पहले ए.आई. और अब युद्ध के कारण नौकरियों की गारंटी नहीं

Edited By Updated: 07 Apr, 2026 03:44 AM

first ai and now war jobs are no longer guaranteed

पिछले दिनों एक नामी बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने सवेरे 6 बजे ई-मेल भेजकर अपने 30 हजार कर्मचारियों को हटा दिया। इनमें 12 हजार भारतीय हैं। दुनिया की बड़ी-बड़ी कम्पनियों में जैसे यह होड़ मची हुई है कि कौन कितने ज्यादा कर्मचारियों से पिंड छुड़ाता है। कोई 20...

पिछले दिनों एक नामी बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने सवेरे 6 बजे ई-मेल भेजकर अपने 30 हजार कर्मचारियों को हटा दिया। इनमें 12 हजार भारतीय हैं। दुनिया की बड़ी-बड़ी कम्पनियों में जैसे यह होड़ मची हुई है कि कौन कितने ज्यादा कर्मचारियों से पिंड छुड़ाता है। कोई 20 हजार निकाल रहा है, कोई 50 हजार, तो कोई कई लाख। यही नहीं, बड़ी संख्या में लोगों को हटाने के बाद यह धमकी भी जारी रहती है कि यह अंत नहीं है, अभी और लोगों को हटाना है।

ऐसे दृश्य भी सामने आ रहे हैं कि किसी ने एक हफ्ते पहले कम्पनी ज्वाइन की थी और उसे हटा दिया गया। एक लड़की, जो अपने टारगेट्स पूरे करने के लिए 20-20 घंटे काम करती, कोई छुट्टी न लेती, कई बार दफ्तर  में ही सो जाती थी, उसे एकाएक हटा दिया गया। एक आदमी जो 8 साल से कम्पनी में काम करता था, देर रात तक रुकता,  सबसे पहले आता। एक सवेरे जब वह दफ्तर आया, तो एच.आर. से फोन आया। वह वहां गया, तो उससे कहा गया कि आप अपना सामान समेट लें। आपको हटा दिया गया है। एक लड़की ने गम्भीर रूप से बीमार, अपने पति की देखभाल के लिए छुट्टी ली थी, उसे हटा दिया। एक अन्य ने खुद की बीमारी के लिए छुट्टी ली, उसे भी नहीं बख्शा गया। भारत में बहुत से लोग छुट्टी बिताने आए थे, उन्हें यहां ही हटाए जाने की सूचना मिली।  लोगों को हटाने के लिए ए.आई. का  बहाना बनाया जा रहा है। कम्पनी के प्रति वफादारी के जैसे कोई मायने ही नहीं रहे।

पिछले दिनों एक रिपोर्ट पढ़ रही थी, जिसमें बताया गया था कि जिन लोगों की नौकरियां इस तरह से जाती हैं, उन्हें तो मानसिक आघात लगता ही है, उनके माता-पिता भी अवसाद में चले जाते हैं, क्योंकि बुढ़ापे में भारत में अधिकांश माता-पिता, आज भी बच्चों के सहारे होते हैं। जिन बच्चों को पढ़ा-लिखाकर इस योग्य बनाया कि वे अपने पांवों पर खड़े हो सकें,  यदि उनकी नौकरी इस तरह से चली जाए, तो पूरे घर की अर्थव्यवस्था ही डगमगा जाती है।  भारत में इसकी आहट सुनाई दे रही है। बहुत-सी बड़ी कम्पनियां कह रही हैं कि उन्होंने नई नियुक्तियां टाल दी हैं। और अब वे उन कर्मचारियों के बारे में सोच रही हैं, जो भारी-भरकम तनख्वाह पाते हैं और महंगे रिसोर्स हैं। यानी कि अब नए युवक-युवतियों की नौकरियों के दरवाजे बंद हो रहे हैं, उनकी शामत भी आ रही है, जिन्होंने मिडल मैनेजमैंट तक पहुंचने के लिए कम्पनियों के साथ वर्षों बिताए। टारगेट पूरे करने की चिंता में न परिवार पर ध्यान दे पाए, न ही अपने जीवन में कुछ और कर पाए। बड़ी संख्या में लोग कह रहे हैं कि कम्पनियों के लाभ के लिए हम जीवन भी लगा दें, तो  उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वे जब चाहें, हटा सकती हैं और पलटकर नहीं देखतीं। 

एक समय में कम्पनियों के प्रति वफादारी या लायल्टी बहुत अच्छा गुण माना जाता था। कम्पनियां अपने ऐसे कर्मचारियों के महत्व को मानती भी थीं और रेखांकित भी करती थीं। लेकिन अब कहा जा रहा है कि आपकी मेहनत इस बात की कोई गारंटी नहीं कि  नौकरी बची रहेगी। पुराने सारे मूल्य, जिनमें बताया जाता था कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं, उन्हें सिर के बल खड़ा कर दिया गया है। एक कम्पनी के बड़े अफसर ने कहा कि जिन्हें हटाया गया है, वे अपना स्टार्टअप शुरू कर सकते हैं। कहना कितना आसान है। क्या किसी मध्यमवर्ग के आदमी के पास इतने पैसे होते हैं कि जब चाहे तब व्यापार शुरू कर दे? यूं भी इस पीढ़ी को ई.एम.आई. पीढ़ी कहते हैं। हाल ही में एक सर्वे में बताया गया था कि भारतीय सबसे अधिक लोन लेते हैं। ऐसे में क्या इतने पैसे बचते हैं कि तमाम घरेलू जरूरतें, बच्चों की महंगी शिक्षा, किसी का महंगा इलाज कराने के बाद, यदि एकाएक नौकरी चली जाए, तो कोई व्यापार कर लें?  अपना काम शुरू कर भी लें तो सफलता मिल ही जाएगी, कौन कह सकता है। वेतन की गारंटी होती है, अपने काम में कितना पैसा आएगा, कितना नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं। आए दिन स्टार्टअप और नई खुली दुकानें बंद हो रही हैं।

जिन लोगों ने भूमंडलीकरण और मध्यमवर्ग की तमाम सुविधाओं का लाभ उठाते हुए, बहुत बड़ी-बड़ी सफलताएं पाईं, उनमें से बहुत से कह रहे हैं कि युवा हाथ का हुनर सीखें। प्लम्बर, कार मैकेनिक, इलैक्ट्रीशियन, पंक्चर लगाने वाले आदि। तब वे कभी खाली नहीं होंगे। ये बुद्धिमान यह नहीं बताते कि अगर काम नहीं होगा, तो कौन कार खरीदेगा, किसके पास घर खरीदने के पैसे होंगे। कार मैकेनिक या प्लम्बर हर कोई बनेगा, तो कितनों को काम मिलेगा। कुल मिलाकर, दुनिया एक ऐसे समय में खड़ी है, जहां एक ओर किसी की नौकरी की ए.आई. और अब इस युद्ध के कारण कोई गारंटी नहीं। इन बेरोजगारों को देखकर आने वाली पीढ़ी भी क्यों पढ़ेगी-लिखेगी, जब रोजगार ही नहीं मिलेगा। तब ये जो तमाम किस्म के प्रोफैशनल कोर्स हैं, आटोमोबिल सैक्टर है, उपभोक्ता बाजार है, इनको लेने वाला कौन होगा। जिस मुनाफे का सपना कम्पनियां लोगों को निकालकर ले रही हैं, वह उपभोक्ता के अभाव में ढह जाएगा।-क्षमा शर्मा
 

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