Edited By ,Updated: 03 Aug, 2026 02:32 AM

नीट पेपर लीक पर ‘जेन-काी’ का जंतर-मंतर पर हुआ धरना पिछले हफ्तों में पूरी दुनिया के मीडिया में चर्चा में रहा। धरने का उद्देश्य गलत नहीं था। आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिस की जो दमनकारी लाठियां चलीं उसकी कतई जरूरत नहीं थी। बावजूद इसके इस आंदोलन को जो कुछ...
नीट पेपर लीक पर ‘जेन-काी’ का जंतर-मंतर पर हुआ धरना पिछले हफ्तों में पूरी दुनिया के मीडिया में चर्चा में रहा। धरने का उद्देश्य गलत नहीं था। आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिस की जो दमनकारी लाठियां चलीं उसकी कतई जरूरत नहीं थी। बावजूद इसके इस आंदोलन को जो कुछ सफलता मिली, उसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। पर इस आंदोलन की जिस बात ने मुझे बहुत विचलित किया, वह है भाषा की अभद्रता। जिसने शालीनता की सारी हदें पार कर दीं। अगर मुझ पर ङ्क्षलगभेद का आरोप न लगे तो मैं यह खुल कर कहना चाहूंगा कि जिस तरह की गंदी गालियां, अश्लील भंगिमाएं और नारेबाजी आंदोलन में शामिल कुछ लड़कियों ने कीं, वे एक सभ्य समाज में कतई स्वीकार नहीं की जा सकतीं।
लड़कियों का मैं खासतौर पर इसलिए उल्लेख कर रहा हूं क्योंकि अब तक भारतीय समाज में लड़कियों को कभी ऐसी अश्लील भाषा का इस्तेमाल करते नहीं देखा गया था। लड़के तो प्राय: गाली-गलौज की भाषा में बात करते ही हैं, पर सब लड़के ऐसे नहीं होते। ज्यादातर मर्यादित भाषा का ही इस्तेमाल करते हैं। चूंकि मैं पिछले 50 वर्षों से ङ्क्षहदी पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूं, इसलिए अक्सर मेरे मुंह से ‘साला’ गाली निकल जाती है। मेरे बेटे जो अब 40 वर्ष के आस-पास हैं, बचपन से ही मुझे इस पर टोकते आए हैं, ‘‘आप कैसी भाषा बोलते हैं?’’ इसलिए मैं यह सावधानी बरतता हूं कि अपने परिवार के सामने ‘साला’ जैसी गाली का भी इस्तेमाल न करूं।
जंतर-मंतर के प्रदर्शन में कुछ छात्रों ने जिस अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, वह सोशल मीडिया के माध्यम से घर-घर और गांव-गांव तक पहुंची। जरा सोचिए कि शालीनता के दायरे में रहने वाले करोड़ों युवक-युवतियों पर इसका क्या असर पड़ा होगा? अभिजात्य वर्ग के या पढ़े-लिखे समाज के युवाओं के इस निकृष्ट व्यवहार को देख कर हो सकता है कि गांवों में रहने वाले लड़के-लड़कियां भी आधुनिक दिखने की ललक में इस तरह की अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करने लगें। दूसरी तरफ दिल्ली की झुग्गियों में पला-बढ़ा एक निर्धन नौजवान मोहम्मद इरफान इसी आंदोलन में रातों-रात पूरे देश के युवाओं के लिए एक मिसाल बन कर सामने आया। गरीब परिवार में पैदा हुए इरफान के पास औपचारिक शिक्षा की डिग्रियां नहीं हैं, पर जिस संयत भाषा में उसने इस आंदोलन के मुद्दों को मीडिया के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया, वह काबिले तारीफ है। संविधान से लेकर, देश के राजनीतिक इतिहास, सामाजिक आर्थिक बदहाली और सनातन धर्म की गहराइयों तक जिस ज्ञान का प्रदर्शन उसने किया, वह आश्चर्यचकित करने वाला है। इरफान का व्यक्तित्व इस आंदोलन के उन उद्दंड और संस्कारहीन युवाओं के गाल पर सीधा तमाचा है।
इसी क्रम में यहां मैं एक और चिंतनीय प्रवृत्ति की ओर इशारा करना चाहूंगा। पिछले कुछ वर्षों से महानगरों में ‘स्टैंड-अप कॉमेडी’ का एक नया चलन शुरू हुआ है। लोकतंत्र में समाज और सरकार पर कटाक्ष करने के अनेक माध्यम होते हैं। प्राचीन काल से यह कार्य विदूषक करते आए हैं। तनाव भरे जीवन में हंसना-हंसाना सबको राहत देता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो कॉर्पोरेट जगत में कम उम्र में ही बुलंदियों को छूने वाले युवा, आज सबसे ज्यादा तनाव ग्रस्त हैं। इसलिए बेंगलुरु, मुंबई, गुरुग्राम जैसे शहरों में अचानक ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियनों की बाढ़ आ गई है। इनमें अधिकतर कॉमेडियन ऐसे हैं जो अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, सामाजिक-राजनीतिक समझ और अपने इर्द-गिर्द की दुनिया पर पैनी नजर रख कर जो कुछ प्रस्तुत करते हैं, वह न सिर्फ श्रोताओं को हंसी से लोटपोट कर देता है, बल्कि सरकार और समाज की कमजोरियों को सहज ही उजागर कर देता है।
इन्हीं ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियनों में कुछ पुरुष और महिलाएं ऐसे भी हैं, जो अत्यंत निम्न कोटि की भाषा का इस्तेमाल करके कामुकता और अश्लीलता का ‘फूहड़ मनोरंजन’ प्रस्तुत करते हैं। जिस श्रोता समूह के सामने ये लोग इस तरह की प्रस्तुतियां करते हैं, वह पढ़ा-लिखा, संपन्न और करियर में सफल व्यक्ति होता है। इसलिए उसमें इतना विवेक होता है कि वह ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडी हॉल के बाहर निकल कर उस माहौल को भूल जाता है और अपने कार्य-क्षेत्र, समाज और परिवार में अनुशासित जीवन जीता है। पर सोशल मीडिया के माध्यम से जब ऐसे ‘शो’ घर-घर पहुंच जाते हैं तो उन युवाओं के दिमाग पर गलत असर डालते हैं जो अपने परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति में रहकर अपना करियर बनाने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। ऐसी भाषा इस्तेमाल करने वाले ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन को सरकार कानून की मदद से अनुशासित या दंडित करे तो यह अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला माना जाएगा। पर अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार हमें समाज में गंदगी फैलाने की छूट नहीं देता। इसके लिए आत्मसंयम बहुत जरूरी है, चाहे वे कॉमेडियन हों या किसी राजनीतिक दल के कार्यकत्र्ता।-विनीत नारायण