नवरात्र अष्टमी: अधूरी इच्छाएं होंगी पूरी, करें महागौरी का पूजन

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Saturday, October 08, 2016-9:22 AM

श्लोक: या देवी सर्वभू‍तेषु महागौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

 

अवतार वर्णन: मूलप्रकृति नवदुर्गा के रूपों में महागौरी आठवीं शक्ति स्वरूपा हैं। शास्त्रानुसार नवरात्र अष्टमी पर महागौरी की पूजा अर्चना का विधान है। देवी महागौरी आदीशक्ति स्वरूपा हैं इनके तेज से संपूर्ण विश्व प्रकाशमय होता है। इनकी शक्ति अमोघ फलदायिनी है। मां महागौरी की अराधना से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा देवी का भक्त जीवन में पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी बनता है। दुर्गा सप्तशती में ऐसा वर्णन आता है की एक समय में देवतागण ने शुभ निशुम्भ से पराजित होने के बाद गंगा के तट पर जाकर देवी से प्रार्थना की कि देवताओं ने देवी महागौरी का गुणगान किया। देवी महागौरी के अंश से ही कौशिकी का जन्म हुआ जिसने शुम्भ निशुम्भ के प्रकोप से देवताओं को मुक्त कराया।


यह देवी गौरी शंकर की पत्नी हैं यही शिवा और शाम्भवी के नाम से पूजी जाती हैं। शब्द महागौरी दो शब्दों से मिलकर बना है माह+गौरी, महा का अर्थ है महान (सबसे बड़ी) और गौरी का अर्थ है देवी गौर अर्थात माता गौरी। ऐसा पुराणोक्त वर्णित है देवी पार्वती रूप में इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान शंकर ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं। जिससे देवी का मन  आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं। इस प्रकार वर्षों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शंकर उनके पास पहुंचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं। पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं। 


स्वरुप वर्णन: शास्त्रों में देवी महागौरी को चतुर्भुजी (चार भुजा) कहकर संबोधित किया गया है। देवी महागौरी की दाईं भुजा अभय मुद्रा में हैं। जो भक्तों को सर्व सुख प्रदान करती हैं, इनकी नीचे वाली भुजा में त्रिशूल शोभा बढाता है। इनकी बाईं भुजा में डमरू है जो सम्पूर्ण जगत का निर्वाहन कर रहा है और नीचे वाली भुजा से देवी गौरी भक्तों की प्रार्थना सुनकर वरदान दे रही हैं। देवी महागौरी को “श्वेताम्बर परिधान” अर्थात सफ़ेद वस्त्र धारण किए हुए देवी कहा गया है। इनकी सवारी श्वेत रंग का “वृष” है तथा ये सैदेव शुभंकरी (शुभ करने वाली) कहा गया है। ऐसा शास्त्रों में वर्णित है की भगवान शंकर को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शंकर जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा।


साधना वर्णन: नवरात्र की अष्टमी तिथि को देवी महागौरी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है।  देवी महागौरी की उपासना करने से मन पवित्र हो जाता है और भक्त की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। नवरात्र की अष्टमी तिथि पर देवी महागौरी का विधि अनुसार षोडशोपचार पूजन किया जाता है। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। महागौरी का विधिवत पूजन करने से अविवाहितों का विवाह होने में आने वाली समस्त बाधाओं का नाश होता है। मकान बनवाने में आ रही अड़चनें हो अथवा नौकरी से संबंधित बाधाएं सभी प्रकार की समस्याओं से मुक्ति मिलती है। जो सुहागन महिला देवी महागौरी की भक्ति भाव से पूजन करती हैं उनके सुहाग की रक्षा देवी स्वयं करती हैं। कुंवारी लड़की मां की पूजा करती हैं तो उसे योग्य पति प्राप्त होता है। पुरूष जो देवी गौरी की पूजा करते हैं उनका जीवन सुखमय रहता है देवी उनके पापों को जला देती हैं और शुद्ध अंत:करण देती हैं। मां अपने भक्तों को अक्षय आनंद और तेज प्रदान करती हैं।  इनका ध्यान इस प्रकार है


पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्। वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥ 


योगिक दृष्टिकोण: नवरात्र की अष्टमी में साधक की कुण्डलनी जागृत हो जाती है। नवरात्र अष्टमी तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए सर्वाधिक शक्ति अर्जित करने वाली कही गयी है। अष्टमी की रात्रि को “चेतन रात्रि” भी कहा गया है। शास्त्रों में नवरात्र अष्टमी तिथि का अत्यंत महत्व बताया गया है। सिद्धि प्राप्त साधक अष्टमी में देवी का साक्षात्कार भी कर पाते हैं। इनकी पूजा अर्चना से समस्त कष्ट दूर होते हैं तथा अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है। योगिक दृष्टिकोण से मानव शरीर में देवी महागौरी का स्थान व्यक्ति का मन है। 


ज्योतिष दृष्टिकोण: मां महागौरी की साधना का संबंध छाया ग्रह राहू से है। कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार कुण्डली में राहू ग्रह का संबंध छठे सातवें और अष्टम भाव से लिया जाता है हालांकि राहू ग्रह की किसी भी भाव और राशि पर आधिपत्य नहीं रखता अतः मां महागौरी की साधना का संबंध शत्रुनाश, रोगनाश, वैवाहिक जीवन, विवाह में आ रही बाधा, भोगोलिक सुख, ग्रहस्थी सुख, आयु, ऐश्वर्य और विलासिता से है। जिन व्यक्तियों कि कुण्डली में राहू ग्रह नीच, अथवा शनि से युति कर पितृ दोष बना हो रहा है अथवा राहू मीन अथवा धनु राशि में आकर नीच एवं पीड़ित है उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है मां महागौरी की साधना। मां महागौरी कि साधना से व्यक्ति को अकस्मात लाभ की प्राप्ति होती है, विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं, व्यक्ति दीर्घायु बनता है, रोग और शत्रु नाश होता है, शारीरिक और भौगोलिक सुखो में वृद्धि होती है। जिस व्यक्ति की आजीविका का शेयर मार्केट ट्रेडिंग, कबाड़, क्लार्क, कंप्यूटर ऑपरेटर, पुलिस अथवा सिक्योरिटी सर्विसेज से हो उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है मां महागौरी की साधना । 


वास्तु दृष्टिकोण: मां महागौरी कि साधना का संबंध वास्तुपुरुष सिद्धांत के अनुसार छाया ग्रह राहू से है, इनकी दिशा दक्षिण पश्चिम (नैत्रिग्य कोण) है, निवास में बने वो स्थान जहां पर पितृ स्थान, टॉयलेट, बाथरूम, कबाड़ घर इत्यादी हो अथवा जिन व्यक्तियों का घर दक्षिणपश्चिम मुखी हो अथवा जिनके घर पर दक्षिणपश्चिम दिशा में वास्तु दोष आ रहे हो उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है मां महागौरी की आराधना। 

उपाय: अकस्मात लाभ के लिए देवी महागौरी के चित्र पर सौंठ चढ़ाएं। 

आचार्य कमल नंदलाल
ईमेल: kamal.nandlal@gmail.com

 

Edited by:Aacharya Kamal Nandlal

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