Edited By ,Updated: 20 Mar, 2026 04:44 AM

यूं तो भारत में हर चुनाव बेहद महत्वपूर्ण और एक दिशा दिखाने वाले होते हैं, लेकिन चुनाव आयोग द्वारा घोषित 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव, 3 वर्ष बाद होने वाले राष्ट्रीय चुनाव और अगले वर्ष उत्तर प्रदेश व अन्य चुनावी राज्यों के लिए निश्चित रूप से लिटमस...
यूं तो भारत में हर चुनाव बेहद महत्वपूर्ण और एक दिशा दिखाने वाले होते हैं, लेकिन चुनाव आयोग द्वारा घोषित 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव, 3 वर्ष बाद होने वाले राष्ट्रीय चुनाव और अगले वर्ष उत्तर प्रदेश व अन्य चुनावी राज्यों के लिए निश्चित रूप से लिटमस टैस्ट साबित होंगे। ये चुनाव काफी अलग और विशेषकर भाजपा के लिए उसकी हैसियत और ताकत का आकलन कराने वाले होंगे। भाजपा ने बीते 10 वर्षों में उत्तर और पश्चिम में खुद को जरूर काफी मजबूत किया लेकिन दक्षिण में चूक गई। भाजपा को चुनौती तो मिलती है लेकिन विपक्ष की टूटती-बिखरती लामबंदी ने हर बार संजीवनी का काम किया है। अंतत: मतदाता स्थायी सरकार के फेर और भाजपा की चुनावी मैनेजमैंट के प्रभाव में न चाहते हुए भी फंसकर जिताने को मजबूर हुए।
कमोबेश प. बंगाल को छोड़ दें तो बाकी 4 राज्यों में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती तो है लेकिन वैसी नहीं, जैसी प. बंगाल में। निश्चित रूप से भाजपा इस बार प. बंगाल में कमल खिलाने का मन बना चुकी है। 2021 में भी यही सोच थी लेकिन तब भी तृणमूल को चुनौती नहीं दे पाई। 48 प्रतिशत मतों के साथ 213 सीटें जीतकर तृणमूल कांग्रेस ने फिर परचम लहराया। लेकिन लगातार एक सी स्थिति बनाए रखना किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनौती होती है।
ममता बनर्जी के प्रभाव से वहां इंकार नहीं लेकिन एस.आई.आर. का मुद्दा पूरे देश से अलग पं. बंगाल में अभी भी चुनाव की घोषणा के बाद छाया हुआ है। लेकिन इस बात से इंकार नहीं कि वोट कटने और घुसपैठियों के मुद्दे में स्पष्टता उन राज्यों में भी दिखी, जहां एस.आई.आर. के बाद चुनाव हुए। बिहार और महाराष्ट्र में लोगों ने इसे देखा। प. बंगाल का मुद्दा कुछ अलग है। वहां भू-राजनीतिक तासीर अलग है। एस.आई.आर. में यदि काफी वोट कट गए तो सहानुभूति निश्चित रूप से ममता बनर्जी के पक्ष में होगी। वैसे भी प. बंगाल में भाजपा का प्रचार तृणमूल के मुकाबले ऊपरी ज्यादा दिखता है। भीतरखाने तृणमूल जितनी सशक्त है, शायद कांग्रेस या वाम भी नहीं है। वजूद की लड़ाई में सारे अलग, तो तृणमूल अलग दिखती है। वहां बाबरी मस्जिद और हुमायूं कबीर एक क्षेत्र में अपनी जोर आजमाइश कर रहे हैं लेकिन पूरे प. बंगाल में ममता के लिए उतनी बड़ी चुनौती नहीं बन पाएंगे। इसीलिए 5 राज्यों में सभी निगाहें प. बंगाल पर हैं। कहा जा रहा है कि इस बार देश की राजनीति की अगली दिशा ममता से तय होगी।
केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और कांग्रेस को चुनौती देना अभी काफी कठिन है। 2021 के चुनाव में वाम मोर्चे को 99 सीटें मिलीं तो कांग्रेस 41 सीटें जीती। भाजपा का खाता नहीं खुला। वोट प्रतिशत 12 जरूर रहा। केरल में भाजपा को मेहनत करनी होगी। प्रधानमंत्री ने बुधवार 11 मार्च को कोच्चि में केरल की द्विध्रुवीय राजनीति की कड़ी आलोचना करते हुए और 2 समीपवर्ती स्थानों पर कई परियोजनाओं का शुभारंभ कर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के चुनावी अभियान की शुरुआत की। लगभग 11,000 करोड़ रुपए की परियोजनाओं का उद्घाटन भी किया। अब यह कितना असरकारक होगा, नतीजे बताएंगे। वैसे भाजपा केरल को चुनौती मानकर चल रही है। तमिलनाडु में भाजपा की राह आसान नहीं। क्षेत्रीय दलों का दबदबा पिछले कई दशकों से है। पूरी राजनीति भी इन्हीं के आसपास घूमती है। भाजपा को चुनौती तय है, बस देखना है कि यह अपनी शक्ति का कितना विस्तार कर पाती है। 2021 के चुनाव में द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 159 सीटें जीतीं, जबकि उसकी प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक ने 75 सीटें। भाजपा अन्नाद्रमुक के साथ थी और केवल 4 सीटें जीत सकी।
पुड्डुचेरी में द्रमुक और कांग्रेस के बीच चल रही ‘बिग ब्रदर’ की खींचतान खत्म करने की कोशिशें सफलता की ओर हैं। ऐसा हुआ तो लंबे समय से चला आ रहा गतिरोध सुलझेगा। तमिलगा वेट्री कजगमनेता आधव अर्जुना के बयान से भड़के रजनीकांत के फैंस ने इस बैठक की पुष्टि की। बातचीत न कांग्रेस कार्यालय में होगी और न द्रमुक के। एक सांझा तटस्थ स्थान तय कर लिया गया है और पूरी संभावना है कि बातचीत के सार्थक नतीजे निकलें। द्रमुक की 30 सदस्यीय विधानसभा में 18 सीटों पर चुनाव लडऩे की मांग और द्रविड़ पार्टी के साफ संकेत कि वह गठबंधन में प्रमुख भूमिका चाहती है, के बाद अब फैसला कांग्रेस का होगा कि गठबंधन बनाए रखने के लिए वह केंद्र शासित प्रदेश में अपना पारंपरिक नेतृत्व छोडऩे को तैयार होगी? 2021 में एन.डी.ए. ने 16 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस गठबंधन को 11 सीटें मिलीं। इस बार जो समीकरण बन रहे हैं, वे काफी अलग और चुनौतीपूर्ण हैं।
असम में भाजपा उत्साहित है। लेकिन हिमंता बिस्वा सरमा के सामने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा के उदाहरणों का डर है। इस बात की वहां चर्चा भी है कि यदि भाजपा फिर सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री कौन होगा? वैसे देश में कई बार दिखा है कि भाजपा कब कौन सा दांव खेल जाए, सिवाय मोदी और शाह के किसी को पता नहीं होता। 2021 में एन.डी.ए. 160 में 75 सीटें जीतकर सत्ता पर काबिज हुई, जिसमें भाजपा की 60 सीटें हैं। इतना तो है कि असम में क्षेत्रीय दलों, जैसे असम गण परिषद आदि से गठबंधन ने भाजपा को मजबूती दी। निश्चित रूप से इन दलों के मुद्दों ने वहां राजनीतिक बिसात बिछाई। अब कांग्रेस इन्हें कैसे हथिया सकती है, देखने लायक होगा। दम-खम में भाजपा ही आगे दिखती है। अब देखना है कि 5 राज्यों की 824 विधानसभा सीटें भारतीय राजनीति का क्या गुणा-गणित बनाती हैं?-ऋतुपर्ण दवे