ईरान युद्ध : सत्ता और ताकत का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा

Edited By Updated: 07 Mar, 2026 04:11 AM

iran war the intoxication of power and strength is taking over

कहने को अमरीका दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है पर उसके राष्ट्रपति ट्रम्प का यह कहना समझ से परे है कि यदि ईरान एटम बम न बनाने की बात मान लेता तो उसकी तबाही का बिगुल न बजाना पड़ता। यही नहीं, उसने बात करने में देरी कर दी तो इसकी भी सजा उसे मिलनी तय ही थी।...

कहने को अमरीका दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है पर उसके राष्ट्रपति ट्रम्प का यह कहना समझ से परे है कि यदि ईरान एटम बम न बनाने की बात मान लेता तो उसकी तबाही का बिगुल न बजाना पड़ता। यही नहीं, उसने बात करने में देरी कर दी तो इसकी भी सजा उसे मिलनी तय ही थी। सत्ता और ताकत का नशा जब सिर चढ़कर बोलता है तो ऐसा ही होता है।

सत्ता का अजब खेल : इसराईल हालांकि क्षेत्रफल और जनसंख्या के हिसाब से दुनिया के छोटे देशों में से एक है लेकिन उसकी सैन्य शक्ति और आधुनिक हथियारों की तादाद किसी भी बड़े देश को टक्कर दे सकती है। उसका खुफिया तंत्र किलिंग मशीन कहलाता है। मतलब कोई भी अपराधी या जिससे इसराईल को खतरा हो, वह बच नहीं सकता, उसे मरना ही होगा। मध्य-पूर्व को दुनिया भर में तेल भंडार के रूप में जाना जाता है और जबसे उन्हें सोने जैसे अपने अंदर छिपे अद्भुत खजाने का पता चला, उन्होंने इसकी अहमियत को समझा और दिन प्रतिदिन मालामाल होने लगे। कभी वीरान, रेगिस्तान और बीहड़ क्षेत्र के रूप में जाना जाने वाला यह भूभाग दुनिया भर की नजरों का केंद्र बन गया। इन्होंने भी अपने फायदे-नुकसान को ध्यान में रखते हुए संपन्न देशों को अपने यहां आकर अपने इलाकों को विकसित करने और आधुनिक बनाने का फैसला किया। सबसे अधिक अमरीका ने डॉलर की ताकत का एहसास कराते हुए इन सभी देशों में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। ईरान भी इसमें सहभागी था लेकिन जब इसराईल, अमरीका को अपने कंधे का इस्तेमाल ईरान को खत्म करने के लिए देता नजर आया तो पूरी दुनिया सकते में आ गई। 

ईरान ने अमरीका की दुखती रग यानी मिडल-ईस्ट में उसके कहने को सैन्य अड्डों लेकिन असल में उसकी बनाई सभी परियोजनाओं को ध्वस्त करने की कार्रवाई शुरू कर दी। इससे अमरीका की बौखलाहट बढ़ी और वह अधिक ङ्क्षहसक हो गया। ईरान बातचीत और झुकने के लिए राजी हो या अपनी विध्वंसक गतिविधियों को और अधिक बढ़ाए ताकि पूरी दुनिया पर असर पड़े। उसने दूसरा रास्ता चुना और जलडमरूमध्य, जिसके खुलने और बंद होने से सभी देशों की सांसें अटक जाती हैं, उसके फाटक बंद करने शुरू कर दिए। इससे हाहाकार मचना तय था क्योंकि इसी रास्ते से तेल लगभग सभी जगह पहुंचता था। 

सौंदर्य का महाविनाश : दुनिया के आकर्षण और आर्थिक विकास तथा पर्यटन के लिए पहली पसंद बने इन देशों की हालत अब ऐसी हो गई है कि यहां जाने, बसने और व्यापार की संभावना लगभग समाप्त होने की स्थिति है। दुबई हो या अबुधाबी, रियाद हो या अजरबैजान जैसा अद्भुत सौन्दर्य से भरपूर प्रदेश, सब कुछ अंधकार और धुएं के गर्त में समा गया है। यदि युद्ध न रुका तो ये सब उस प्राचीन युग में पहुंच जाएंगे जिसकी कल्पना करने से भी डर लगता है। अमरीका की अपनी धरती का कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन उसके अहंकार ने इस पूरे प्रदेश का नक्शा ही बदल दिया है। लेकिन जो देश इन देशों पर तेल और दूसरे ऊर्जा संसाधनों के लिए निर्भर थे और हैं, वे अवश्य अनिश्चित भविष्य के गर्त में चले जाएंगे। 

अगर हम भारत की बात करें, तो जहां एक ओर अपनी सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और विकास परियोजनाओं के पूरा होने में बाधा पडऩा निश्चित है, वहीं दूसरी ओर खेतीबाड़ी, परिवहन और ऊर्जा के साधनों की कमी और उनकी बढऩे वाली कीमतों को लेकर सरकार और जनता का चिंतित होना स्वाभाविक है। ईरान के दिवंगत सुप्रीमो खामेनेई के प्रति शोक प्रकट करना इसकी शुरुआत है। इन देशों में फंसे अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी में ईरान बहुत बड़ा मददगार होगा। भारत की कूटनीतिक क्षमता इसी बात से आंकी जाएगी कि हम खाड़ी देशों में फंसे अपने नागरिकों को कैसे जल्दी सुरक्षित तरीके से भारत में वापस ला सकते हैं।  जहां तक सीमाओं की सुरक्षा की बात है, यह राहत की स्थिति है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान के साथ उलझा हुआ है और चीन अपने अंदर वैश्विक नेतृत्व की अभिलाषा पूरा होने के अवसर इस युद्ध में तलाश रहा है, इसलिए उससे भी सतर्क रहने के अतिरिक्त कुछ करने की जरूरत नहीं है। हमें केवल साइबर सुरक्षा के प्रति सचेत रहना होगा क्योंकि चीन इस मामले में बहुत आगे है। 

इस युद्ध का सबसे बुरा असर हमारे एम.एस.एम.ई. क्षेत्र और निर्यातकों पर पडऩा शुरू हो गया है। हालांकि घरेलू खपत बढ़ रही है लेकिन उसकी भी एक सीमा है। अगर यह क्षेत्रीय संघर्ष विश्वव्यापी संकट में बदल गया तो उसके लिए प्रत्येक भारतीय को अभी से एक अभूतपूर्व संकट के लिए तैयार रहना होगा। रूस-यूक्रेन युद्ध की तरह अगर यह लड़ाई भी अनिश्चित काल तक ङ्क्षखच गई तो भारत के लिए इसके परिणाम शुभ नहीं होंगे। तेल कीमतों में उछाल और आयात बिल पर दबाव हमारी सबसे बड़ी चुनौती है। शेयर बाजार पर इसका असर साफ दिख रहा है। स्थिति गंभीर है और परेशानियों का बढऩा तय है और ऐसे में संयम, आत्मबल और धैर्य की परीक्षा होती है।-पूरन चंद सरीन
 

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!