भविष्य के लिए लगातार निर्माण करते हुए अपने अतीत को कैसे बचाकर रखता है? शायद सबसे खास शुरुआत ताजमहल से हुई। मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल के मकबरे के तौर पर यह स्मारक बनवाया था, जो आज भी भारत की सबसे जानी-मानी निशानियों में से एक है। इसकी जानी-मानी कहानी प्यार, दुख और भक्ति की है। फिर भी, स्मारक के सामने खड़े होने से त्याग, लीडरशिप, सेवा और विरासत पर एक और सोच मिलती है। साउथ अफ्रीका की जर्नलिस्ट फवज़िया मूडली के लिए, ताजमहल प्यार का एक और रूप दिखाता है, जो समाज के लिए सेवा और त्याग करने की इच्छा के ज़रिए ज़ाहिर होता है। सवाल यह बन गया कि नेता और समाज आने वाली पीढ़ियों के लिए आखिर क्या छोड़कर जाते हैं ? ताजमहल सदियों से बचा हुआ है और भारत की सांस्कृतिक पहचान और इंटरनेशनल इमेज का एक अहम हिस्सा बन गया है। आगरा का किला देश की ऐतिहासिक गहराई और आर्किटेक्चरल विरासत की एक और याद दिलाता है।
इस अनुभव ने नाइजीरिया की अपनी विरासत पर भी सोचने को मजबूर किया, जहां कई ऐतिहासिक जगहें संस्कृति और पहचान की अहम जगहें बनी हुई हैं लेकिन आगरा में फोकस साफ तौर पर भारत की अपनी ऐतिहासिक विरासत को बचाकर रखने और दुनिया भर के विजिटर्स के सामने पेश करने की क्षमता पर था। आगरा से मुंबई के सफर ने ऐतिहासिक चीजों को बचाने से ध्यान हटाकर तेजी से बढ़ते तटीय शहर को मैनेज करने की चुनौतियों पर ला दिया।
मुंबई पहुंचने वाले नाइजीरियाई पत्रकार फ्रेड इदेहाई के लिए, शहर ने एक अनजान सा अपनापन भी पैदा किया।
पुल, वॉटरफ़्रंट, घनी स्काईलाइन और कमर्शियल एक्टिविटी ने लागोस की याद दिलाई। फिर भी, समानता के अलावा यह समझने का मौका था कि मुंबई एक बड़े तटीय शहर की असलियत को कैसे मैनेज करता है।
मुंबई: शहरी विकास और आपदा प्रबंधन की मिसाल
बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के अधिकारियों के साथ बातचीत के दौरान, मुंबई के कई प्राकृतिक खतरों के संपर्क में आने पर चर्चा हुई। इनमें साइक्लोन, बाढ़, भूकंप और लैंडस्लाइड शामिल हैं। अधिकारियों ने बताया कि नए कंस्ट्रक्शन में डिज़ास्टर-रेज़िलिएंट फ़ीचर शामिल हैं जो तेज़ हवाओं, बाढ़ और भूकंप जैसे खतरों का सामना करने के लिए डिजाइन किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि तटीय स्ट्रक्चर, उनकी जगहों से जुड़े पर्यावरण के हालात को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। शहर के रिस्पॉन्स मैकेनिज़्म फ़िज़िकल इंफ़्रास्ट्रक्चर से भी आगे तक फैले हुए हैं।
अधिकारियों ने कमजोर जगहों के आसपास पुलिस पेट्रोलिंग, बीच पर लाइफ़गार्ड और पानी से जुड़ी इमरजेंसी के दौरान उपलब्ध डिज़ास्टर-रिस्पॉन्स कर्मचारियों पर जोर दिया।
उन्होंने यह भी बताया कि जब और मदद की जरूरत होती है तो इंडियन नेवी और इंडियन कोस्ट गार्ड के साथ कोऑर्डिनेशन की जरूरत होती है। मुंबई से बड़ी सीख यह थी कि रेजिलिएंस में सिर्फ़ यही नहीं, बल्कि और भी बहुत कुछ शामिल है, मजबूत इमारतें बनाना।
“इसके लिए जोखिमों का अंदाज़ा लगाना, संस्थानों में तालमेल बिठाना और ऐसे सिस्टम बनाए रखना जरूरी है जो समुदायों के इमरजेंसी का सामना करने पर जवाब दे सकें। शहरी लचीलेपन से लेकर फा इनेंशियल मार्केट तक के सफर ने भारत के बदलाव का एक और पहलू दिखाया।” बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में, भारत के कैपिटल मार्केट के विकास को लगभग संस्थान के इतिहास के जरिए ही पढ़ा जा सकता है।
BSE: पारंपरिक कारोबार से डिजिटल ट्रेडिंग तक
BSE के मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एग्ज़ीक्यूटिव ऑफ़िसर, सुंदररामन राममूर्ति ने कहा कि एक्सचेंज मुंबई में एक बरगद के पेड़ के नीचे इनफ़ॉर्मल स्टॉक ट्रेडिंग से विकसित हुआ। इनफ़ॉर्मल एसोसिएशन आखिरकार मॉडर्न एक्सचेंज बनने से पहले नेटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स एसोसिएशन बन गया। यह बदलाव सिर्फ इंस्टीट्यूशनलाइज़ेशन के साथ ही नहीं रुका। राममूर्ति ने बताया कि ट्रेडिंग हॉल में कभी एक एक्टिव ट्रेडिंग रिंग हुआ करता था जहाँ ब्रोकर बोलकर बोली लगाने और हाथ के इशारों से ट्रांज़ैक्शन करते थे। आज, कोई ट्रेडिंग रिंग नहीं है। ट्रेडिंग एक्सचेंज फ़्लोर से ब्रोकरेज ऑफ़िस, फिर इन्वेस्टर के कंप्यूटर और तेज़ी से स्मार्टफ़ोन पर चली गई। यह बदलाव भारत के आर्थिक विकास की एक खासियत दिखाता है- संस्थाएं टेक्नोलॉजी में बदलाव के हिसाब से खुद को ढाल रही हैं और साथ ही हिस्सेदारी भी बढ़ा रही हैं।
राममूर्ति ने कहा कि भारत में 260 मिलियन से ज्यादा यूनिक इन्वेस्टर अकाउंट हैं जो इसमें हिस्सा ले रहे हैं, सिक्योरिटीज मार्केट में। हालांकि, उन्होंने कहा कि देश की आबादी को देखते हुए इसमें और बढ़ोतरी की काफी गुंजाइश है। रामामूर्ति का कहना है कि कैपिटल मार्केट का महत्व सिर्फ़ सिक्योरिटीज़ की खरीद-बिक्री तक ही सीमित नहीं है।
उन्होंने एक्सचेंज को भरोसे का मंदिर बताया और निवेशकों के भरोसे, रेगुलेशन और पारदर्शिता पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, ‘‘स्टॉक एक्सचेंज घरेलू बचत को उत्पादक पूंजी में बदलने का तरीका देते हैं, जिससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिल सकता है। अफ्रीकी पत्रकार के लिए, इस चर्चा से स्वाभाविक रूप से घरेलू बचत को जुटाने में पूंजी बाज़ार की भूमिका के बारे में सवाल उठे लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात भारत के अपने वित्तीय सिस्टम में हो रहे बड़े बदलाव का पैमाना था।
UPI: भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की मजबूत कड़ी
पारंपरिक सिस्टम से टेक्नोलॉजी-आधारित प्लेटफॉर्म की ओर यही बदलाव नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) में भी साफ तौर पर देखा गया। NPCI में पत्रकारों को यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के बारे में बताया गया। UPI भारत के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम का एक अहम हिस्सा बन गया है। NPCI इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड में एशिया पैसिफिक की हेड, सोनल असनानी ने बताया कि UPI की ताकत मुख्य रूप से इसकी इंटरऑपरेबिलिटी (अलग-अलग सिस्टम के बीच काम करने की क्षमता) में है। यह सिस्टम यूज़र्स को इसमें शामिल बैंकों और एप्लिकेशन के बीच ट्रांज़ैक्शन करने की सुविधा देता है। इसका आर्किटेक्चर असल फाइनेंशियल अकाउंट को कंज्यूमर-फेसिंग एप्लिकेशन से अलग रखता है। इससे यूजर्स किसी खास बैंकिंग एप्लिकेशन तक सीमित रहे बिना पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं।
NPCI के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2026 में 752 बैंक UPI पर लाइव थे और उस महीने 24.5 अरब से ज़्यादा ट्रांज़ैक्शन दर्ज किए गए। इस मॉडल की अहमियत सिर्फ़ ट्रांज़ैक्शन की स्पीड में नहीं, बल्कि हर पेमेंट के पीछे काम करने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर में है। एक साधारण मोबाइल ट्रांज़ैक्शन बैंकों, पेमेंट प्लेटफॉर्म, टेक्नोलॉजी सिस्टम और ऑथेंटिकेशन मैकेनिज्म के बीच तालमेल पर निर्भर करता है। इस दौरे से यह देखने का मौका मिला कि कैसे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भारत में रोजमर्रा की आर्थिक ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है।
इससे यह भी पता चला कि बड़े पैमाने पर डिजिटल बदलाव फाइनेंशियल इकोसिस्टम में इंटरऑपरेबिलिटी, भरोसे, कनेक्टिविटी और भागीदारी पर निर्भर करता है। इसके बाद, जानकारी हासिल करने का यह दौरा फाइनेंस और टेक्नोलॉजी से आगे बढ़कर भारत की क्रिएटिव इकोनॉमी की ओर बढ़ा।
फिल्म सिटी: बॉलीवुड की वैश्विक पहुंच और सांस्कृतिक प्रभाव
बॉलीवुड फिल्में देखकर बड़े हुए एक गुमनाम पत्रकार के अनुसार, उनकी प्रोडक्शन से जुड़ी जगह पर जाने से बचपन की यादें असल हकीकत में बदल गईं।जाने-पहचाने सेट और माहौल ने उस चीज को, जिसे कभी सिर्फ़ टेलीविजन स्क्रीन पर देखा था, भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य के एक ठोस हिस्से में बदल दिया। लेकिन पुरानी यादों से कहीं ज़्यादा, भारत की क्रिएटिव इंडस्ट्री की ताकत की अहमियत को समझा गया।
“बॉलीवुड ने भारतीय संस्कृति, कहानियों, संगीत और फ़ैशन को देश की सीमाओं से बहुत दूर के दर्शकों तक पहुँचाने में मदद की है। इस अनुभव से नाइजीरिया के नॉलीवुड की भी याद आई। नाइजीरिया और भारत के बीच पहले से ही एक दिलचस्प सांस्कृतिक संबंध है, जो नाइजीरियाई दर्शकों के बीच भारतीय फ़िल्मों की लोकप्रियता और नॉलीवुड की अंतरराष्ट्रीय पहुंच पर आधारित है। नाइजीरिया की कला, संस्कृति, पर्यटन और क्रिएटिव इकॉनमी मंत्री, हन्नातु मुसावा ने नॉलीवुड और बॉलीवुड को “कहानी कहने और आपसी समझ के पुल” बताया है। उन्होंने दोनों देशों के बीच गहरे क्रिएटिव सहयोग के लिए भी समर्थन जताया है। इस तरह के सहयोग में फ़िल्म निर्माण, तकनीकी प्रशिक्षण, वितरण, फ़ेस्टिवल और क्रिएटिव इकॉनमी के अन्य क्षेत्र शामिल हो सकते हैं। बेहतर आदान-प्रदान की संभावना दोनों इंडस्ट्रीज़ के बीच के रिश्ते को देखने लायक बनाती है। इसलिए, इस जानकारी हासिल करने वाले दौरे ने भारत के अलग-अलग पहलुओं को उजागर किया, बिना देश की विकास गाथा को सिर्फ़ एक सेक्टर तक सीमित किए। आगरा ने एक ऐसे देश की तस्वीर पेश की जो अपनी ऐतिहासिक विरासत के प्रति बहुत जागरूक है। मुंबई ने एक ऐसे शहर की तस्वीर दिखाई जो शहरी विकास, पर्यावरणीय जोखिमों और आधुनिक बुनियादी ढांचे के बीच संतुलन बना रहा है। BSE ने एक वित्तीय संस्थान के विकास को दिखाया, जो पेड़ के नीचे अनौपचारिक ट्रेडिंग से शुरू होकर टेक्नोलॉजी-आधारित लेन-देन तक पहुंचा है।
NPCI ने दिखाया कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर किस बड़े पैमाने पर रोज़मर्रा की वित्तीय गतिविधियों को बदल सकता है। फ़िल्म सिटी ने दिखाया कि कैसे क्रिएटिव इंडस्ट्रीज राष्ट्रीय सीमाओं से परे सांस्कृतिक प्रभाव का जरिया बन सकती हैं।
जानकारों का कहना है कि ये सभी अनुभव मिलकर एक ऐसे भारत की तस्वीर पेश करते हैं जो लगातार अपनी विरासत और भविष्य के निर्माण के बीच संतुलन बना रहा है। यह अंतर शायद देश की विकास गाथा का सबसे दिलचस्प हिस्सा है; इसका अतीत स्मारकों, वास्तुकला और सांस्कृतिक परंपराओं में दिखता है। इसका भविष्य तेजी से डिजिटल पेमेंट, फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी, मजबूत बुनियादी ढांचे और क्रिएटिव उद्यमों में दिखाई दे रहा है। ये दोनों जरूरी नहीं कि एक-दूसरे के विरोधी हों।
यह अनुभव दिखाता है कि कैसे भारत की समृद्ध विरासत बदलती दुनिया के लिए बनाए गए आधुनिक संस्थानों के साथ-साथ फल-फूल रही है। संस्कृति के जानकारों का कहना है कि परंपरा और प्रगति का यह बेहतरीन मेल इस दौरे का सबसे यादगार पहलू रहा। कुल मिलाकर, भारत का सफर न तो इतिहास को सख्ती से संजोकर रखने जैसा है और न ही भविष्य की ओर अंधी दौड़, यह इन दोनों कालखंडों को एक ही, एकजुट राष्ट्रीय पहचान में पिरोने का एक बेहतरीन उदाहरण है।