Edited By ,Updated: 29 Sep, 2026 05:37 AM

मैं नई दिल्ली की एक संभ्रांत कॉलोनी में रहता हूं। मैं राष्ट्रीय और राज्य चुनावों में 3 दशकों से मतदान करता आ रहा हूं। मेरा रिकॉर्ड चुनाव आयोग के डाटाबेस में मौजूद है और आयोग ने इसे मेरे लिए सही और इलैक्ट्रॉनिक रूप से पुन: प्रस्तुत किया है। फिर भी...
मैं नई दिल्ली की एक संभ्रांत कॉलोनी में रहता हूं। मैं राष्ट्रीय और राज्य चुनावों में 3 दशकों से मतदान करता आ रहा हूं। मेरा रिकॉर्ड चुनाव आयोग के डाटाबेस में मौजूद है और आयोग ने इसे मेरे लिए सही और इलैक्ट्रॉनिक रूप से पुन: प्रस्तुत किया है। फिर भी आयोग मेरे एस.आई.आर. आवेदन को मंजूरी नहीं दे पाया है। यह मेरी दुखद कहानी है और इसका अंत सुखद नहीं है। तो आखिर एक सरल, नियमित प्रक्रिया इतनी जटिल क्यों हो गई है कि लगातार कोशिशों के बाद भी मैं अपने आवेदन को ‘साफ’ नहीं कर पा रहा हूं? लेकिन रुकिए। मेरा आवेदन तो साफ है। मेरा नाम नहीं बदला, मेरा पता नहीं बदला, जहां तक मुझे याद है, मैं अभी भी जीवित हूं और मैंने हर अपेक्षित चरण का पालन किया है।
मुझे अपने दस्तावेज बूथ स्तर के अधिकारी के पास ले जाने के लिए कहा गया। लंबी कतार में काफी देर इंतजार करने के बाद, अधिकारी ने मेरे कागजात देखे, उनमें कोई गड़बड़ी नहीं पाई और मुझे लगभग 2 सप्ताह बाद वापस आकर दूसरी कतार में लगने के लिए कहा।निर्धारित दिन दोपहर को एक स्कूल के बाहर बैठक थी। हम लगभग 30 लोग खड़े थे, बैठने की जगह नहीं थी और हमने एक अधिकारी को वे आवेदन प्रस्तुत किए जिनमें कोई त्रुटि नहीं पाई गई थी। उन्होंने धैर्यपूर्वक प्रत्येक फाइल की जांच की और फिर अपने मोबाइल फोन से उसकी तस्वीर खींची। बैठक का उद्देश्य कभी नहीं बताया गया क्योंकि सुधार करने के लिए कुछ था ही नहीं। 90 मिनट बाद मैं उनके पास गया। मैंने कहा-जब पहली समीक्षा में कोई त्रुटि नहीं पाई गई, तो आपने हमें दूसरी समीक्षा के लिए क्यों बुलाया? मेरा आवेदन अधूरा था। किस मामले में अधूरा था? ई.सी.आई. और वे इसका जवाब नहीं दे सके। राज्य द्वारा मेरे रिकॉर्ड के बारे में तथ्यों का एक साधारण सा गलत बयान।
उसने कंधे उचका दिए और मुझे उस पर तरस आया। वह तो बस एक पुर्जा है, मशीन नहीं। मैंने उससे कहा कि वह मेरे एस.आई.आर. दस्तावेज अपने पास रख सकता है, क्योंकि मुझे इस बात की परवाह नहीं कि मैंने वोट दिया या नहीं। बाहर निकलते हुए मैंने लाइन में खड़े लोगों से जोर से कहा-हम सब भेड़ें हैं जो इसे स्वीकार कर रहे हैं और प्रशासन ही हमारा रखवाला है। हम इसे क्यों सह रहे हैं? मैं बहुत गुस्से में हूं और अब मैं इसे और बर्दाश्त नहीं करूंगा। शायद यही अच्छा है। वैसे भी मुझे पता नहीं होता कि किसे वोट दूं। मतदाता सूची को साफ करने की किसी भी प्रक्रिया में 2 तरह की गलतियां हो सकती हैं। या तो यह किसी वास्तविक मतदाता का नाम सूची से हटा सकती है या फिर किसी मृत या 2 बार दर्ज किए गए व्यक्ति का नाम सूची में छोड़ सकती है। कोई भी प्रक्रिया इन दोनों से नहीं बच सकती। मुख्य प्रश्न यह है कि आप किस गलती से अधिक डरते हैं और इसलिए सबूत का भार किस पर डाला जाए।
किसी वास्तविक नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटा देने से उसका वोट निश्चित रूप से छिन जाता है। मतदाता सूची में किसी मृत व्यक्ति का नाम होने से तभी नुकसान होता है जब कोई व्यक्ति मतदान केंद्र पर आकर उसके नाम पर वोट डाल दे और इसके खिलाफ मतदान अधिकारी, अमिट स्याही और मतपत्र मौजूद हैं। इससे कहीं अधिक गंभीर गलती मताधिकार से वंचित करना है। इसलिए यह जिम्मेदारी राज्य की होनी चाहिए-मतदाता का नाम मतदाता सूची में तब तक बना रहता है जब तक राज्य यह साबित न कर दे कि वह अपना पता बदल चुका है, उसकी मृत्यु हो गई है या उसका नाम 2 बार गिना गया है।
एस.आई.आर. ने इस व्यवस्था को पूरी तरह उलट दिया। हर मतदाता को शुरू से एक जनगणना प्रपत्र भरना पड़ता था, मानो पिछले 2 दशकों की मतदाता सूचियां मौजूद ही न हों और जिसका प्रपत्र वापस नहीं आता था, उसे मसौदा सूची से हटा दिया जाता था। 2002 में हुए अंतिम गहन संशोधन में यह तरीका नहीं अपनाया गया। रिकॉर्ड को तब तक सही माना जाता था जब तक कि वह गलत साबित न हो जाए। आज, मतदाता को तब तक अनुपस्थित माना जाता है, जब तक वह अपनी उपस्थिति साबित न कर दे।
और जब जिम्मेदारी मतदाता पर हो, तो राज्य को अपनी गलतियों का आकलन करने की आवश्यकता नहीं। किसी ने भी यह प्रकाशित नहीं किया है कि कितने वास्तविक मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटा दिए गए, क्योंकि किसी को भी यह पता लगाने के लिए नहीं कहा गया था। मुख्य चुनाव आयुक्त ने 12 राज्यों में ‘शून्य अपील’ का हवाला देते हुए यह साबित किया है कि प्रक्रिया कारगर रही। इससे हमें यह पता चलता है कि अपील करना कितना मुश्किल है, न कि यह कि कितने लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए। देश भर में नामांकन सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम हटा दिए गए हैं। इनमें से कुछ नाम हटाने जरूरी थे। कितने नाम हटाने जरूरी नहीं थे, यह हम नहीं जानते और इस व्यवस्था के तहत हमें यह जानने का अधिकार भी नहीं है।-सुरजीत एस. भल्ला