Edited By ,Updated: 08 Jul, 2026 02:52 AM

हम लिखते रहते हैं कि लोगों को सस्ती और स्तरीय शिक्षा एवं चिकित्सा, स्वच्छ पेयजल और लगातार बिजली उपलब्ध करवाना केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, परंतु ये इसमें विफल हो रही हैं। ‘ड्रग्स कंट्रोल मीडिया नैटवर्क’ के 24 फरवरी, 2026 के आंकड़ों के...
हम लिखते रहते हैं कि लोगों को सस्ती और स्तरीय शिक्षा एवं चिकित्सा, स्वच्छ पेयजल और लगातार बिजली उपलब्ध करवाना केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, परंतु ये इसमें विफल हो रही हैं। ‘ड्रग्स कंट्रोल मीडिया नैटवर्क’ के 24 फरवरी, 2026 के आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष के शुरुआती महीनों में केरल, बिहार और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण व सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में अनैतिक चिकित्सा व्यवहार के कारण कई मरीजों की असमय मौत के गंभीर मामले दर्ज किए गए हैं। इसीलिए सरकारी अस्पतालों में इलाज के दौरान होने वाली लापरवाहियों के कारण लोग वहां इलाज के लिए जाने से संकोच करते हैं। ऐसी ही लापरवाहियों की इसी वर्ष 5 महीनों में सामने आई चंद घटनाएं निम्न में दर्ज हैं :
* 26 जनवरी को ‘तिरुवनंतपुरम’(केरल) के ‘विलापिल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र’ में सांस लेने में गंभीर तकलीफ के इलाज के लिए लाए गए ‘पी. बिस्मीर’ (37) को सी.सी.टी.वी. फुटेज में फर्श पर तड़पते हुए और उसकी पत्नी को मदद के लिए डाक्टरों के कमरों के चक्कर काटते देखा गया, लेकिन समय पर कोई चिकित्सा नहीं मिलने से उसकी जान चली गई।
* 23 मई को ‘तिरूचि’ (तमिलनाडु) स्थित ‘महात्मा गांधी मैमोरियल सरकारी अस्पताल’ में सिरदर्द और नाक के पर्दे की मामूली सर्जरी के लिए भर्ती नर्सिंग छात्रा ‘सीतालक्ष्मी’ की एनेस्थीसिया देने के दौरान दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई।
मौत के कारणों की जांच के लिए गठित समिति ने पाया कि ‘सीतालक्ष्मी’ की मौत सर्जरी से पहले दिए गए ‘डेक्सामेथासोन’ इंजैक्शन के कारण उसकी हृदयगति अत्यंत धीमी हो जाने (Arrhythmia) से हुई थी।
* 13 जून को ‘भोपाल’ (मध्य प्रदेश) स्थित ‘एम्स’ में कैंसर पीड़ित बच्चे को नॄसग स्टाफ द्वारा दवा की जगह ‘फॉर्मेलिन’ (शव को सुरक्षित रखने वाला कैमिकल) का इंजैक्शन लगा देने से उसकी दर्दनाक मौत हो गई। इस सिलसिले में 2 नर्सिंग अधिकारियों पर केस दर्ज किया गया।
* 26 जून को ‘खरसिया’ (छत्तीसगढ़) स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बवासीर के एक सामान्य ऑप्रेशन के बाद एक युवक की देखभाल में भारी लापरवाही के कारण हालत बिगड़ जाने से मौत हो गई।
* 28 जून को राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिले ‘नागौर’ स्थित सबसे बड़े ‘जे.एल.एन. सरकारी अस्पताल’ में अचानक 2 घंटे तक बिजली गुल रही और अस्पताल का मुख्य जैनरेटर भी ठप्प हो गया। इस दौरान डाक्टरों को मोबाइल की टॉर्च जलाकर मरीजों का इलाज करना पड़ा। ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित होने के कारण मरीजों को भारी परेशानी हुई।
* 29 जून को ही ‘बांदा’ (मध्य प्रदेश) स्थित सिविल अस्पताल में मामूली सर्दी-खांसी के इलाज के लिए लाए गए 19 महीने के मासूम बच्चे की आंखों में डाक्टरों ने आई ड्रॉप की बजाय कफ सिरप डाल दिया जिससे बच्चे की आंखों की रोशनी सदा के लिए चली गई।
* 29 जून को ही ‘जहानाबाद’ (बिहार) स्थित सदर अस्पताल में उपचाराधीन एक महिला की मौत हो गई। मृतका के परिजनों ने डाक्टरों पर समय पर इलाज न करने और लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए अस्पताल में भारी हंगामा किया।
* 30 जून को ‘कुल्लू’ स्थित क्षेत्रीय अस्पताल, ‘ढालपुर’ में मंडी जिले की रहने वाली मंजू शर्मा (23) की प्रसव के बाद मौत हो गई। परिजनों ने इलाज में गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए अस्पताल परिसर में सैंकड़ों लोगों के साथ भारी विरोध प्रदर्शन किया जिसके बाद एक महिला डाक्टर को निलम्बित कर दिया गया।
* और अब 30 जून को ही ‘औरंगाबाद’ (बिहार)के ‘दाऊद नगर सरकारी अस्पताल’ में उपचाराधीन एक महिला को एक्सपायर्ड (समाप्त अवधि वाली) सलाइन चढ़ा देने से उसकी तबीयत बिगड़ गई।उपरोक्त उदाहरणों से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे सरकारी अस्पताल किस कदर बदहाली के शिकार हो चुके हैं। इनकी ऐसी दुर्दशा निश्चय ही एक चिंताजनक समस्या है, जो दूर होनी चाहिए, नहीं तो इसी प्रकार अस्पतालों में अप्रिय घटनाएं होती रहेंगी।—विजय कुमार