दिल्ली के कुलदीप बिशनोई न बन जाएं अरविन्द केजरीवाल!

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Tuesday, December 03, 2013-8:31 AM

नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा मतदान के नतीजे आने को सिर्फ 6 दिन बचे हैं, ऐसे में राजनीतिक हल्कों में आम आदमी पार्टी के प्रधान अरविन्द केजरीवाल के राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। राजनीति के जानकार सवाल उठा रहे हैं कि अरविन्द केजरीवाल कहीं हरियाणा जनहित कांग्रेस के प्रधान कुलदीप बिशनोई न बन कर रह जाएं। अलग-अलग एजेंसियों की तरफ से किये गए सर्वे में अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को 10 सीट मिलने की उम्मीद ज़ाहिर की जा रही है।

यदि सर्वे के नतीजे ठीक रहते हैं तो अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी दिल्ली में सरकार के गठन में अहम भूमिका में आ जायेगी परन्तु अरविन्द केजरीवाल लगातार किसी भी पार्टी के साथ गठजोड न करने की बात कह रहे हैं। हालांकि हो सकता है कि अरविन्द केजरीवाल अपनी इस बात पर कायम रहें परन्तु इस बात की क्या गारंटी है कि अरविन्द केजरीवाल की टिकट पर चुनाव जीत कर आने वाले लोग अरविन्द केजरीवाल के साथ टिके रहेंगे।

हरियाणा में राजनीति का पुराना तजुर्बा तो इस बात पर यकीन न करने को मज़बूर करता है। 2009 की हरियाणा विधान सभा चुनाव में कांग्रेस 90 में से 40 सीटों पर जीती थी और उसे बहुमत साबित करने के लिए 6 और सीटों की ज़रूरत थी। ऐसे में हरियाणा में अलग पार्टी बना कर चुनाव लडऩे वाले कुलदीप बिशनोई के 5 विधायक पार्टी से टूट गए और उन्होंने भुपिन्दर हुड्डा का समर्थन कर दिया। हुड्डा ने दो और विधायकों से समर्थन हासिल करके हरियाणा में अपनी सरकार बनाई। कुलदीप बिशनोई इस मामले में कुछ नहीं कर सके।

देश में दल-बदल विरोधी कानून लागू है और दल बदलने वाले विधायकों और सांसदों की मैंबरशिप ख़ारिज करने की भी व्यवस्था है परन्तु यदि किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक अलग हो कर नई पार्टी बना लें तो पार्टी इस में कुछ नहीं कर सकती। ऐसा ही कुछ कुलदीप बिशनोई के मामलो में भी हुआ था। हालांकि कुलदीप बिशनोई ने इस मामले में हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाज़ा खटखटाया परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कह कर पूरे मामले में दख़ल नहीं दिया कि विधायकों को अयोग्य ठहराने बारे कोई भी फ़ैसला लेना विधान सभा स्पीकर का काम है। इस साल जनवरी को हरियाणा विधान सभा के स्पीकर ने भी कुलदीप बिशनोई की अपने  5 विधायकों को अयोग्य ठहराने की अर्जी को खारिज कर दिया।

दिल्ली विधान सभा चुनाव में यदि केजरीवाल की पार्टी 8 सीटें भी जीत जाती है तो 6 विधायकों के साथ छोडऩे की स्थिति में अरविन्द केजरीवाल कुछ नहीं कर सकेंगे। बहुमत न मिलने की स्थिति में कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी के विधायकों को मंत्री के ओहदे या बोर्ड के चेयरमैन की पेशकश करेगी तो इस बात की क्या गारंटी है कि आम आदमी पार्टी के संभावित विधायक कांग्रेस या बीजेपी के साथ हाथ नहीं मिला लेंगे।

हालांकि चुनाव नतीजे आने से पहले इस तरह की बात सोचना सिर्फ अटकलबाजी है परन्तु राजनीति में कुछ भी नामुमकिन नहीं है, लिहाज़ा सब को 8 दिसंबर का इंतज़ार करना चाहिए। चुनाव नतीजे आने के बाद ही केजरीवाल के साथ जुड़े उनके साथियों की गंभीरता का भी पता चल जायेगा।


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