क्या सच में ममता ने मोदी को पछाड़ा!

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Sunday, March 09, 2014-5:10 PM

नर्इ दिल्ली: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी गुजरात में विकास कार्यों के लिए नरेंद्र मोदी को श्रेय देने को राजी नहीं हैं। तृणमूल प्रमुख का मानना है कि उनका स्वयं का माडल कहीं बेहतर है तथा उससे अच्छे नतीजे मिले हैं।
 
‘‘विकास बनाम विकास’’ बहस में उन्होंने कहा कि परिस्थितियों के चलते उनके एवं मोदी के माडलों में ‘‘भारी अंतर’’ है। उन्होंने मीडिया को दिए एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘मैं आपके सवाल का सीधे जवाब देती हूंं। अगस्त 2011 में मुख्यमंत्री बनी ममता ने कहा कि इन समस्याओं से पार पाने के बावजूद हम विकास के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं।

उन्होंने यह बात इस सवाल के जवाब में कही कि क्या वह मोदी और अपने स्वयं के विकास माडल में अंतर पाती हैं। अपने विकास के माडल को बेहतर करार देते हुए तृणमूल प्रमुख ने कहा, ‘‘मैं तथ्यों की बात करती हूं और आपको बता देना चाहती दूं कि दोनों राज्यों (पश्चिम बंगाल एवं गुजरात) में तुलना नहीं की जा सकती।’’
 
उन्होंने कहा कि गुजरात में निरंतर विकास हुआ और उसके सामने कोई समस्या नहीं थी जबकि पश्चिम बंगाल को जमीन से उपर उठना पड़ा क्योंकि वह 34 साल के कम्युनिस्टों के शासन से तबाह हो गया था। ममता ने कहा कि पश्चिम बंगाल हर मानक से नीचे आ गया था। राज्य से ‘‘पूंजी पलायन’’ हो गया था 50 हजार कारखाने बंद हो गये थे और एक करोड़ लोग बेरोजगार हो गये थे।

उन्होंने दावा किया, ‘‘जब मेरी सरकार ने सत्ता संभाली तो पश्चिम बंगाल की यह कहानी थी। अन्य राज्यों में दशकों से निरंतर विकास हो रहा था।’’ मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘पश्चिम बंगाल जो आज कर रहा है वह कल भारत करेगा। ये खोखले शब्द नहीं हैं।’’

उन्होंने अपने मत को सही साबित करने के लिए कुछ ठोस उदाहरण बताये जिनमें उचित कीमतों वाली दवा की दुकानें, दवाओं की वेब के जरिये खरीद और ‘कन्या श्री’ योजना शामिल हैं। ममता ने कहा, ‘‘मेरे राज्य में अब एक पीपीपी नीति, एक आईटी नीति, एक कपड़ा नीति है।

हमने 34 माह में इतना अधिक काम किया है जितना कम्युनिस्टों ने 34 साल में नहीं किया था।’’उन्होंने कहा कि इन योजना को अन्य राज्यों में उनकी बेहतरी के लिए दोहराया जा सकता है। तृणमूल प्रमुख ने कहा कि उनके सत्ता में आने से पहले उनके राज्य में कार्य की संस्कृति तबाह हो गयी है।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरी सरकार ने जब सत्ता संभाली तो भारत में जितने कार्य दिवस खराब होते थे उनमें आधे बंगाल में होते थे। 2008 और 2011 के बीच 70 लाख कार्य दिवस हड़ताल के कारण बर्बाद हुए। हम इस आंकड़े को घटाकर 5200 पर लाये हैं और इस साल यह शून्य रहा।’’


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