Edited By ,Updated: 29 Sep, 2026 02:53 AM

भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यू.एन.एस.सी.) में स्थायी और अस्थायी दोनों सीटों के लिए मुहिम चला रहा है। स्थायी सीट हासिल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में महत्वपूर्ण बदलावों की आवश्यकता है, जो धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं। भारत को ‘ग्लोबल...
भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यू.एन.एस.सी.) में स्थायी और अस्थायी दोनों सीटों के लिए मुहिम चला रहा है। स्थायी सीट हासिल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में महत्वपूर्ण बदलावों की आवश्यकता है, जो धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं। भारत को ‘ग्लोबल साऊथ’ और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक प्रमुख आवाज के रूप में देखा जाता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर, जो संयुक्त राष्ट्र की बैठक के लिए न्यूयॉर्क में हैं, ने इस साल अस्थायी सीट के लिए अभियान शुरू किया है। अगस्त 1950 में, अमरीका ने अपने राजदूत के माध्यम से भारत को यू.एन.एस.सी. में चीन की जगह भारत को स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करने पर विचार करने का प्रस्ताव दिया था। कहा जाता है कि नेहरू ने इस सुझाव को खारिज कर दिया था, जिससे भारत ने स्थायी सदस्यता का मौका गंवा दिया।
नई दिल्ली अपनी विदेश नीति के लक्ष्यों के तहत पिछले 30 वर्षों से इस सीट के लिए काम कर रही है। वर्षों से, कई देशों ने भारत की उम्मीदवारी का समर्थन किया है, उसकी बढ़ती हुई प्रभाव क्षमता, बड़ी जनसंख्या और शांति स्थापना में योगदान को मान्यता दी है। हालांकि, यू.एन.एस.सी. के ढांचे को बदलना जटिल है क्योंकि इसके लिए वर्तमान 5 स्थायी सदस्यों-अमरीका, रूस, चीन, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम की सर्वसम्मत सहमति की आवश्यकता होती है। भारत का मानना है कि वर्तमान यू.एन.एस.सी. ढांचा अब आधुनिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करता। इसका तर्क है कि सबसे बड़े लोकतंत्र और बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में इसकी स्थिति इसे एक प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी बनाती है। शांति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में उसकी महत्वपूर्ण भागीदारी के माध्यम से दिखाई देती है, जहां उसने स्थिरता बनाए रखने में मदद करने के लिए कई कर्मियों को भेजा है।
भारत को मजबूत राजनयिक प्रयासों में संलग्न होने की आवश्यकता होगी, क्योंकि ताजिकिस्तान भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एशिया-प्रशांत अस्थायी सीट के लिए होड़ कर रहा है। इस्लामिक सहयोग संगठन (ओ.आई.सी.) से ताजिकिस्तान को मिलने वाला समर्थन भारत के लिए प्रतिस्पर्धा को और कठिन बना सकता है। अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए, भारत को फिजी, अमरीका, ऑस्ट्रिया तथा श्रीलंका से परे और अधिक समर्थन की आवश्यकता है। चुनाव साल में एक बार गुप्त मतदान के माध्यम से होते हैं और इसके लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, भले ही उम्मीदवार निर्विरोध हों।
कुछ यूरोपीय देश यू.एन.एस.सी. के लिए भारत की बोली का समर्थन करते हैं। हालांकि चुनौतियां बनी हुई हैं, जिसमें कितनी नई सीटें जोडऩी हैं और उन नए सदस्यों के लिए वीटो पावर के विवादास्पद प्रश्न पर असहमति शामिल है। विभिन्न देशों के समर्थन के बावजूद, भारत को नई सीटों और वीटो पावर को लेकर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यह एक ऐसे प्रस्ताव का पक्षधर है, जो शुरू में नए स्थायी सदस्यों के लिए वीटो अधिकारों को बाहर करता है, जिससे मौजूदा सदस्यों की चिंताओं को संबोधित किया और साथ ही निष्पक्ष प्रतिनिधित्व को बढ़ावा दिया जा सके।
जैसा कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसदीय सत्रों में दोहराया है, भारत यू.एन.एस.सी. सुधारों पर अंतर-सरकारी वार्ता में सक्रिय रूप से लगा हुआ है। भारत यू.एन.एस.सी. के विस्तार के लिए व्यापक समर्थन जुटाने के लिए काम कर रहा है। इस रणनीतिक जुड़ाव में ‘ग्लोबल साऊथ’ देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने, सामूहिक विकास को बढ़ावा देने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सांझी चुनौतियों का समाधान करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को उजागर करना शामिल है। भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की वकालत करता है क्योंकि उसका मानना है कि वर्तमान ढांचा अब 21वीं सदी की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करता। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में, भारत वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कई यूरोपीय देशों ने भारत की उम्मीदवारी का समर्थन किया है, इसे परिषद के भीतर प्रतिनिधित्व में विविधता लाने के एक तरीके के रूप में देखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुधार की तत्काल आवश्यकता के बारे में विशेष रूप से मुखर रहे हैं, उन्होंने सीट आबंटन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के दावों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर जोर दिया है। हालांकि, सुधार प्रक्रिया को महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ा है क्योंकि कोई एकीकृत वार्ता पाठ मौजूद नहीं है और विस्तारित सदस्यता और वीटो पावर के विवादास्पद मुद्दे पर विवाद जारी है। कई देशों से मजबूत समर्थन के बावजूद, महत्वपूर्ण चुनौतियां बनी हुई हैं। इन चुनौतियों के केंद्र में नई सीटों के आबंटन और अतिरिक्त सदस्यों को वीटो पावर का उपयोग करने की अनुमति देने के निहितार्थों पर विवादास्पद चर्चाएं हैं। फिर भी, भारत स्थायी सदस्यता की वकालत करना जारी रखे हुए है, वैश्विक शासन और शांति और सुरक्षा के उन सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को व्यक्त करता है, जिन्हें यू.एन.एस.सी. को बनाए रखना है।
भारत के लिए समर्थन लगातार बढ़ रहा है, जिसमें अफ्रीकी संघ जैसी संस्थाओं का समर्थन शामिल है, जिसने यह सुनिश्चित करने के लिए स्थायी सीट की मांग की है कि यू.एन.एस.सी. अफ्रीकी हितों और दृष्टिकोणों का पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व करे। फिर भी, स्थायी सदस्यता का मार्ग जटिल है और इसके लिए वर्तमान स्थायी सदस्यों के बीच सावधानीपूर्वक बातचीत और आम सहमति बनाने की आवश्यकता है। यह बोली क्षेत्रों में, विशेष रूप से ‘ग्लोबल साऊथ’, ओ.आई.सी. सदस्यों, एस.सी.ओ. देशों, अफ्रीकी राज्यों, द्वीपीय देशों और प्रमुख पश्चिमी भागीदारों के बीच भारत की राजनयिक पहुंच का परीक्षण करेगी।-कल्याणी शंकर